VIDEO : जो होगा चहेता वहीं बनेगा ‘महापौर’ , ‘कद्दावर नेताओं’ की खुशामदगी का शुरू दौर

महापौर को जनता नहीं अब पार्षद ही चुनेंगे फैसले के बाद बदली राजनीति

मुकेश हिंगड़ / उदयपुर. कांग्रेस शासन में निकाय चुनाव में सीधे महापौर और सभापति चुने जाने की आस लगाए बैठे नगर निकायों के उत्साहित राजनीतिक पदाधिकारियों को निराशा हाथ लगी है। पार्षदों की रजामंदी पर महापौर चुने जाने के सरकारी फरमान ने ऐसे लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, जो पद की चाह में अब तक लोगों की सेवा कर चुनावी मैदान में किस्मत आजमाने को तैयार बैठे थे। आदेश को लेकर राजनीतिक गलियारों में सोमवार को अजीब सा सन्नाटा दिखाई दिया। एक पक्ष जो राजनीतिक दलों के कद्दावर नेताओं की चाटुकारिता कर भविष्य बनाने में सक्रिय था, उनके चेहरे तो खिले दिखाई दिए, जबकि हकीकत में महापौर की योग्यता रखने वाले नेताओं को मायूसी हाथ लगी। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में एक बार फिर पार्षद बनने की होड़ लग गई है। वहीं निर्दलीय पार्टी के बूते भविष्य बनाने के लिए मैदान में ताल ठोंक रहे नेताओं के चेहरे पर उदासी का सन्नाटा छा गया है।
राज्य सरकार ने जैसे ही तय किया कि महापौर, सभापति व पालिकाध्यक्ष को पार्षद ही चुनेंगे। इसके बाद भाजपा व कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति में समीकरण जोड़े। वैसे इस फैसले से भाजपा तो राजी है और गहलोत सरकार को घेरना भी शुरू कर दिया वहीं कांग्रेस नेताओं ने अपने बचाव में कहा कि सरकार ने जनता की इच्छा को सर्वोपरी मानते हुए फैसला किया है। उदयपुर नगर निगम में भी महापौर बनने के लिए भाजपा व कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेताओं ने सपने संजोए रखा है, वे सरकार के सीधे जनता के जरिए महापौर के चुनाव कराने की प्रकिया से राजी भी थे लेकिन अब जब फैसला बदल दिया तो उनकी धरती खिसक गई। असल में वे इस तैयारी में थे कि टिकट मिलने के बाद चुनाव ही लडऩा था, अब तो पहले पार्षद का टिकट लाना है, उसके लिए सुरक्षित वार्ड और उसके बाद पार्षदों व पार्टी में अपने नाम को मजबूती से शीर्ष पर लाना।

370 का बुखार चढ़ गया कांग्रेस को : कटारिया

सरकार ने कानून बनाने की धज्जियां उड़ा दी, कांग्रेस ने घोषणा पत्र में रखा, सीधे कराने के बड़े भाषण विस में दिए है और अब वापस लौटकर वहीं आए। हमने सोच समझकर निर्णय किया था कि चेयरमैन किसी दूसरी पार्टी का और पार्षद किसी अन्य पार्टी के ज्यादा आ जाते थे, ऐसे में बजट तक पास नहीं होते थे। कांग्रेस को ३७० का बुखार चढ़ गया, मारे जाएंगे इसलिए फैसला बदल दिया।
- गुलाबचंद कटारिया, विस में नेता प्रतिपक्ष

जनता के मन बात सुनी सरकार ने : मीणा


जनता जिसमें राजी है उसमें सरकार भी। पार्टी ने पहले जो फीडबैक आए उसके अनुसार फैसला किया और अब जनता के मन की बात पहुंची तो सरकार ने जनता को सर्वोपरी रखा। रही बात कटारिया के धारा ३७० की बात तो बताना चाहुंगा कि वे तो कुछ भी बोल देते है, वोट कुएं में डालने से लेकर अपने ही पार्षदों के नहीं आने पर कहां मर गए जैसे भाषा का उपयोग करते थे, हमारे यहां ऐसे संस्कार नहीं है।
- रघुवीर सिंह मीणा, पूर्व सांसद

पहले ही समझ लेती सरकार : श्रीमाली


हमारी सरकार ने पार्षद से चुनने की जो प्रकिया की वह सही थी और इस नई सरकार को पहले ही समझ लेना चाहिए था। अब वापस फैसला पलटा, पार्षद ही निकाय मुखिया को चुने क्योंकि इसके अच्छे परिणाम आएंगे और विकास में कोई बाधा नहीं आएगी।
- रवीन्द्र श्रीमाली, जिलाध्यक्ष भाजपा शहर

सरकार ने सोच समझ कर ही निर्णय किया है।

पहले सरकार ने जो परिस्थितियां सामने आई उसके अनुसार निर्णय किया और अब जनता के सुझाव जो आए उसको माना है। हम निगम चुनाव को लेकर पूरी तरह तैयार है, हमने प्रभारी भी बना दिए है।
- गोपाल शर्मा, जिलाध्यक्ष शहर कांग्रेस

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Mukesh Kumar Hinger
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