बर्ड विलेज मेनार में दिखा आसमान के बादशाहों का झुंड, विलुप्तप्राय प्रजातियों के 160 गिद्ध एक साथ दिखे

नब्बे प्रतिशत क्रेश हो चुके गिद्धों के झुंड ने बर्ड विलेज मेनार में डाला डेरा

 

By: Mukesh Kumar Hinger

Published: 06 Mar 2021, 12:01 AM IST

उमेश मेनारिया

मेनार (उदयपुर) . त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के लिए लंकाधि पति रावण से युद्ध कर अपने पर को कटाने वाले एक खास किस्म के पक्षी कुछ वर्षो पूर्व झुंड के झुंड आकाश में उड़ते दिखाई देते थे। लेकिन आज गिद्ध ( वल्चर ) नाम से जाने जाने वाले पक्षी देखने को नही मिलते हैं आसमान इनकी ऊंची उड़ानों से खाली हो चुका है। गिद्धों की घटती संख्या के कारण पर्यावरण का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी बीच अपने अस्तिव को बचाने में लगे गिद्ध ने बर्ड विलेज मेनार में खुशनुमा आमद दर्ज कराई है ।

हमारे ईको सिस्टम से तेजी से गायब हो रहे गिद्धों की संकटग्रस्त प्रजातियों के गिद्ध बुधवार को बर्ड विलेज मेनार के केचमेंट क्षेत्र में हाइवे किनारे एक खेत मे मृत रोजड़े को खाते दिखे। ये झुंड 160 से अधिक था जिसमे अधिकांश ऊपर मंडरा रहे थे । इन गिद्धों में विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे लॉंग बिल्ड वल्चर , सिनेरियस वल्चर , हिमालयन वल्चर , यूरेशियन ग्रिफन सहित इजीप्शियन वल्चर मेनार में दिखाई दिए। आमतौर पर इस तरह एक या दो गिद्ध दिखना भी सुखद तस्वीर मानी जाती है लेकिन मेनार में संकटग्रस्त 4 प्रजातियों के 160 से अधिक गिद्ध झुंड में दिखे जो एक मृत रोजड़े को खा रहे थे । इन्हें पक्षी मित्र जमनेश दावोत , शिव सिंह राणावत , नंद लाल एवं संजय कुमार ने देखा था जो मृत पशु पर टूट कर पड़ रहे थे। गिद्ध कभी कभार ये भोजन करने में इतना मशगूल हो जाता है कि पास जाने पर भी यह नही उड़ता है।

90-95 प्रतिशत पॉपुलेशन क्रेश हुई

आसमान के बादशाह कहे जाने वाले मांसाहारी पक्षी गिद्धों की 90 से 95 प्रतिशत तक पॉपुलेशन क्रेश हो चुकी है। लगातर कम होती इनकी सँख्या से इनके अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है। ऐसे में दिवस पर और विंटर के आखरी दिनों में पर्यायवरण जगत के लिए सुखद खबर है। प्रवासी जलीय पक्षीयो के साथ मेनार सहित आस पास इलाके में गिद्धों की सँख्या तेजी से बढ़ रही है। यहां की प्राकृतिक आबोहवा व अनुकूल रहवास स्थानीय गिद्धों के अलावा प्रवासी गिद्धों को भी रास आ रही है । आखरी बार गिद्धों का ऐसा झुंड 25 दिसंबर 2019 में वाइल्डलाइफ़ फोटोग्राफर के दल को दिखा था ।

आईयूसीएन की रेड लिस्ट में ये गिद्ध -

मेनार में एक साथ लॉंगबिल्ड वल्चर, युरेशियन ग्रिफन वल्चर , सिनेरियस वल्चर , हिमालयन ग्रिफन वल्चर एवं इजिप्शियन वल्चर का झुंड एक साथ दिखाई दिया है । जिसमे लॉन्ग बिल्ड वल्चर आईयूसीएन की रेड लिस्ट में क्रिटिकली एनडेन्जर्ड सूची में है वही ग्रिफन वल्चर भी खतरे की सूची में है।


बीमार मृत पशुओं के खाने से खत्म हुए थे गिद्ध - रिसर्च के अनुसार पेस्टिसाइड व डाइक्लोफैनिक के अधिक इस्तेमाल के चलते गिद्ध प्रजाति संकट में पहुंची है। फसलों में पेस्टीसाइड के अधिक प्रयोग से यह घरेलू जानवरों में पहुंचता है। जानवरों के मरने के बाद मृत पशु खाने से गिद्धों में पहुंचता है। पेस्टिसाइड से इनके शारीरिक अंग किडनी फैलियर हो जाते हैं। इससे इनकी प्रजनन क्षमता खत्म हो जाने के कारण आज गिद्ध संकटग्रस्त पक्षियों की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। 1990 के दशक से ही देशभर में गिद्धों की संख्या गिरने लगी थी। गिद्धों पर यह संकट पशुओं को लगने वाले दर्द निवारक इंजेक्शन डाइक्लोफेनिक की देन थी। मरने के बाद भी पशुओं में इस दवा का असर रहता है। गिद्ध इन मरे हुए पशुओं को खाते हैं। ऐसे में दवा की वजह से गिद्ध मरने लगे। इसे ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने पशुओं को दी जाने वाली डाइक्लोफेनिक की जगह मैनॉक्लीकेन दवा का प्रयोग बढ़ाया है। यह दवा गिद्धों को नुकसान नहीं पहुंचाती। इसके अलावा देशभर में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास शुरू किए गए। अब अनेक इलाको कुछ समय से गिद्धों की अलग-अलग प्रजातियों के बड़े झुंड फिर से नजर आने लगे हैं।

एक्सपर्ट का कहना ये है

देशभर में गिद्ध की करीब 90 से 95 प्रतिशत पॉपुलेशन क्रेश हो चुकी है । मेनार में विलुप्तप्राय संकटग्रस्त गिद्धों का दिखना सुखद संकेत है। लॉन्ग बिल्ड वल्चर आईयूसीएन रेड लिस्ट में क्रिटिकली एनडेन्जर्ड की सूची में शामिल है। लॉन्ग बिल्ड वल्चर पहाड़ी इलाको में खड़ी और ऊंची पहाड़ी पर अपना घोसला बनाता है। जंहा लोग नही पहुँच सकते है । युरेशियन ग्रिफन वल्चर , सिनेरियस वल्चर एवं हिमालयन वल्चर माइग्रेटरी है जो सिर्फ सर्दी के दिनों में फीडिंग के लिए देशान्तर गमन कर यहां पहुचते है । ये हिमालय के उस पार मध्य एशिया , युरोप , तिब्बत मंगोलिया एवं समांतर शित प्रदेश इलाको से आते है । जितने भी सारे गिद्ध है वे दिन में ही क्रियाशील रहते है । ये आकाश में गोल गोल चक्कर काटते रहते है और झुंड में अपना भोजन करते है ।
- डॉ. सतीश शर्मा, वन्यजीव विशेषज्ञ उदयपुर

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