समाज में नकारात्मकता का सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है

समाज में नकारात्मकता का सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है
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Lalit Saxena | Updated: 05 May 2019, 07:45:00 AM (IST) Ujjain, Ujjain, Madhya Pradesh, India

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में शिविर का आयोजन

उज्जैन. मनुष्य के विचारों को प्रभावित करने वाला सबसे बडा कारक दिमाग है, जो सकारामक और नकारात्मक सूचनाओं के कारण हमारा अच्छा मित्र और सबसे बडा शत्रु दोनों ही है। इस मस्तिष्क से नकारात्मक सूचनाओं को डिलिट करने की कला सीख कर ही हम अपने जीवन को तनाव मुक्त बना सकते हैं। वर्तमान समय में समाज में नकारात्मकता का सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है।

कर लो दुनिया मुठ्ठी में

उक्त विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में कर लो दुनिया मुठ्ठी में विषय पर आयोजित पांच दिवसीय शिविर में डॉ दिलीप नालंगे मुम्बई ने व्यक्त किए। नालंगे ने कहा कि नकारात्मक सोच व्यक्ति को कायर,कमजोर, चिडचिडा,अकर्मण्य,आलसी और दुखी बनाती है। सकारात्मक सोच व्यक्ति को अनुकूल, प्रसन्नचित्त, स्वस्थ, सफल और तरोताजा बनाए रखती है। सबसे बडी धरोहर विचार की धरोहर है। इसी से मनुष्य में नकारात्मकता और सकारात्मकता आती है।

नियंत्रण में कैसे रखा जाए यह सबकी समस्या

मन चंचल होने के साथ ही वायु की तरह बडा बलवान है, जो अपने साथ बहा ले जाने की सामथ्र्य रखता है। इसे नियंत्रण में कैसे रखा जाए यह सबकी समस्या है। मन पर नियंत्रण अभ्यास और वैराग्य से पाया जा सकता है। अभ्यास अर्थात प्रैक्टिस से तो सभी परिचित हैं,लेकिन वैराग्य को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति है। लोग समझते हैं कि वैराग्य संसार से पलायन या सन्यास का पर्याय है,जबकि वास्तव में वैराग्य संसार से नहीं व्यक्ति,वस्तु, वैभव, पदार्थ, आदि से विरक्ति का नाम है। हम इनसे जितना दूर होते जाएंगे,उतने प्रभु के निकट होते जाएंगे। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है अपने आपको समझना या स्वयं को पहचानना।

आज चारों तरफ से नकारात्मक सूचनाएं

आज चारों तरफ से नकारात्मक सूचनाएं तेजी से आ रही है। इनकी बहुलता की वजह से ही हम नकारात्मक होते जा रहे हैं। नकारात्मकता के लिए कुछ करना नहीं पडता है,जबकि सकारात्मकता के लिए बहुत कुछ करना पडता है। यह जांचना जरूरी है कि बाहर से कैसी सूचनाएं हमारे भीतर जा रही है। आंख और कान के माध्यम से हमारे अन्दर पहुंचने वाली गैर जरूरी नकारात्मक सूचनाओं का जरिया बनता जा रहा है मीडिया और सोशल मीडिया। फेसबुक के कारण हमारा ध्यान दूसरों पर केन्द्रित हो गया है। हमने अपने भीतर झांकना ही बंद कर दिया है। हम दूसरों की गतिविधियों को फेसबुक पर देखकर ही अपने जीवन की दशा और दिशा तय करने लगे हैं। इससे विचलन और तनाव बढ रहा है।

युवाओं पर इसका बहुत प्रतिकूल असर

युवाओं पर इसका बहुत प्रतिकूल असर पड रहा है। आज इसका उपयोग सीमित करने की नितांत आवश्यकता है। मनुष्य के मन में आने वाले विचार ही हमें अच्छा या बुरा बनाते हैं। हम शुभ सोचेंगे तो शुभ ही होगा। हमारा ध्यान परिस्थिति पर नहीं स्वस्थिति पर केन्द्रित होना चाहिए। मन की स्वाभाविक स्थिति ज्ञान,पवित्रता, आनंद, शांति, खुशी, प्रसन्नता और सकारात्मकता है। यह हमारे नजरिए पर निर्भर करता है,कि हम चीजों को किस रूप में देखते हैं। गिलास को आधा खाली देखेंगे,तो खाली दिखेगा और आधा भरा देखेंगे आधा भरा दिखेगा। नालंगे ने स्वस्थ रहने और आंगिक संचालन के अनेक आसन और व्यायाम की जानकारी भी शिविर में दी।

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