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tradition of tribal society पूर्वजों की अस्थि विसर्जन के लिए शोक मेला

tradition of tribal society

आदिवासी समाज की प्राचीन परम्परा के तहत आयोजित होता है मेला

उदयपुर

Published: April 02, 2022 06:08:42 pm

उदयपुर. कोटड़ा. राजस्थान और गुजरात की सीमा पर गुणभाखरी नामक गांव में त्रिवेणी संगम में उदयपुर जिले से 132 किमी दूर आदिवासी समाज द्वारा पूर्वजों की अस्थि विसर्जन के लिए शोक मेला भरा जाता है। राजस्थान के बेणेश्वर धाम के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा आदिवासी समाज का मेला है, जिसे अस्थि विसर्जन के कारण आदिवासी लोगों का हरिद्वार भी कहा जाता है।
राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र गुणभाखरी नामक गांव में आयोजित इस मेले को चित्र-विचित्र मेले के नाम से जाना जाता है। राजस्थान एवं गुजरात के अलावा अन्य कई राज्यों से हजारों की संख्या में लोग इसमें शामिल होते हैं। यह स्थान तीन नदियों आकळ, वाकल और साबरमती के मिलने का संगम है। भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल एकम से यहां मेला भरना शुरू हो जाता है। आदिवासी बाहुल गुजरात के साबरकांठा और बनासकांठा तथा राजस्थान की कोटड़ा तहसील के आसपास के लोग इसमें शामिल होते है। यहां आए लोग पूर्वजों की अस्थि विसर्जन (हाड़ घोलना) करते हैं। उनकी यह मान्यता है कि पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष मिलेगा। अस्थि विसर्जन के दौरान रुदन या शोक व्यक्त करने के बाद मृतक के पुत्र या घर के मुखिया को नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा धोती और लाल साफा पहनाकर प्रसाद वितरण करने के बाद मेला शुरू हो जाता है। इस मेले का आयोजन सेबलिया पंचायत और पंचायत समिति खेडब्रह्मा के सहयोग से होता है। यह मेला दो दिन तक चलता है।
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यह है इतिहास
बताया जाता है कि 6 हजार साल पहले महाराभारत काल में हस्तिनापुर राज्य राजा शांतनु के दो महारानियां थी। एक मत्स्यगंधा और दूसरी गंगा। मत्स्यगंधा के दो पुत्र थे चित्रवीर्य और विचित्रवीर्य और गंगा के एक पुत्र गांगवेजी भीष्म पितामह थे। एक बार भीष्म पितामह मत्स्यगंधा की सेवा कर रहे थे। मत्स्यगंधा अपने शयन कक्ष में एकांत में थी और पितामह ने देखा की उनके पैर जमीन पर है उन्होंने उसे सही किया और उनके पैर दबाकर उनकी सेवा करने लगे। अचानक चित्रवीर्य और विचित्रवीर्य दोनों भाई आए और उन्होंने यह ²श्य देखा तो उनके मन में पापा आ गया, लेकिन जब दोनों भाइयों को पता चला कि भीष्म उनकी मां की सेवा कर रहे थे उन्हें ग्लानि हुई। मन में आए इस पाप का निवारण करने के लिए उन्होंने गुणभाखरी नामक स्थान पर आए और तपस्या की।

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