Video>>इसलिए खुलता है सालभर में एक बार उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर...जानें इसकी कहानी...

 Video>>इसलिए खुलता है सालभर में एक बार उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर...जानें इसकी कहानी...
darshan of nagchandreshwar on nag panchami at mahakal temple ujjain

Lalit Saxena | Publish: Jul, 27 2017 08:24:00 PM (IST) ujjain

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान शिव व अन्य देवी-देवताओं का आभूषण भी माना गया है।

उज्जैन. हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान शिव व अन्य देवी-देवताओं का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का, जो कि उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है।





कभी नागराज का जोड़ा रहता था यहां
इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। मान्यता है कि कभी नागराज तक्षक का जोड़ा स्वयं इस मंदिर में रहता था। कई लोगों ने इनके साक्षात दर्शन भी किए हैं। यही वजह है कि इस मंदिर में वर्ष भर ताले लगे रहते हैं, सिर्फ नागपंचमी पर विधिवत पूजन-अर्चन के बाद ही पट खोले जाते हैं। 




darshan of nagchandreshwar on nag panchami at maha

11वीं शताब्दी की अद्भुत प्रतिमा
श्रीनागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे दिखाई देते हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शैय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शैय्या पर विराजित है। शिव शंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए नजर आते हैं।

ये है इसकी कहानी...
सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सान्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया, लेकिन महाकाल वन में वास करने से पहले उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो, अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 




अति प्राचीन है यह मंदिर
यह मंदिर अति प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं। नागपंचमी पर भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए गुरुवार 27 जुलाई रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। शुक्रवार 28 जुलाई नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व पट पुन: बंद कर दिए जाएंगे। नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।

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महाकाल दर्शन के लिए अलग लाइन 
नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी। वहीं जो लोग शुक्रवार सुबह 4 बजे भस्म आरती करेंगे तथा दिन में भी जो लोग महाकाल दर्शन करेंगे, उनकी अलग से लाइन रहेगी। 




दोपहर में होगी सरकारी पूजा 
नागपंचमी के दिन दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करेंगे। यह सरकारी पूजा कहलाती है। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। इसी प्रकार रात 8 बजे श्रीमहाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन किया जाएगा। इसमें मंदिर समिति के प्रशासक सपत्नीक पूजा में शामिल होंगे। 

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