गांव की सौंधी माटी से उपजा खरा 'सोना पगडंडी से शुरू हुआ सफर पहुंचा जापान तक

- एक आइडिया ने पहुंचाया जापान - .िपता के एक सबक ने नारायण की जिंदगी बदल डाली है, सिर्फ इतनी सी बात कि जो पढ़ों उसका दैनिक जीवन में उपयोग होना चाहिए। केवल किताबी ज्ञान में नहीं बंधकर असल में खेतों की क्यारियों में जाकर किसान का दर्द समझने वाला नारायण अब जापान पहुंच चुका है, उसने कुछ ऐसा कर दिखाया जो उसकी उम्र के हर बच्चे के लिए किसी विशेष प्रेरणा से कम नहीं है।

By: bhuvanesh pandya

Updated: 29 Dec 2020, 09:46 AM IST

भुवनेश पंड्या
उदयपुर. उदयपुर के महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के एग्रिकल्चर में बीटेक फाइनल के विद्यार्थी नारायण गुजर ने उदयपुर की सड़कों पर घूम घूमकर ज्यूस की दुकानों से फ्रूट वेस्ट शामिल किया, यानी फलों के छिलके, बीज व अन्य वेस्ट। फिर उस पर प्रयोग शुरू किए। इससे पावडर बनाया। इस पावडर को लेकर अब वे स्टार्टअप के जरिए जापान में खुद की कंपनी खोल चुके हैं। यह कंपनी जापान व भारत के किसानों के लिए प्रति माह करीब दो हजार किलोग्राम पावडर तैयार कर रही है। ये पावडर कम पानी वाले क्षेत्रों में हर फसल उत्पादन में बेहतर परिणाम सामने ला रहा है।

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जापान से मिली 60 लाख की स्कोलरशिप राजसमन्द जिले के केरडी बुरज गांव के निवासी नारायणलाल गुर्जर ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि उन्हें इस पावडर के प्रजेन्टेशन के माध्यम से जापान के ओकिनावा स्टार्टअप एक्सीलेटर प्रोग्राम के तहत 60 लाख रुपए की स्कोलरशिप मिली थी। दुनिया भर से 300 प्रार्थना पत्र आए थे, रूस और भारत से दो टीम का चयन किया गया था। उनके साथ उनके एक अन्य साथी पूरणसिंह राजपूत भी थे। पिता देवीलाल गुर्जर किसान है और मार्बल का व्यवसाय करते हैं, मां अम्बू देवी गृहणी है। उदयपुर से 17 जून 2019 को जापान गए थे। इससे पहले वह उदयपुर के एमपीयूएटी व सीटीएई में शोध करते रहे और सफल हुए, फिर उन्होंने 2018 में इसका भारत में पेटेंट करवाया, जापान में 2020 में कंपनी रजिस्टर्ड की है। मिनिस्ट्री ऑफ एग्रिल्चर फिशरिज एण्ड फोरेस्ट्री ऑफ जापान ने अपने प्रोजेक्ट में इसे शामिल किया है।

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ऐसे बनाया फसल अमृतनारायणलाल ने फसल अमृत बनाया है, काफी कम पानी में यानी सूखे की समस्या में कोई किसान कोई इससे सूखे का प्रभाव कम कर सकता है, इसके लिए इस पावडर को मिट्टी में मिला देते है, इस पानी को सोखने की क्षमता को बढ़ा देता है। इसे एक एकड में पांच से सात किलोग्राम की जरूरत होती है। भारत में इस उत्पाद की बिक्री शुरू कर दी है। मासिक दो हजार किलोग्राम बना रहे हैं। बकौल गुर्जर उन्हें इसकी प्रेरणा अपने आंगन से ही मिली, उनके वहां घर में एक ही कुंआ था, ऐसे में पानी की कमी से सभी की फसलों को पनपने में परेशानी होती थी। 11 वीं में कक्षा में ये आइडिया आया जिसे बीटेक के दौरान पूरा किया, तीन वर्ष मेहनत कर पहला प्रोटोटाइप बनाया था। ये पूरी तरह से ऑर्गेनिक है, 300 रुपए प्रति किलोग्राम इसकी कीमत रखी गई है। वर्तमान में सोशियल अल्फा प्रोग्राम के माध्यम से बुंदेलखंड में करीब ढाई सौ एकड भूमि पर इसका उपयोग कर रहे हैं। जिसमें आईआईटी कानपुर, बिल गेट्स एण्ड मेलिंडा फाउण्डेशन व टाटा ट्रस्ट सहयोग कर रहे हैं।

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खड़ी कर दी कंपनीगुर्जर ने बताया कि कॉलेज के प्रो.एसएम माथुर, इन्क्यूबेशन सेंटर के प्रभारी ने उन्हें बेहद सहयोग दिया। इस उत्पाद के प्रजेन्टेशन के लिए वह लंदन, सिंगापुर, निदेरलेड आस्टे्रलिया में जा चुके हैं। अलग-अलग प्रोग्राम में देश का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें निदरलेंड और लंदन प्रथम स्थान हासिल किया था। अब वे जापान में वहां की सरकार के साथ मिलकर अपनी कंपनी इएफ पोलिमर प्राइवेट लिमिटेड खोल चुके हैं। उन्होंने भारत में भी किसानों तक अपना उत्पाद पहुंचाना शुरू कर दिया है।

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