टिप्पणी : इतनी सख्ती के बाद भी कानून-व्यवस्था बार-बार पटरी से क्यों उतर रही?

अपराध की ये तस्वीर उज्जैन में बीते एक हफ्ते की है। जितना पीछे जाएंगे, कमोबेश तस्वीर ऐसी ही मिलेगी।

By: Lalit Saxena

Published: 10 Feb 2018, 11:39 AM IST

गोपाल वाजपेयी@उज्जैन. अपराध की ये तस्वीर उज्जैन में बीते एक हफ्ते की है। जितना पीछे जाएंगे, कमोबेश तस्वीर ऐसी ही मिलेगी। दिन हो या रात, घर हो या सड़क। बदमाशों की धमाचौकड़ी जारी है। ये हालात तब हैं, जब पुलिस कप्तान ने बड़ी संख्या में बदमाशों को जिलाबदर किया। विवादास्पद व लापरवाह थाना प्रभारियों को हटाया। सवा सौ पुलिस कर्मियों के तबादले किए।

" एक बार फिर से निकलेंगे तलाश-ए-इश्क़ में,
दुआ करो कि इस बार कोई बेवफा ना मिले।
एक शायर की ये पंक्तियां याद आ गईं।" क्योंकि...


०८ फरवरी : पहली वारदात-कोर्ट परिसर में गवाही देने आए युवक पर दो बदमाशों ने चाकू से हमला किया। युवक गंभीर। एक बदमाश जिलाबदर है, दूसरा फरारी काट रहा है। दूसरी वारदात : रेलवे स्टेशन परिसर में बदमाशों ने महिला के गले से चेन व मंगलसूत्र झपटा।

०७ फरवरी : बागपुरा में रात्रि १२.३० बजे शराबियों का उत्पात। वाहनों पर पत्थर बरसाए। कई वाहन क्षतिग्रस्त। लोगों ने विरोध किया तो चाकू निकालकर मारने दौड़े।

०५ फरवरी : वसंत विहार में दो घरों में घुसे चोर। डेढ़ लाख रुपए से ज्यादा का सामान चोरी। वसंत विहार में गत दो साल में चोरी की २५ से ज्यादा वारदात। एक का भी सुराग नहीं।

०२ फरवरी : विवेकानंद कॉलोनी में सूने मकान में घुसे चोर। पड़ोसी ने हिम्मत दिखाई। डायल-१०० मौके पहुंची। चोर डरकर भाग गए।

०१ फरवरी : पहली वारदात : बेहद व्यस्त इलाका चरक अस्पताल के सामने दिनदहाड़े बाइक सवार बदमाशों ने महिला के कान से झुमकी झपटी। दूसरी वारदात : कांच मंदिर में घुसे चोरों ने ४० हजार नकद व आभूषण साफ किए। लोगों ने घेरा। पुलिस ने दो बदमाशों को दबोचा। एडीजी ने पुलिस टीम को २५ हजार रुपए का इनाम दिया।

फिर भी हालात जस के तस

फिर भी हालात जस के तस। इतनी सख्ती के बाद भी कानून-व्यवस्था बार-बार पटरी से क्यों उतर रही है? अपराधियों में पुलिस का खौफ क्यों नहीं है? जिलाबदर व फरारी काट रहे बदमाश शहर में कैसे घूम रहे हैं? एक वारदात का खुलासा करने पर पुलिस को इनाम की घोषणा की जाती है तो थोकबंद वारदातों को खुलासा न करने वालों को दंडित क्यों नहीं किया जाता? एसपी के इतने सख्त तेवर के बाद भी पुलिस थानों में गंभीर मामलों को हल्की धाराओं में क्यों दर्ज किया जाता है? क्या ये संभव है कि जिलाबदर व निगरानीशुदा बदमाश शहर में घूमते रहें और पुलिस को इसकी भनक भी न लगे? अपराध समीक्षा बैठक में फाइलों में कैद वारदातों पर चर्चा क्यों नहीं होती? इन सवालों के जवाब पुलिस को आला अफसरों को तलाशने पड़ेंगे। कोर्ट परिसर में दो बदमाशों ने गवाह पर जानलेवा हमला किया, लेकिन माधवनगर पुलिस थाने में हल्की धाराओं में मामला दर्ज किया। क्यों? क्या यह अपराधियों के प्रति सहानुभूति नहीं है। इस प्रकार की शिकायतें लगभग सभी पुलिस थानों को लेकर सामने आ रही हैं। आला अफसरों को यह समझना पड़ेगा कि एक संगीन वारदात पुलिस के लिए भले ही सामान्य हो, लेकिन इसका जनमानस में गलत संदेश जाता है। चरक अस्पताल के सामने भीड़भाड़ वाले रोड पर बदमाश दिनदहाड़े महिला के कानों से झुमके लूट ले तो लोग स्वाभाविक रूप से खुद को असुरिक्षत महसूस करेंगे। यह भी देखना पड़ेगा कि लोगों का जितना भरोसा डायल१०० पर है, उतना थानों में तैनात पुलिस पर क्यों नहीं? डायल १०० इतनी सक्रिय क्यों है? क्योंकि इसकी निगरानी भोपाल से होती है और वह भी व्यवस्थित तरीके से। क्या कुछ ऐसी ही व्यवस्था थानों व चौकियों के लिए नहीं की जा सकती? क्योंकि किसी शायर ये पंक्तियां भी पढें..

" जुबां पे मोहर लगाना कोई बड़ी बात नहीं,
बदल सको तो बदल दो मेरे ख्यालों को।"

[email protected]

Show More
Lalit Saxena
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned