udaipur news : अफगानिस्तान से आए और हुए बिलकुल देसी

udaipur news : अफगानिस्तान से आए और हुए बिलकुल देसी

bhuvanesh pandya | Publish: Sep, 06 2018 11:40:46 AM (IST) Udaipur, Rajasthan, India

- पत्रिका एक्सक्लूसिव
- एमपीयूएटी में अध्ययनरत विदेशी विद्यार्थी रच-बस गए भारतीय संस्कृति में

अफगानिस्तान से आए और हुए बिलकुल देसी

 

भुवनेश पंड्या.

. ये चारों अफगानिस्तान से हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति में रच-बस कर अब देसी होने लगे हैं। इनमें से शाहनवाज तो इतने धाराप्रवाह हिन्दी बोलते हैं, जैसे वे भारतीय हों। न केवल यहां का खाना अच्छा लगने लगा बल्कि स्थानीय लोगों से वे अपने देशवासियों की तरह जुडऩे लगे हैं।

यह बात है महाराणा प्रताप कृषि प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के आरसीए कॉलेज में पढऩे वाले अफगानिस्तान के विद्यार्थियों की। भारत-अफगानिस्तान शैक्षणिक आदान-प्रदान के तहत ये भारत में कृषि की शिक्षा लेने आए हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:दयपुर को ये अब दूसरा घर समझने लगे हैं। झीलों की नगरी से :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें प्यार हो गया है।

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शुरुआत में महसूस किया बड़ा असहज
अफगानिस्तान में कंधार के समीप स्थित जाबुल निवासी शाहनवाज काकर ने बताया कि वे करीब साढ़े चार वर्ष से यहां पढ़ रहे हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें यहां का देसी खाना पहले अच्छा नहीं लगता था, लेकिन अब यह पसंद आने लगा है। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने कहा कि वह शुरुआत में यहां बड़ा असहज महसूस करते थे, :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें न तो ढंग से अंग्रेजी आती थी और ना ही हिन्दी, लेकिन अब वे सीख गए हैं। शाहनवाज सीटीई से एमटेक कर रहे हैं। इससे पहले वे कुछ माह आंध्रप्रदेश में रह चुके हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें यहां पढ़ाई खर्च के लिए इन्टर्नशिप के तौर पर करीब 16 से 17 हजार रुपए मिलते हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने बताया कि यहां मौसम बिलकुल अलग है, हमारे वहां बर्फ गिरती है, जबकि यहां ऐसे नजारे नहीं है।

रोटी और सब्जी लगने लगी अच्छी

शाहनवाज वे अब भारत में रहकर यहां के लोगों जैसे दिखने लगे हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने अफगानिस्तान की चर्चा करते हुए बताया कि वहां रोटी बेहद मोटी होती है, यहां पतली रोटी मिलती है। डेढ साल में भारतीय खाना खाने लगे हैं। अफगानिस्तान मिन्स्टिरिया फायर एजुकेशन कार्यक्रम के तहत यहां पढ़ रहे हैं।

एमपीयूएटी के इन्टरनेशनल हॉस्टल में ये शाहनवाज, रेफुद्दीन आमिनी, शमशुल्लाह ओर रोनुल्लाह रहते हैं। रेफुद्दीन और रोनुल्लाह एमएससी कर रहे हैं, तो शमशुल्लाह बीएससी कर रहे हैं। रेफुद्दीन थोड़ी-थोड़ी हिन्दी समझने लगे हैं। इन्होंने बताया कि यहां पर कम मसाले की सब्जी खाई जाती है। शाहनवाज ने बताया कि जाबुल कस्बे के मौसम को :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:दयपुर जैसा ही है। आतंकवाद पर :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने कहा कि खौफ है, आतंकी सक्रिय हैं।
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पूरा देश प्यारा

अफगानिस्तान के इन विद्यार्थियों ने बताया कि वे दिल्ली, आगरा, दक्षिण भारत और जयपुर सहित भारत के कई हिस्से देख चुके हैं, :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें सारा देश प्यारा लगता है। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने बताया कि अफगान और भारत की करंसी एक समान ही है, हालांकि वहां सूखे मेवे यानी बादाम, काजू और अन्य मेवे आधे से भी कम दामों में मिलते हैं। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्होंने बताया कि अफगानिस्तान में बलात्कार करने वाले के लिए मौत की सजा का प्रावधान है, :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:से घृणित नजरों से देखा जाता है। सख्त सजा के कारण वहां कोई ऐसे कृत्य का सोच भी नहीं सकता।

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मुझे तो लगता ही नहीं कि घर से दूर हूं ...

अनामिका नेपाली : एग्रोनोमी में एमएससी कर रही अनामिका नेपाल की रहने वाली है। नेपाल में बारहवीं तक पढी़। इसके बाद भारत सरकार की ओर से आयोजित परीक्षा :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:त्तीर्ण कर यहां आई। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:नका घर जनकपुर है। भगवान राम और सीता का विवाह वहीं हुआ था। भारत में वर्ष 2012 से पढऩे आई। इलाहाबाद से सेम हिगिंग बोटम यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एण्ड टेक्नोलॉजी से स्नातक किया। अब वह एमएससी एग्रोनोमी द्वितीय वर्ष में है। :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:सने बताया कि नेपाल के लिए भारत देश बहुत कुछ कर रहा है। नेपाल में पुरुष के लिए ढाका टोपी, महिला के लिए बुनिया चोली का पहनावा पारंपरिक है, तो यहां पर कुछ कुछ दूरी पर बदलता परिदृश्य खूब लुभाता है। अनामिका ने बताया कि अब तो लगता ही नहीं कि घर से दूर हूं।

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इंडो-अफगानिस्तान कार्यक्रम के तहत यह शुरुआत है। अफगानिस्तान में विवि खोला जाएगा, लेकिन इससे पहले कृषिगत पढ़ाई के लिए ये विद्यार्थी भारत में पढ़ रहे हैं। इसका पूरा खर्च कृषि मंत्रालय वहन करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से :ष्शश्च4ह्म्द्बद्दद्धह्ल:न्हें खर्च राशि मिल्
ाती है। यहां पढऩे से संस्कृति का आदान-प्रदान तो होता ही है।

डॉ.अरुणाभ जोशी, डीन, आरसीए, एमपीयूएटी

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