@KUMBH: स्वामी बोले 'ये संतों की दिवाली है, जो 12 बरस में आती है'

@KUMBH: स्वामी बोले 'ये संतों की दिवाली है, जो 12 बरस में आती है'

वे अनूठे संत हैं, कक्ष में उनकी मौजूदगी ही आपको ऊर्जा से भर देती है। वे शांत बैठे हों तो आस-पास सबकुछ ध्यान मग्न हो जाए और जब कुछ कहने लगें तो शब्दों का ऐसा प्रवाह शुरू हो कि आप मन की गहराइयों तक पहुंचे बगैर न रह सकें।

जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंदगिरि महाराज के पास मैं ढेर सारे सवाल लेकर पहुंचा। वे प्रभु प्रेमी शिविर में बने वैभवपूर्ण दत्त भवन में बैठे थे। आसपास अनुयायियों का जमघट लगा था। श्रद्धा से हाथ जोड़े लोग उनकी ओर अपलक निहार रहे थे। भगवा वस्त्रों में सहजता से आचार्य सोफे पर विराजमान थे। सामने टेबल पर गुरु की पादुुकाएं रखी थीं। उनकी सरलता, अप्रतिम विनम्रता और चेहरे पर खिलखिलाता सुकून पूरे कक्ष को दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण कर रहा था।
- अमित मंडलोई

उज्जैन. वे अनूठे संत हैं, कक्ष में उनकी मौजूदगी ही आपको ऊर्जा से भर देती है। वे शांत बैठे हों तो आस-पास सबकुछ ध्यान मग्न हो जाए और जब कुछ कहने लगें तो शब्दों का ऐसा प्रवाह शुरू हो कि आप मन की गहराइयों तक पहुंचे बगैर न रह सकें। उनके मुंह से निकला एक-एक शब्द रोम-रोम में झंकृत होने लगता है। वे बातों-बातों में धर्म और अध्यात्म से जुड़े गूढ़ विषयों से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े तमाम सवालों के जवाब दे देते हैं। वे मानते हैं कि आज ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है। आधुनिक जीवन शैली से उपजी जटिलताओं का हल भी एक लाइन में पेश करते हैं, सपने बुनो, लेकिन श्रम और संयम के साथ। श्रम के बगैर कोई भी उपलब्धि अधूरी ही रहेगी। संत से मुलाकात : आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंदजी ने समझाईं सिंहस्थ की परंपराएं, सुझाए परेशानियों के हल...

वैभव
पहला ही सवाल मैंने थोड़ा तीखा पूछ लिया। मैंने पूछा, हम संन्यासी का मतलब ही विरक्त और विरागी से लगाते हैं, जो सबकुछ छोड़कर सिर्फ ईश्वर आराधना में लगा है। फिर पेशवाई से लेकर संतों के पंडाल तक इतने वैभव की आवश्यकता क्या है। वे मुस्कुराते हुए बोले ये संतों की दिवाली है, जो 12 बरस में एक बार आती है। दिवाली में घरों की रंगाई-पुताई, अल्पना, मांडना होता है, उसी तरह संत अपनी दिवाली में भगवान के लिए पंडाल सजाते हैं। वैसे भी यह वैभव संत के लिए नहीं बल्कि भगवान और यहां आने वालेे भक्तों के लिए है।

पेशवाई और पंडाल
शाही का मतलब शाह खर्ची नहीं है। शाही का मतलब है, सरकार का बंदोबस्त। पूर्व में विभिन्न राज्यों से राजा गुरु को लेकर आते थे और यहां के राजा उनके आगमन का उत्सव मनाते थे, वाद्य यंत्रों के साथ उनकी अगवानी करते थे। गुरु पालकी में विराजते और राजा उन्हें कांधों पर उठाकर पैदल चलते थे। यही पेशवाई है। इसी तरह जिस दिन रियासत गुरु के स्नान के लिए घाट पर इंतजाम करती थी, वह शाही स्नान कहलाता था, क्योंकि इतने लाव-लश्कर के साथ घाट पर रोज गुरु के स्नान की व्यवस्था कर पाना आसान नहीं था। पर्व स्नान की बात अलग है। सामान्य तौर पर तो हम भी सहजता से जाकर घाट पर स्नान कर सकते हैं, लेकिन अपने मंडलेश्वरों को लेकर वहां जाते हैं तो फिर सारे इंतजाम करने ही होते हैं। हमने पूरा पर्यावरण हितैषी पंडाल बनाया है, अपना शिल्प दिखाया है कि कैसे मिट्टी, फायबर, लकड़ी, थर्माकोल आदि से एक महीने में इतना बड़ा स्ट्रक्चर बना सकते हैं। हमने यहां 60 हजार पौधे भी लगाए हैं। यह सब इसलिए ताकि लोग आकर यह शिल्प देख सकें, भारतीय संस्कृति को करीब से जान सकें।

सिंहस्थ भाव
मैं चमत्कृत था कि कैसे उन्होंने अखाड़ों की परंपरा और पेशवाई के इतिहास से लेकर पंडालों के वैभव की आवश्यकता का सटीक वर्णन किया। हालांकि मैं अभी भी उनसे और भी बहुत कुछ जानना चाहता था। मैंने पूछा, सिंहस्थ में लोग अलग-अलग मनोभाव के साथ आते हैं, आपके विचार में सिंहस्थ का सही पुण्य लेने के लिए लोगों को किस भाव के साथ आना चाहिए तो बड़े सहजता से बोले जहां-जहां मां शिप्रा का घाट है, वहां डुबकी लगाना ही सिंहस्थ स्नान है।

बच्चों की प्रवृत्ति 
अवधेशानंदजी युवाओं के मुद्दों पर बात करने लगे तो मुझे लगा छोटी-छोटी हार पर खुदकुशी जैसा कदम उठाने में संकोच नहीं कर रहे युवाओं को उनसे बेहतर मार्गदर्शन कौन दे पाएगा। मैंने पूछ ही लिया आखिर इसका क्या हल है। कोई प्रसिद्धि के शीर्ष से जरा सी फिसलन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है तो कोई छह माही परीक्षा में कम नंबर आने पर भी धैर्य खो देता है। उन्होंने बहुत ही सरल बात कही, बोले परिवारों में बच्चों का पोषण नहीं होता। उन्हें कलेक्टर, एसपी, इंजीनियर की तरह पाला जाता है। कहा जाता है कि ये तो लाल बत्ती में ही घूमेगा, लेकिन जो लाल बत्ती वाले हैं वे जानते हैं कि इसे पाना और निभाना दोनों ही कितना मुश्किल है।

नई पीढ़ी की दुविधाएं
मैंने पूछा नई पीढ़ी कई दुविधाओं में जी रही है, रिश्ते दरक रहे हैं, आस्थाएं डगमगा रही हैं। तो वे मुस्कराते हुए बोले, ये तुरत-फिरत बिना श्रम सब हासिल करना चाहते हैं। कई गलियारे ऐसे हैं, जहां लोग बिना योग्यता के अधिकार हासिल कर बैठे हैं। ये भी उसी तरह पाना चाहते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि यदि आप पात्र नहीं हैं तो कोई स्थान हासिल भले ही कर लें, उसमें पूर्णता नहीं आ पाएगी। खुद का ही सामना नहीं कर पाएंगे। कोई भी स्थान श्रम के बिना अधूरा है। ईश्वर ने हमें जो सबसे कीमती चीज दी है, वह आज है। सपनेे बुनो लेकिन श्रम और संयम के साथ तब ही जीवन सही दिशा में जा पाएगा।

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