डॉ. मूसलगांवकर: जीवनभर फैलाया ज्ञान का प्रकाश, प्रदेश की चार हस्तियों में इन्हें भी चुना पद्मश्री के लिए

कई पुराणों का संस्कृत में अनुवाद अब भी कर रहे हैं। उनके पिता स्वं. सदाशिव मूसलगांवकर के सिंधिया स्टेट के प्रधान पंडित रहे हैं।

By: Lalit Saxena

Published: 26 Jan 2018, 01:51 PM IST

उज्जैन. उम्र ९३ साल। जीवनभर संस्कृत व साहित्य की सेवा में लगा दिया। १४ ग्रंथों का प्रणयन कर चुके और विभिन्न कक्षाओं की दर्जनों किताबें लिखी, जिनसें विद्यार्थी पढ़ते है। ढेरों विशिष्टताओं से भरे व्यक्तित्तव शहर के डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मूसलगांवकर को गुरुवार रात गृह मंत्रालय ने पद्मश्री सम्मान के लिए चुना। प्रदेश की चार ऐसी हस्तियों में वे भी चुने गए। माध्यमिक शिक्षा मंडल सेवा में शिक्षक रहकर पूरा जीवन दूसरों का ज्ञानोपार्जन किया। कई पुराणों का संस्कृत में अनुवाद अब भी कर रहे हैं। वे दीप्ति विहार में रहते हैं। उनके पिता स्वं. सदाशिव मूसलगांवकर के सिंधिया स्टेट के प्रधान पंडित रहे हैं।

फायर ऑफिसर का राष्ट्रपति पदक के लिए चयन
उज्जैन. उत्कृष्ट अग्निशमन सेवाओं पर नगर निगम फायर ऑफिसर अजयसिंह राजपूत का चयन राष्ट्रपति अग्निशमन सेवा पदक के लिए किया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक शर्मा ने बताया कि राजपूत वर्ष २०१२ से नगर निगम फायर ब्रिगेड उज्जैन में सेवारत है और सिंहस्थ २०१६ में ४० सब फायर स्टेशन, ११५० फायर ब्रिगेड कर्मचारी और ८५ से अधिक फायर वाहनों के साथ व्यवस्थाओं का नियंत्रण किया था। पदक के लिए पूरे देश के चयनित अधिकारियों की सूची में मध्यप्रदेश से केवल राजपूत एकमात्र अधिकारी हैं।

आजादी के ७० साल बाद भी वो दर्द जिंदा है...सुनिए इनकी जुबानी
उज्जैन. भारत की आजादी के ७० साल बाद भी बंटवारे का दर्द जिंदा है। उस समय फूट परस्ती की बात सामने थी। जिन्ना की जिद थी, पाकिस्तान को अलग से राज्य बनाने की। जिन्ना की जिद ने देश को काफी नुकसान पहुंचाया। देश की धरती कटी, हितक्षेत्र भी गए। जो सदियों से दिल्ली-लाहौर एक थे, वह दो हिस्सों में बंट गए। इसी तरह रावलपिंडी, करांची जो भारत में था, अलग हो गया। दंगे हुए, मारकाट मची, मगर इस देश के नेताओं ने सत्य-अहिंसा की भूमिका को बराबर निभाया। गुस्सा आने के बाद भी काबू पाया।

यह बात उज्जैन के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ९१ वर्षीय वयोवृद्ध अमृतलाल अमृत ने कही। उन्होंने बताया कि उस समय देश की आजादी को लेकर क्या-क्या लड़ाइयां लड़ी गई, क्या-क्या उथल-पुथल हुआ। बाद में संविधान का गठन हुआ, जिसमें देश के बड़े नेता शामिल हुए। 15 अगस्त १९४७ को देश आजाद हुआ, ध्वज वंदन हुआ। इसीके साथ यह निर्णय हुआ कि आम चुनाव होंगे, संविधान की धाराओं को देशभर में लागू किया जाएगा।

माउंट बेटन ने सिखाए पं. नेहरू को राजनीति के गुर
ब्रिटिश सरकार ने लंदन में भारत को आजाद करने की घोषणा कर दी थी, उस आधार पर गांधीजी को १९४३ में जब अंग्रेजों की तरफ से यह कहा गया कि आपकी आजादी की मांग स्वीकार की जाती है। आपकी क्रांति जो १९४२ की है, उसे सफल घोषित किया गया है। ऐसी सूरत में बैठक बुलाकर जल्द ही निर्णय लेंगे। १९४४ में शिमला में गोलमेच कांफ्रेंस में गांधीजी को शामिल होने को कहा गया। गांधीजी ने कहा मेरा प्रतिनिधित्व नेहरू करेंगे। १९४५ में लार्ड माउंट बेटन के साथ देश की राजनीति के काम को समझने और प्रधानमंत्री के क्या अधिकार होते हैं, यह सीखने के लिए वे १९४५ से ४७ तक लार्ड बेटन के साथ रहे।

Lalit Saxena
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