हमें नाज है हमारे 'लाल, पर ...देश पर जान लुटाकर हमारा सीना गर्व से और चौड़ा कर गया

- 26 जनवरी विशेष
- बेटे ने देश पर कुर्बान हो नाम किया रोशन

- संभाग के शहीदों के परिवार की कहानी

By: bhuvanesh pandya

Published: 27 Jan 2021, 06:39 AM IST

भुवनेश पंड्या
कतरा-कतरा देश का है, चाहे जान चली जाए लेकिन मन से कुर्बानी का जज्बा नहीं जा सकता। ये होंसला ही तो है, जिसने देश के लिए कुछ करने का मौका दिया। बेटा देश पर न्यौछावर हो गया, इसका उन्हें गम नहीं है। बस उनके मन में दर्द इतना है कि वह असमय नहीं जाता तो देश के लिए और भी कुछ कर पाता। दुश्मनों के दांत खट्टे कर पाता। दास्तानं उन शहीदों के परिवारों की है, जो देश पर हंसते-हंसते शहीद हो गए। ये उनकी दीवानगी ही है जो बेटा खोने के बाद ये कहते है कि यदि हमारे और बेटे होते और सरकार अवसर दे तो वह भी देश सेवा पर मर मिटते।

----

उदयपुर. तिरंगे में लिपटकर जब बेटा लौटा था तो उसका चेहरा देख लगा जैसे अभी उठकर खूब सारी बातें सुनाना शुरू कर देगा, लेकिन ऐसा हो ना सका। अब उसकी बात पूरी दुनिया कर रही है, हमें नाज है कि हम ऐसे वीर बेटों के माता-पिता है।

------

शहीद सिपाही शिवपाल सिंह - बलिजस्सा खेड़ा, भीम

पिता सुबेदार सत्यपाल सिंह का कहना है कि उनका बेटा शिवपाल 10 नवम्बर 2019 को उन्हें अकेला छोड़ गया। एक पिता के लिए इससे बड़ा कोई दर्द नहीं होता कि उसका बेटा उसके कांधे पर चढ़कर दुनिया से विदा हो जाए। बस यहां गम इसलिए भूल गए कि वह देश पर शहीद हुआ। मां गीता कंवर के आंसू अब तक नहीं सूखे। पिता ने बताया कि उसके लिए उन्होंने उनके गांव के एक सूबेदार की बेटी से रिश्ते की बात चलाई थी, जल्द ही उसकी शादी होने वाली थी, लेकिन ये इच्छा मन में ही रह गई। अब एक तमन्ना है कि उसके नाम पर जा स्कूल है, शहीद शिवपाल सिंह राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बली को वह दसवीं यानी माध्यमिक तक करवाना चाहते हैं। पिता ने बताया कि महाजन फील्ड फायरिंग रेंज सूरतगढ़ (बीकानेर) में युद्धाभ्यास की फायरिंग कर रहे थे। पुराना कोई बम पड़ा था, उसका पैर उस बम पर पड़ा और वह शहीद हो गया। उम्र 22 वर्ष बांका जवान परिवार छोड़ चल दिया। पिता सत्यपाल ने बताया कि शिवपालल परम्परा निभा रहा था, पूरा परिवार सेना में रहा, जैसे वह उसी पलटन 11 मेटेनाइज इन्फ्रन्ट्री में 28 वर्ष रहे। उसके दादा- अर्जुनसिंह, आर्मी एएमसी आर्मी मेडिकल कोर में थे। तो दादा के पिता भोजसिंह ब्रिटिश आर्मी में थे। सूरतगढ़ मिलेट्री हॉस्पिटल में गए थे। मां थी। जवान बेटा जाता है तो दिल से नहीं निकलता नहीं। दो बेटे और है। दोनों ने भी सेना में जाने का प्रयास किया, लेकिन चन्द्रपालसिंह का सेना में हो गया था। हाइट की कुछ कम पडऩे से उन्हें आरसी सेंटर गोलकुंडा हैदराबाद से वापास भेज दिया। बड़े बेटे का बेटा यानी पोता जिगर सात महीने का है। उसे सेना में भेजने की इच्छा है। शहीद का भाई चन्द्रपाल फुटबॉल का राष्ट्रीय खिलाड़ी है।

