scriptNobel laureate Kailash Satyarthi's big research on children | नोबेल पुरस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी का बच्चों पर बड़ा रिसर्च | Patrika News

नोबेल पुरस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी का बच्चों पर बड़ा रिसर्च

पत्रिका साक्षात्कार...40 फीसदी बच्चे इंटरनेट, मोबाइल व स्मार्ट फोन से तलाशते रहे अपना भविष्य

उज्जैन

Updated: April 04, 2022 08:31:40 pm

उन्जैन. कोरोना महामारी केवल स्वाथ्य ही नहीं सभ्यता का संकट है। इस महामारी से कई घर बेरोजगार हुए तो आर्थिक संकट गहराया और इसी की वजह से बाल मजदूरी बढ़ती चली गई। यह बात पत्रिका से विशेष साक्षात्कार में शांति पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त, विश्वस्तरीय बाल अधिकारों पर काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी ने रखी। पत्रिका ने कोरोनाकाल और उसके बाद के हालात सहित बाल श्रम, बच्चों की बेहतर शिक्षा और वैश्विक स्तर पर बालक-बालिकों के लिए चलने वाले प्रोग्राम आदि पर चर्चा की। सत्यार्थी का मानना है कि जहां आर्थिक संकट छाया वहीं हमारे क्षेत्र में कई स्थानों पर बच्चों को मजदूरी करते देखा गया। सत्यार्थी ने कहा कि जब से कोरोना की शुरूआत हुई तब से वे लगातार यह बात कह रहे हैं कि कोरोना ना केवल स्वास्थ्य का संकट था और ना ही यह आर्थिक संकट..व्यापक अर्थों में देखा जाए तो यह सभ्यता का संकट है। प्रस्तुत है सत्यार्थी से पत्रिका टीम के विशेष साक्षात्कार का महत्वपूर्ण अंश...

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देश-दुनिया से लेकर शहर-गांव तक चर्चा में रहा शामिल
1. पत्रिका- कोविड-19 से शिक्षा पर क्या असर पड़ा?
सत्यार्थी- मैनें दुनिया के कई देशों को चि_ी लिखी कि पिछले डेढ़ साल में डेढ़ अरब से अधिक बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया। मैं पिछले 20-25 साल से 150 देशों में काम करता हूं और मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस महामारी से शिक्षा पर भी बुरा असर पड़ा है। विश्वभर में करीब 40 फीसदी बच्चे इंटरनेट, ऑनलाइन, कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन आदि से पढ़ाई कर अपना भविष्य सुरक्षित रखने का प्रयास करते रहे।

2. पत्रिका- इस महामारी के बाद बाल मजदूरी पर क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए?
सत्यार्थी- महामारी से छाए आर्थिक संकट से निपटने के लिए दुनिया के 1.6 अरब बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया, जिससे बाल मजदूरी बढ़ी। अब अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि तुरंत कार्रवाई नहीं हुई तो 4.5 करोड़ ब'चे और बाल मजदूरी में जुड़ जाएंगे। इससे इसे रोकने के लिए विश्वव्यापी तैयारी शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके परिणाम आने में अभी समय लगेगा।

3. पत्रिका-कोरोना और रूस-यूक्रेन युद्ध का बच्चों के भविष्य पर क्या असर रहा, किस प्रकार से देखते हैं?
सत्यार्थी- कोरोना शुरू होने से पहले विश्वभर में करीब 40 अरब डॉलर हर साल चाहिए होते थे, जिससे हर बच्चे को फाइल मिल सके। मतलब उसकी शिक्षा का पूर्ति हो सके। और यह 40 अरब डॉलर उस समय संसार का मिलिट्री के ढाई दिन का युद्ध का खर्चा रहा। मैं इसे डिफेंस की बजाय ऑफेंस मानता हूं, क्योंकि दुनियां में बच्चों के पास पया्रप्त किताबें नहीं, पर्याप्त स्कूल नहीं, पर्याप्त शिक्षण सामग्री नहीं लेकिन देश-दुनियां को इतनी भूख है कि हमारे पास अच्छे से अच्छे बम हैं कि नहीं, अच्छी मिसाइल हैं कि नहीं, अच्छी युद्ध मारक संसाधन हैं कि नहीं और ये जो कंपनियां है जो इस तरह के संसाधन बनाती हैं वे किसी भी बहाने दुनियां को अपने अस्त्र खरीदने के लिए तैयार कर लेते हैं।

4. पत्रिका- बाल मजदूरों की संख्या बढ़ रही है तो इसे कम करने या पुरानी स्थिति में ले जाने के लिए क्या करना चाहिए?
सत्यार्थी- हमने मुद्दा उठा रखा है कि बच्चों को सोशल प्रोटेक्शन प्रोग्राम है (सामाजिक सुरक्षा) जैसे मनरेगा या इस प्रकार के कार्यक्रम जहां-जहां ढंग से चले वहां लाभ होगा। भारत में तो मनरेगा से काफी लाभ हुआ है। कोरोना के समय राज्य हो या केंद्र सरकार दोनों ने अपने स्तर पर काम किया। हम अगर बहुत ही वंचित वर्ग है, सोशल वर्ग है उनके बच्चों को या परिवार को सामाजिक सुरक्षा का लाभ पहुंचाएं तो बाल मजदूरी पर रोक लग सकेगी और हम बेहतर स्थिति में होंगे।

5. पत्रिका- समाज में बाल श्रम के प्रति जागरुकता के परिणाम कैसे आ रहे हैं और सरकार या प्रशासन के प्रयास को आप किसी देखते हैं?
सत्यार्थी- मैनें पहले ही कहा है कि काफी अच्छा काम हुआ है, लेकिन मैं यह भी कहता हूं के एक भी बच्चा आर्थिक गुलामी में जकड़ा है या बालिका पर आर्थिक गुलामी के असर से उसका शोषण होता है तो यह भारत माता के माथे पर काला धब्बा है। हमारी संस्कृति और महान सभ्यता के हिसाब से हम संसार के महानतम राष्ट्र हैं तो हमारी नैतिक जिम्मेदारी और ज्यादा है। मैं इसलिए चाहता हूं कि और काम हो।

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