महामहिम की नसीहत- संस्कृत, संस्कृति और विरासत को बचाएं

महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय का प्रथम दीक्षांत समारोह , राज्यपाल और विवि के कुलाधिपति लालजी टंडन ने कहा- भगवान को लेकर विवाद हो सकते हैं, विद्वान निर्विवाद हैं

By: rishi jaiswal

Published: 03 Dec 2019, 09:00 AM IST

उज्जैन. हमारे देश की संस्कृत, संस्कृति और विरासत को विश्वभर में आत्मसात कर कार्य किए जा रहे हैं। इसके विपरीत भारत में संस्कृत के साथ संस्कृति पिछड़ रही है। आज संस्कृत, संस्कृति और विरासत को बचाने की आवश्यकता है। इसके लिए केवल उपाधि, प्रमाण-पत्र प्राप्त करने से ही कुछ नहीं होगा। सभी को मिलकर इसके लिए शोध, चिंतन और काम करना होगा। हमारे देश में राम-कृष्ण पर विवाद हो सकता है, लेकिन अतिप्राचीन भारत के विद्वानों पर कोई विवाद नहीं है।
उक्त बात प्रदेश के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति लालजी टंडन ने सोमवार को महर्षि पाणिनि संस्कृत व वैदिक विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन में कही। राज्यपाल ने कहा भारतीय संस्कृति की जो उपलब्धियां हैं, उसका उद्भव संस्कृत से हुआ है।
हम जगद्गुरु क्यों थे, इसका चिन्तन होना चाहिए- राज्यपाल ने कहा कि हम उस परम्परा के वारिस हैं, जिसने भारत को जगद्गुरु बनाया है। संस्कृत को जीवित रखने के प्रयास होना चाहिए। हम जगद्गुरु क्यों थे इसका चिन्तन होना चाहिए। दुनिया यह जानती है कि भारत ने ही सबसे पहले शल्य चिकित्साशास्त्र दिया। यह निर्विवाद है कि आचार्य सुश्रुत ने सर्जरी में सबसे मुश्किल विद्या प्लास्टिक सर्जरी को जन्म दिया। हमारे पूर्वजों ने विश्व को शून्य एवं दशमलव का अविष्कार करके दिया। संस्कृत जितनी सिकुड़ती गई उतनी ही हमारी संस्कृति पीछे जाती रही है। भगवान कृष्ण-राम पर विवाद हो सकता है, लेकिन सुश्रुत, आर्यभट्ट, पाणिनि जैसे अनके विद्वान निर्विवाद हैं।
पाणिनि विवि संस्कृत भाषा का संरक्षण कर रहा है
सारस्वत अतिथि, संस्कृत विद्वान उमा वैद्य ने कहा कि महर्षि पाणिनि विश्वविद्यालय संस्कृत भाषा का संरक्षण कर रहा है, इस बात में कोई संशय नहीं है। सत्य बोलना और धर्म का आचरण करना। यह भारतीय संस्कृति की दो आधारशिला है। विद्यार्थियों के लिए उपाधि ग्रहण जीवन का परिवर्तन बिन्दु है। दीक्षान्त समारोह में महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय कुलपति पंकज एम. जानी एवं उप कुलपति मनमोहन उपाध्याय ने अतिथियों का स्वागत किया। कुलाधिपति टंडन ने विश्वविद्यालय के कुलगान का विमोचन किया। इसके बाद छात्र-छात्राओं द्वारा कुलगान का गायन किया गया। दीक्षांत समारोह की जानकारी कुलसचिव एलएस सोलंकी ने दी। राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति लालजी टंडन के हाथों ६ पीएचडी शोधार्थियों और २७ (९ स्वर्ण, ९ रजत, ९ कांस्य) पदकधारी छात्रों को उपाधि प्रदान की। शेष पंजीकृत ४०१ छात्र-छात्राओं को अन्य अतिथि और कार्यपरिषद सदस्य द्वारा उपाधि प्रदान दी गई।
संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है: पटवारी
दीक्षान्त समारोह के मुख्य अतिथि प्रदेश के उच्च शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री जीतू पटवारी ने कहा कि हिन्दुस्तान की जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएं हैं, सबका उद्गम संस्कृत से हुआ है। संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है। सान्दीपनि महर्षि के गुरुकुल में भगवान कृष्ण एवं सुदामा दोनों ने यहां शिक्षा प्राप्त की। पुराने गुरुकुलों की परम्परा में न कोई छोटा होता था न बड़ा। समानता का यह संदेश विश्वभर में भारत की धरती से फैला है। महर्षि पाणिनि ने भाषा को व्याकरण दिया। भारत की प्राचीन ज्ञान व परम्परा का ज्ञान वसुधैव कुटुम्बकम में निहित है। मानवमात्र की सेवा और क्षमा की भावना क्या होती है, इसका उदाहरण हमारे देश के अलावा अन्यत्र मिलना कठिन है। विश्व में सत्य,अहिंसा परमोधर्म का संदेश देने वालों में महात्मा गांधी की पहचान है।

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