video : गोपाल मंदिर पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के पांच दिन बाद होता है यह बड़ा आयोजन, देखें वीडियो...

video : गोपाल मंदिर पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के पांच दिन बाद होता है यह बड़ा आयोजन, देखें वीडियो...

Lalit Saxena | Publish: Sep, 07 2018 01:25:15 PM (IST) Ujjain, Madhya Pradesh, India

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के पांच दिन बाद बछ बारस के दिन शहर के प्रसिद्ध गोपाल मंदिर पर मटकी फोड़ का आयोजन किया जाता है।

उज्जैन. भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के पांच दिन बाद बछ बारस के दिन शहर के प्रसिद्ध गोपाल मंदिर पर मटकी फोड़ का आयोजन किया जाता है। नन्हे कान्हा द्वारा दही-हांडी फोड़कर इस उत्सव को मनाया जाता है। सैकड़ों की संख्या में भक्तजन इन उत्सव में शामिल होते हैं।

बछ बारस पर होता है आयोजन
श्रीकृष्ण जन्म के तिथि अनुरूप पांचवें दिन बछ बारस (वत्स द्वादशी) शुक्रवार को गोपाल मंदिर पर परंपरा अनुसार भगवान का पूजन कर मटकी फोड का आयोजन हुआ। गोपाल मंदिर में सुबह भगवान के चरण पादुका का पूजन, अभिषेक के बाद मटकी फोड़ी गई।

वर्ष में एक ही बार होती है दिन में शयन आरती
इसके बाद वर्ष में एक ही बार दिन में भगवान की शयन आरती होती है। इसके साथ ही गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी उत्सव का समापन होता है। बताया जाता है कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

महिलाओं ने की गाय-बछड़े की पूजन
इसके अलावा शहर में सुहागिनों ने बछ बारस के अवसर पर गाय और बछड़े की पूजा भी की। ऐसी मान्यता है कि महिलाओं द्वारा संतान की सकुशलता और परिवार के सुख समृद्धि की कामना के साथ गाय और बछड़े की पूजा करने का विधान है। व्रत खोलने के लिए परंपरा अनुसार इस दिन महिलाएं चाकू से कटी हुई भोजन सामग्री से परहेज करती हैं।

क्यों करती हैं महिलाएं ऐसा
बताया जाता है कि बहुत पहले एक सास ने नई-नवेली बहू को घर में सब्जी बनाने को कहा और कहीं चली गई, बहू ने जाते समय सास से पूछा क्या बनाऊं तो सास ने कहा गऊला बना ले, बहू नहीं जानती थी कि गऊला किसे कहते हैं। उसने गाय के बछड़े को गऊला समझ लिया और उसे काट कर सब्जी बना ली। जब सास लौटी तो उसे पूरा घटनाक्रम मालूम हुआ तो रोने-बिलखने लगी कि ये तूने क्या किया। जब संध्या को गाय वापस लौटेगी और बछड़े को नहीं देखेगी तो पागल हो जाएगी। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि इसकी भूल क्षमा करें और बछड़े को फिर से जीवित कर दें। प्रार्थना स्वीकार हुई और बछड़ा पुनर्जीवित हो गया। तभी से यह व्रत चला आ रहा है, इसीलिए घरों में महिलाएं चाकू से कटी हुई सामग्री नहीं खाती हैं और न ही बनाती हैं।

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