-----

गर्व है बेटे पर कि वह देश की रक्षा में शहीद हुआ

राजसमन्द जिले के शेखावास गांव के शहीद परवेज के पिता मांगू काठात का कहना है कि बेटे जाने का दुख है लेकिन गर्व बहुत है। परवेज सेना में 16 नवम्बर 2009 को फाइव ग्रेनेडियर बाद उसकी पोस्टिंग ऊरी में हुई। 28 मार्च 2019 को सुबह पांच बजे का वक्त था, पेट्रोलिंग के दौरान भारी बर्फबारी हो रही थी। दूसरी ओर से पाकिस्तान ने गोलीबारी शुरू कर दी और इसी शहीद हो गया। वे चाहते है कि सीनियर शेखावास स्कूल का नाम उनके बेटे के नाम पर हो जाए। मां शांति उसके जाने के बाद बीमार रहने लगी है। शहीद के पिता मांगू भी आर्मी मेंं फाइव ग्रेनेडियर में रहे। दूसरा बेटा इकबाल 16 ग्रेनेडियर में नौसेरा में कार्यरत है। परवेज की पत्नी शहनाज है। बेटा जिशान तीन वर्ष का है तो बेटी रूबिया पांच वर्ष की है। वह किसी बीमारी की वजह से चल फिर नहीं पा रही है, केवल दूध पिती है, कई चिकित्सालयों में दिखाया है, लेकिन कुछ नहीं हो पाया। वह ठीक हो जाए तो पूरे परिवार की मुराद पूरी हो जाएगी।

----

हर पल याद आता है बेटा लेकिन गर्व है कि देश के नाम शहीद हुआ...

उदयपुर के मार्डन कॉम्पलैक्स के समीप गुरु देवेन्द्र अपार्टमेंट की निवासी शहीद अर्चित वर्डिया की मां बिना वर्डिया का कहना है कि बेटा हर पल याद आता है, लेकिन गर्व इस बात का है कि वह देश पर शहीद हुआ। सेना में 2009 में भर्ती हुए अर्चित, 2010 में कमिशन मिला। इसके बाद वह 175 मिडियम रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के पद पर काम करने लगे। 23 वर्ष की उम्र में - 50 डिग्री सेल्सियस में ऑपरेशन मेघदूत के समय 20 जुलाई 2011 में पाक की ओर से फायरिंग में शहीद हो गए। कश्मीर के पंचगांव में सियाचिन में भी कार्यरत रहे। पिता स्व. दिनेश वर्डिया मार्बल व्यवसायी थे, लेकिन उन्होंने ही अर्चित को सेना में जाने के लिए प्रेरित किया। पिता चाहते थे कि वह आर्मी में जाए, अर्चित स्पोट्र्स पर्सन थे। कई ख्वात उनके अधूरे रहे, वह बड़ी गाड़ी में देश दुनिया का सफर करना चाहते थे। उनका कहना था कि जब मौत आए तो शान से विदा हो। बहन दिव्यानी बर्डिया उदयपुर में सेल टेक्स ऑफिसर है।

------

शहीद रतनलाल की पत्नी पुष्पा मीणा ने बताया कि उन्हें अपने पति रतनलाल मीणा पर गर्व है। वह हमेशा उनके जहन में जिंदा है। शहीद का परिवार वर्तमान में उदयपुर के न्यू राजेन्द्रनगर में निवासरत है। वह अजमेर सीआरपीएफ में कार्यरत थे। 2002 में जम्मू के पुलवामा में पाकिस्तान से लोहा लेते शहीद हुए थे। मूलत: बड़ी उंदरी गांव के निवासी थे। बेटे प्रवीण मीणा कलक्ट्रेट में पोस्टेड है। बेटी अनीता मीणा पढ़ रही है। बेटा यशवन्त अध्ययनरत है। बच्चों को अपने पिता पर गर्व है, वे कहते है कि शहीद हमेशा सभी के बीच जिंदा रहते हैं।

bhuvanesh pandya
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned