राजस्थान में यहां है अनूठी परंपरा, चिडि़या को सुबह पकड़ते हैं आदिवासी युवक, शाम को करते हैं आजाद

दिनभर दाना-पानी खिलाने के बाद शाम को ढोल बजाकर उड़ाते हैं आसमान में, पूरे गांव की रहती है उस पर नजर

By: jasraj ojha

Published: 16 Jan 2021, 12:36 AM IST

उदयपुर. हर क्षेत्र की अलग-अलग परम्पराएं हैं, जिन पर उन क्षेत्रों के लोग विश्वास करते आए हैं। ऐसी ही एक परंपरा है उदयपुर के आदिवासी इलाके में हैं जहां मकर संक्रांति के दिन एक चिडिय़ा को पकडऩे के बाद उसे उड़ाकर इस साल का भविष्य जानते हैं। यह अनोखी परम्परा साल में एक दिन मकर संक्रांति के दिन ही निभाई जाती है। आदिवासी समूह इस साल का भविष्य जानने के लिए एकत्रित होते हैं। उदयपुर जिले के झाड़ोल, सराड़ा, गोगुंदा आदि क्षेत्रों में यह परंपरा निभाई गई। परंपरा है कि आदिवासी युवक इस चिडि़यां जिसे डूसकी, डूचकी या देवी पक्षी बोलते हैं। उसे घौंसले से पकड़कर लाते हैं। इसे दिनभर दाना-पानी खिलाने के बाद ढोल बजाकर इस पक्षी को आसमान की ओर उड़ा दिया जाता है। यदि यह चिडिय़ा किसी हरे पेड़ पर या पानी वाली जगह पर बैठती है तो माना जाता है कि आने वाले दिन यानी यह साल उनके लिए अच्छा रहेगा। यानी इस साल अच्छी बारिश होगी। यदि यह चिडिय़ा किसी सूखे पेड़ या पथरीली जमीन पर जाकर बैठती है तो माना जाता है कि आने वाले दिन मुश्किल भरे रहेंगे।

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बच्चे गाते हैं डूचकी मारू, खीसड़ो आलो..
आदिवासी एवं छोटे से लगाकर बड़े ग्रामीण एक दिन पूर्व रात को जंगल जाकर घोंसलें मे बैठी डुसकी (चिडिय़ां) को पकड़कर ले आते हैं। मकर संक्रति की सुबह चिडिय़ां को हाथ में पकड़ कर ग्रामीणों को दिखाने पर शगुन के तौर पर ग्रामीणों से रुपए, मिठाई, ऊनी वस्त्र, पुराने कपड़े, गेहूं का दान पुण्य लेते हैं। इसके बाद ग्रामीण उस आदिवासी के हाथों मे पकड़ी चिडि़यां को मुक्त करा देते हैं। सराड़ा. इस परंपरागत के तहत ग्राम पंचायत सर्सिया के समस्त फलां में युवाओं व नन्ने मुन्ने बालक बालिका की टोली बनाकर डूचकी पकड़कर घर- घर जाकर डूचकी मारू, खीसड़ो आलो, कहकर घर घर घुमाते हैं।
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गांव में घुमाते हैं चिडि़या
गोगुंदा गांव में एक चिडिय़ा (डुस्की )को पकड़ा जाता है। इस चिडिय़ां को देवी का रूप माना जाता है। जिसकी वजह से उसे प्रत्येक घर पर घुमाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गांव में घर-घर ले जाने से गांव में शांति और खुशहाली रहती है। दिन भर चिडिय़ां का लाड करते हैं। घरों में बनी खिचड़ी को खिलाया जाता है और शाम को एक पहाड़ी पर लोग इक्कठे होते हैं। बाद में इसे आजाद करते है। यह प्रथा राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है।

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