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सोशल प्राइड: ये हैं असल हीरो, जो बन गए हजारों लोगों की आंख

ए मिशन फॉर सोसायटी के सूत्रवाक्य के साथ पिछले सात साल से कर रहे निस्वार्थ और निशुल्क सेवा, दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए बनते हैं राइटर, स्कूल-कॉलेज के साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं में करते हैं मदद, देशभर में अब तक 600 से ज्यादा बार निशुल्क राइटर उपलब्ध करवाए, 168 प्रतिभागी अब विभिन्न शासकीय विभागों में दे रहे सेवा

उज्जैन

Published: November 19, 2021 11:47:09 pm

उज्जैन. आंखों के बगैर मनुष्य जीवन अधूरा है, अगर आंख ही ना हो तो जीवन अंधकारमय है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे लोगों के अंधरे जीवन में शिक्षा का उजियारा फैलाने का कार्य कर रहे हैं। शहर सहित प्रदेश में कई स्थानों पर दृष्टिबाधित प्रतिभागियों को परीक्षाओं में लेखन के लिए कुछ लोग मदद का हाथ बढ़ाते हैं। इनकी मदद से हर साल सैकड़ों दृष्टिबाधित की जिंदगी रोशन होती है। ये युवा सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर निशुल्क मदद करते हंै।
इस कार्य की शुरुआत सात साल पहले इंदौर शहर से करणसिंह कुशवाह ने निस्वार्थ सेवा, निशुल्क सेवा के माध्यम से की और आज उनके संगठन से हजारों युवा जुड़ चुके हैं, जो इंदौर, उज्जैन सहित देशभर के शहरों में दृष्टिबाधित विद्यार्थियों और प्रतिभागियों की मदद कर रहे हैं। उनका एक ही मकसद है कि दृष्टिबाधित लोगों की आंखें बनकर उनके जीवन में प्रकाश फैलाना।
पिता से मिली प्रेरणा
करणसिंह कुशवाह बताते हैं कि उनके पिता संतराम सिंह कुशवाह पुलिस विभाग में पदस्थ थे। उन्होंने आजीवन नैतिकता का पाठ पढ़ाया और शिक्षा की राह दिखाई। वे ऐसे समय हमें छोड़कर गए, जब एक विद्यार्थी के रूप में हमें उनकी बेहद आवश्यकता थी। उनके जाने के बाद से एक कुशल मार्गदर्शक की उपयोगिता समझ आई। इसी बीच दिसंबर 2014 में दृष्टिबाधित छात्र के लिए राइटर बनने का अवसर मिला। उसी समय लगा कि भले हमें मार्गदर्शन न मिल पा रहा हो लेकिन अब तक के संस्कारों से हम इन दिव्यांग बच्चों के जीवन को शिक्षा से मजबूत कर सकते हैं। तभी से इन बच्चों से जुड़ गया, उनकी परेशानी समझी, उनके कष्ट को महसूस किया। दृष्टिबाधित छात्रों का जीवन अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और उन बच्चों का तो और भी अधिक होता है जिन्हें परिवार ने भी छोड़ दिया, कोई बेहद गरीब परिवार से हैं, किसी छोटे से गांव से हैं। पढ़ाई पूरी बिना राइटर के नहीं हो सकती जो उन्हें पहले आसानी से नहीं मिल पाता था। कोई पैसे मांगता, तो कोई ऐन वक्त पर मना कर देता, कईयों ने पढऩा तक छोड़ दिया था। फिर हमने इस कार्य को सेवा के रूप में नि:शुल्क शुरू किया, जिसमें 289 बार मैंने परीक्षा लिखी है। पिछले 7 वर्षों से दृष्टिबाधित छात्र/छात्राओं को शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में जोडऩे के उद्देश्य से पिताजी की स्मृति में नि:स्वार्थ एवं नि:शुल्क सेवा निरंतर जारी है।
देशभर के छात्रों को करते हैं मदद
अ मिशन फॉर सोसायटी के सूत्रवाक्य के साथ संगठन ने मध्यप्रदेश के साथ आसपास के राज्यों में भी कुछ जिलों में सेवा प्रदान की। जैसे महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर। अब तक संगठन के माध्यम से लगभग 6000 बार राइटर्स उपलब्ध कराएं हैं।
लोगों को ऐसे जोड़ा
कुशवाह बताते हैं कि सर्वप्रथम मैंने और मित्र डॉ सपना चौहान ने परीक्षा दी थी। उसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ युवा साथियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, समूहों के माध्यम से लोगों को जोडऩा चालू किया। उन्हें इस समस्या के बारे में बताया, उनसे निवेदन किया, उन्हें इस जिम्मेदारी के बारे में समझाया। इस तरह धीरे-धीरे जनसमूह को जोड़कर एक डिजिटल संगठन तैयार किया, जो राइटर बन सके या किसी को राइटर के रूप में भेजकर सेवा दे सके। डिजिटल संगठन से तात्पर्य है सोशल मीडिया और फोन के माध्यम से जुड़े सेवाभावी राइटर्स।
नौकरी मिली तो सफल हुई सेवा
कुशवाह के अनुसार वे जिस पहले दृष्टिबाधित छात्र की बीए प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा देने गये थे, वो आज बीए, एमए करने के बाद एक ग्रामीण बैंक में प्रोविशनल ऑफिसर के पद पर नियुक्त हो चुका है। इसी तरह अब तक 168 दृष्टिबाधित छात्र हैं जिनके लिए हम राइटर बनकर गये थे वे आज बैंक, रेलवे, राज्य शिक्षा विभाग इत्यादि विभागों में चयनित हो चुके हैं। दृष्टिबाधित छात्रों की सफलता देखकर लगता है कि हमारी सेवा सफल हो गई है।
आइएएस अफसर ने किया सहयोग
इस सेवाकार्य में इंदौर के पूर्व कलेक्टर पी. नरहरी का मार्गदर्शन भी मिला। वे अपने फेसबुक पेज के माध्यम से राइटर की आवश्यकता का संदेश लोगों तक पहुंचाकर हमारे लिए सहयोगी साथी जोडऩे में अपना मार्गदर्शन देते हैं। युवा, छात्र/छात्राएं, प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स, इंजीनियर, शिक्षक, एक्सपट्र्स, गृहिणियां, पत्रकार इन सभी ने थोड़ा-थोड़ा सहयोग देकर इस सेवा कार्य को इंदौर ही नहीं बल्कि भारत के हर राज्य में नि:शुल्क सेवा करने वाला ग्रुप बनाया है।
सोशल प्राइड: ये हैं असल हीरो, जो बन गए हजारों लोगों की आंख
ओरिएंटल यूनिवर्सिटी में हुई बैंक की प्रतियोगी परीक्षा के दौरान दृष्टिबाधित प्रतिभागियों के साथ राइटर्स

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