चिलचिलाती धूप में नंगे पैर निकले भक्त, चांदी के रथ पर विराजे आदिनाथ

आदिनाथ भगवान जन्म जयंती पर दुर्लभमति माताजी के सान्निध्य और दिगंबर जैन समाज महासमिति के तत्वावधान में शुक्रवार को धार्मिक कार्यक्रम के साथ जुलूस निकाला गया।

By: Lalit Saxena

Updated: 29 Mar 2019, 08:53 PM IST

उज्जैन. आदिनाथ भगवान जन्म जयंती पर दुर्लभमति माताजी के सान्निध्य और दिगंबर जैन समाज महासमिति के तत्वावधान में शुक्रवार को धार्मिक कार्यक्रम के साथ जुलूस निकाला गया। चिलचिलाती धूप में भक्तजन नंगे पैर जुलूस में शामिल हुए। आदिनाथ भगवान 108 रजत ध्वजा के साथ चांदी के रथ पर विराजित होकर निकले। खास बात यह रही कि समाजजन ही नहीं, वरन बैंड पर प्रस्तुति देने वाले बच्चे तक नंगे पैर जुलूस में शामिल हुए।

 

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महिलाएं केसरिया वस्त्र पहने थीं
आदिनाथ भगवान के जुलूस में धर्म ध्वजा, बैंड बाजे, चांदी के रथ पर आदिनाथ भगवान,108 धर्म ध्वजा, महिलाएं केसरिया वस्त्र में सिर पर शास्त्र लेकर शामिल थे। पुरुष भगवान के चांदी के रथ को स्वयं खींच रहे थे। पाठशाला के छोटे-छोटे बच्चों का बैंड भी जुलूस में आकर्षण का केंद्र था।

 

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यहां से होकर गुजरा भगवान का रथ
जुलूस पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर फ्रीगंज से शहीद पार्क, कल्याण मल मंदिर, इंदिरा गांधी चौराहा टावर होता हुआ पुन: फ्रीगंज मंदिर पहुंचा। समाजजनों ने माताजी को श्रीफल समर्पित किए। आचार्य और भगवान के चित्र का अनावरण, दीप प्रज्वलन रमेश जैन, निर्मल सोनी, नितिन डोशी, नरेंद्र बडज़ात्या, पुष्पा बज, धर्मेंद्र सेठी ने किया। माताजी के सान्निध्य में आचार्य और आदिनाथ भगवान की पूजा पाठशाला के बच्चों द्वारा अध्र्य समर्पित कर की। भगवान के अभिषेक, शांति धारा का लाभ दिनेश जैन, महेश जैन, आशीष जैन, लविश जैन परिवार को प्राप्त हुआ। मंच संचालन धर्मेंद्र जैन ने किया। आभार कमल मोदी ने माना। कार्यक्रम में सकल दिगंबर जैन समाज, सामाजिक संसद उज्जैन, पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर पुरानी सब्जी मंडी, नारी चेतना मंडल एवं जैन मित्र मंडल का सहयोग रहा।

मनुष्य कर्म से महान
धर्मसभा में माताजी ने प्रवचन में कहा कि मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान होता है। जो अपनी आत्मा के अंदर यात्रा करते हैं वह एक दिन स्वयं भगवान बन जाते हैं। जैन धर्म बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है। भगवान महावीर के सिद्धांतों पर भारत की संस्कृति विद्यमान है अहिंसा परमो धर्म, जियो और जीने दो सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं। प्रथम तीर्थंकर ने हमें जीने की कला सिखाई। उत्तम कृषि मध्यम व्यापार की सीख प्रदान की। माताजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति अपने ही देश में निर्मित करने वाली वस्तुओं के आधार पर चलती है। विदेशी वस्तुओं की होली जलाना चाहिए। जैविक खेती, हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए।

Lalit Saxena
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