मंगल रथ यात्रा निकली, तो उत्सवी हो गया पूरा माहौल...

जैन समाज की ओर से प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान का जन्म एवं दीक्षा कल्याणक 9 मार्च को विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया गया,

By: Lalit Saxena

Published: 09 Mar 2018, 08:24 PM IST

उज्जैन। जैन समाज की ओर से प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान का जन्म एवं दीक्षा कल्याणक 9 मार्च को विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया गया, जिसमें आदिनाथ भगवान के गीतों से शहर गुंजायमान हो गया। इस अवसर पर श्री जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक युवक महासंघ की ओर से श्री शीतलनाथ कांच मंदिर दौलतगंज में सामूहिक स्नात्र पूजन कराया गया। इसके बाद साध्वीवर्या प्रफुल्लप्रभा सहित चारों साध्वीवृंद की निश्रा में मंगल रथयात्रा निकाली गई, जो सखीपुरा, इंदौरगेट, दौलतगंज, नईसड़क, कंठाल, सराफा होते हुए रंगमहल धर्मशाला पहुंची।

श्वेतांबर जैन समाज के समस्त श्रीसंघ, ट्रस्ट मंडल, महिला मंडल, नवयुवक मंडल एवं बहुमंडल रथयात्रा में शामिल हुए। रथयात्रा में चांदी के रथ में विराजित भगवान आदिनाथ की विभिन्न स्थानों पर गवली की गई। महिला मंडल विशेष वेशभूषाओं में गीतों पर नृत्य करते हुए चल रही थी, तो नवयुवक मंडल जयकारा लगाते हुए चल रहे थे। रंगमहल धर्मशाला में धर्मसभा हुई, जिसमें साध्वीवृंद के विशेष प्रवचन हुए। दीप प्रज्ज्वलन महासंघ के राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनोद बरबोटा, संजय जैन मोटर्स, डॉ. संतोष जैन, नवीन गिरिया ने किया। शहर अध्यक्ष रितेश खाबिया ने स्वागत उद्बोधन द्वारा सभी का स्वागत किया। संजय कोठारी द्वारा संचालित इस सभा में मुख्य अतिथि पंडित भविष्य गुरु द्वारा भगवान आदिनाथ का वर्णन करते हुए बताया कि भागवत के पंचम अध्याय में भी भगवान ऋषभदेव आदिनाथ एवं उनके पुत्र का वर्णन है, ऋषभदेव को ज्ञान का अवतार तो भरत को प्रेम का अवतार बताया है। आभार सचिव राहुल सर्राफ ने माना। मीडिया प्रभारी वीरेंद्र गोलेछा ने बताया कि रथयात्रा के लाभार्थी अनूप कुमार, अनिल कुमार, सुनील कुमार जैन पावेचा का बहुमान अजेश कोठारी, प्रकाश गांधी, दीपक डागरिया, ललित कोठारी, दिनेश सोलंकी द्वारा किया गया। किडनी दान देने वाले पूरा लालजी गांधी का बहुमान हेमन्त पावेचा, नितेश नाहटा, संजय गिरिया, श्रीपाल राजावत द्वारा कराया गया। अतिथि अभिनंदन रूपेश नाहर, विकास जैन द्वारा किया गया।

तीर्थंकरों की जयंती नहीं कल्याणक मनाते हैं

साध्वीवृंद ने अपने प्रवचन में कल्याणक का महत्व बताते हुए कहा कि तीर्थंकरों की जयंती नहीं कल्याणक मनाते हैं क्योंकि उनके मन में जगत के प्रत्येक जीव के प्रति क्षमा मैत्री एवं कल्याण का भाव रहता है। यह तीन भावना आने पर मनुष्य का संसार में परिक्रमण मिट जाता है और इन तीनों भावना का केंद्र है करुणा। करुणा आत्मा से परमात्मा को मिलाने का मार्ग है, जिससे जीव शिव बन जाता है। करुणा भाव क्रोध, मान, माया, लोभ आदि दोषों से मुक्ति दिलाती है। निरंतर दीर्घकालीन रुचि के साथ की हुई साधना-आराधना मोक्ष का मार्ग है। उन्होंने कहा कि परमात्मा के अनंत गुणों का विवरण करने की ताकत तो हममें नहीं है, लेकिन परमात्मा के प्रति लगाव में कभी अभाव नहीं होना चाहिए।

Lalit Saxena
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