उदयपुर के सभी 55 वार्ड टूटेंगे, उनसे बनेंगे 70 वार्ड, नहीं बढ़ेगी सीमा, जानें पूरी कहानी

उदयपुर के सभी 55 वार्ड टूटेंगे, उनसे बनेंगे 70 वार्ड, नहीं बढ़ेगी सीमा, जानें पूरी कहानी

Bhagwati Teli | Updated: 12 Jun 2019, 12:43:09 PM (IST) Udaipur, Udaipur, Rajasthan, India

निगम वार्ड पुनर्गठन के लिए बनाएगा टीम, सीमा के मानचित्र मांगेंगे

उदयपुर. नगर निगम के वार्डोँ के पुनर्गठन की कवायद् के बीच राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई है। भाजपा व कांग्रेस ने पुनर्गठन पर पूरी निगाह रखना शुरू कर दिया है तो नगर निगम ने इस कार्य को शुरू कर दिया है। सबसे पहले निगम टीम बनाएगा और इसके साथ ही सीमा ज्ञान के मानचित्र संबंधित विभागों से मंगाए जाएंगे। यह भी स्पष्ट हो गया है कि नए इलाके नहीं जुड़ेंगे और जो 55 वार्ड अभी है वे सभी ही टूटेंगे और उनमें से ही 70 वार्ड बनेंगे।


वार्डों के पुनर्गठन को लेकर कई जनप्रतिनिधि कलक्ट्रेट पहुंचे। वहां जाने के बाद उनको पता लगा कि पुनर्गठन का काम इस बार कलक्ट्रेट से नहीं नगर निगम से होगा तो वे निगम पहुंचे। वहां से नेताओं ने वार्ड पुनर्गठन को लेकर पुरानी जानकारियां व मानचित्र जुटाए। वैसे पुनर्गठन के बाद भाजपा व कांग्रेस में सरगर्मियां बढ़ गई है। पार्टी में सबसे पहला जोर इस बात पर दिया गया कि पुनर्गठन की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हो इस पर पूरी नजर रखी जाए और नियम-कायदों का पूरा अध्ययन कर तैयारी रखे। नगर निगम अब टीम का गठन करेंगी और इससे पहले अब विधानसभा, पुलिस थाने और उपखंड क्षेत्र की सीमा को लेकर संबंधित विभागों से नक्शा मंगाया जाएगा। इसी प्रकार जिले की फतहनगर-सनवाड़, भींडर, कानोड़ एवं सलूंबर नगर पालिका क्षेत्रों में भी वार्ड बढऩे के साथ ही दोनों राजनीतिक दलों में सरगर्मियां बढ़ गई है। पार्षदों के चुनाव लडऩे वाले अभी से ही वार्डों के पुनर्गठन को लेकर अपने-अपने कयास लगाने लग गए है।

छोटे-बड़े सभी वार्ड तोडेंगे
नगर निगम में सरकार के आदेश का अध्ययन किया गया। बताया गया कि शहर में 55 जो वार्ड है उनमें से बड़े व छोटे नहीं सभी वार्डोँ को तोडक़र ही 70 वार्ड बनाए जाएंगे। यह साफ कर दिया गया कि वार्डोँ के पुनर्गठन में सिर्फ जो वार्ड है उसमें ऐसा नहीं होगा कि बड़े वार्डोँ को ही तोड़ दिया जाएगा, बड़े हो या छोटा सभी वार्डों को तोडक़र 70 वार्ड बनाए जाएंगे।

भाजपा के गढ़ वाले वार्डों और अपने वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
नगर निगम में वार्डों की संख्या बढ़ाने के बाद कांग्रेस के नेताओं की नजरें अब अपने प्रभाव वाले इलाकों पर लग गई है। कांग्रेस के निचले स्तर और पार्षद बनने की दौड़ में शामिल नेताओं की नजरें इन वार्डों को विभाजित करने पर लग गई हैं।

अतीत के झरोखे से
उदयपुर में नगर पालिका मंडल की स्थापना वर्ष 1922 में मेवाड़ प्रशासन की ओर से की गई थी। इसके सदस्य मनोनीत किए जाते थे। बाद में जुलाई 1948 में नगर निगम का गठन किया गया था, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात राजस्थान की नगर पालिका में एक रूपता लाने के लिए 13 अक्टूबर 1959 को लोकतांत्रिक आधार पर नगर परिषद गठित की गई। यहां 17 अक्टूबर 1973 से 25 नवंबर 1994 तक चुनाव के अभाव में प्रशासन की व्यवस्था थी। 29 नवंबर को पुन: जनप्रतिनिधियों का बोर्ड गठन हुआ। उसके बाद से लेकर अब तक यहां पांच बोर्ड में लगातार भाजपा ने ही बोर्ड बनाया है। तब से किरण माहेश्वरी, युद्धिष्ठिर कुमावत, रवीन्द्र श्रीमाली व रजनी डांगी सभापति रही। रजनी के कार्यकाल में नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया।

रजनी डांगी सीधे चुनाव से सभापति चुनी गई थी। इसके बाद हुए चुनाव में फिर भाजपा जीती व चन्द्रसिंह कोठारी महापौर चुने गए, कोठारी को जब महापौर चुना गया तब भाजपा 55 में से 49 वार्डों में जीतकर आई थी और कांग्रेस ने गिनती के वार्ड जीते थे। अब इसी साल होने वाले चुनाव में भी नया होगा क्योंकि सरकार ने इस बार महापौर का चुनाव सीधे करने का निर्णय किया है।

 

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