20 जिलों के कई स्वास्थ्य केन्द्र पर निजीकरण का ठप्पा, निजी मुट्ठी में बंद होता प्रदेश का ‘स्वास्थ्य’

उदयपुर . राज्य सरकार विभिन्न सेवा क्षेत्रों के निजीकरण पर आमादा है।

By: Jyoti Jain

Published: 10 Feb 2018, 05:21 PM IST

भुवनेश पंड्या/ उदयपुर . राज्य सरकार विभिन्न सेवा क्षेत्रों के निजीकरण पर आमादा है। विरोध के मद्देनजर शिक्षा के निजीकरण को तो रोककर इस पर पुनर्विचार के लिए कमेटी बना दी, तो अब प्रदेश का ‘स्वास्थ्य’ निजी मुट्ठी में बंद होने जा रहा है। प्रदेश के करीब ९९ स्वास्थ्य केन्द्र निजी हाथों में चले गए हैं। सरकार भविष्य में और केन्द्रों के निजीकरण की तैयार कर रही है।

 


प्रदेश में पीपीपी मोड पर दिए गए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का संचालन जिन एजेन्सियों को दिया है, वे सरकारी धन एवं साधनों से केवल मानव संसाधन के बूते पर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाएंगी। सरकार ने वर्ष २०१६ सेचिकित्सा को निजी हाथों में सौंपने की शुरुआत की थी। अब तक जो स्वास्थ्य केन्द्र निजी हाथों में दिए गए हैं, उनमें सर्वाधिक विश फाउण्डेशन के पास हैं।

 


ये केन्द्र निजी हाथों में

उदयपुर जिले के आठ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र निजी हाथों में दिए गए हैं, जिनमें माण्डवा, बिकरणी (विश फाउण्डेशन), मालवों का चौरा, सविना, लूणदा, कूण, सगतड़ा (गीतांजलि हॉस्पिटल) और खारवा चांदा (शिक्षा सेवा समिति) शामिल है। प्रदेश के अन्य स्वास्थ्य केन्द्र इस प्रकार हैं:-
अलवर- नगली बलाहीर, डाबडवास, डामरोली (स्पर्श चाइल्ड इमीनिफिकेशन सोसायटी), बानोखर (सेन्ट कोनार्ड शिक्षण समिति)
बारां- जैपला (विश फाउण्डेशन)
बीकानेर-कुदसू (बीकानेर रिलीफ सोसायटी)
बूंदी- जजावर, दुगारी, बामनवास (विश फाउण्डेशन)
चूरू- लालासर (युवा भारत संस्थान बीकानेर) लोहसना बड़ा, खण्डवा पट्टा और सिरसला(विश फाउण्डेशन)
दौसा - सोनाड़ (नवजीवन हॉस्पिटल लालसोट)
धौलपुर- नगला बिधौरा (वाणी संस्था)
डूंगरपुर- रीछा (विश फाउण्डेशन)
जयपुर प्रथम- हरदतपुर, मंडोता, रामपुरा (जन कल्याण रिहेबिलिटेशन एण्ड डवलपमेंट सोसायटी)
जयपुर द्वितीय- सेवा (स्पर्श हॉस्पिटल), बागावास (जन कल्याण रिहेबिलिटेशन एण्ड डवलपमेंट सोसायटी)
झालावाड़- भालता, चछलाव, कनवाड़ा (विश फाउण्डेशन)


झुन्झुनूं- बाजला, लूना, सोटवाड़ा, नूनिया गोतड़ा, पातुसरी, बंगोला, केरू (सभी नवरंग राम दयाराम डोकिया शिक्षण संस्थान) बलोदा (नवीन भारत जन कल्याण ट्रस्ट) धन्धुरी, पदमपुरा (विश फाउण्डेशन)
कोटा- लाखसनिजा, कोटड़ा दीपसिंह, बडोद (विश फाउण्डेशन)
नागौर- गुढा साल्ट (डॉ रामबाबू गर्ग)
प्रतापगढ़- टचनेरा (चित्रांश सोसायटी), अम्बीरामा (विश फाउण्डेशन)
राजसमन्द- बरदड़ा, ओड़ा (विश फाउण्डेशन)
सिरोही- वरदाला (चित्रांश सोसायटी)
बांसवाड़ा- रामगढ़, टिमड़ीबाड़ा (चित्रांश सोसायटी)
सवाई माधोपुर- सुकार, गुजर बडोदा (नवजीवन हॉस्पिटल लालसोट)भाडोती (विश फाउण्डेशन)
(इसके अतिरिक्त कुछ स्वास्थ्य केन्द्र और भी सरकार ने निजी हाथों में दिए हैं)

 

 

यह है सरकार की दलील

पीपीपी मोड पर संचालित अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में ओपीडी, आईपीडी एवं संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी हुई है। जिन चिकित्सा संस्थानों में वृद्धि कम पाई गई है, उनको सुधार के लिए नोटिस दिया गया है।
ये होती है समस्या: निजीकरण से युवाओं को सीधे सरकारी नौकरी के अवसर कम होते हैं। वह योग्यता के बावजूद इन निजी संस्थानों के पास काम की तलाश में पहुंचता होता है और वे इन्हें रखते भी हैं। एेसे में सवाल यह खड़ा होता है कि यदि इन संस्थानों को स्टाफ मिल सकता है, तो सरकार को क्यों नहीं।

 

...तो करते है राशि में कटौती
प्रदेश में करीब ९९ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र वर्तमान में निजी हाथों में दिए गए हैं। सरकार की योजनाओं के सफल संचालन, और लक्ष्य पूर्ति के लिए ये मेन पावर उपलब्ध करवाते हैं। यदि लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती तो दी जाने वाली राशि में से कटौती की जाती है।
डॉ. रविप्रकाश शर्मा (अतिरिक्त निदेशक), हॉस्पिटल प्रशासन, जयपुर

 

केवल मेन पावर का काम
जो निजी संस्थाएं हैं, उन्हें सरकार ने मेन पावर की कमी को पाटने के लिए साथ जोड़ा है। हम सब कुछ उपलब्ध करवाते हैं, जिनमें भवन और साधन, लेकिन मेन पावर इन संस्थानों के माध्यम से उपलब्ध करवाया जाता है, इसकी राशि सरकार उन्हें उपलब्ध करवा देती है।
डॉ. संजीव भार्गव, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी

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