scriptsurprised to know how insecticide is made from copper and buttermilk | तांबे और छाछ से कैसे बनता है कीटनाशक, जानकर हो जाएंगे हैरान | Patrika News

तांबे और छाछ से कैसे बनता है कीटनाशक, जानकर हो जाएंगे हैरान

खाचरौद के उन्नत किसान खेत पर ही आसान तरीके से बना रहे कीटनाशक दवा, पहली बार में ही अच्छे परिणाम आए, स्वाद भी बढ़ा

उज्जैन

Published: March 21, 2022 10:05:55 pm

उज्जैन.आसानी से उपलब्ध होने वाली छाछ, तांबा, लोहा व नीम के पत्ते जैसी सामग्री फसलों के लिए बेहतरीन कीटनाशक का काम कर सकती हैं। जिले के एक उन्नत किसान ने इसी नई पद्धति को अपनाते हुए अपनी फसलों को पेस्टीसाइट्स मुक्त बनाया है। इससे न सिर्फ वे रासायनिक दवा पर खर्च होने वाले हजारों रुपए की बचत कर रहे हैं बल्कि समाज को भी सुरक्षित व सेहतमंद उपज दे पा रहे हैं।

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खाचरौद के उन्नत किसान खेत पर ही आसान तरीके से बना रहे कीटनाशक दवा, पहली बार में ही अच्छे परिणाम आए, स्वाद भी बढ़ा

फसलों को कीटों से बचाने और पैदावार बढ़ाने के लिए खेतों में धड़ल्ले से रासायनिक दवाओं का उपयोग हो रहा है। इससे खेती का खर्च तो बढ़ता ही है, किसान और उपभोक्ता की सेहत के लिए खतरनाक है। जिले के कुछ उन्नत किसान वर्तमान और भविष्य के इस नुकसान को समझ जैवीक व सुरक्षित खेती को बढ़ावा देने में जुटे हैं। एेसे ही एक उन्नत किसान खाचरौद के कैलाश संगीतला हैं। उन्होंने अपने खेत में कीटनााशक रासायनिक दवाओं का उपयोग बंद कर प्राकृतिक विधि अपनाई है। वे खेत पर ही छाछ, नीम के पत्ते, तांबा और लोहे से कीटनाशक दवा बनाते हैं और सिर्फ इसी का छिड़काव करते हैं। कैलाश के अनुसार उनके द्वारा पहली बार इस पद्धति का उपयोग किया गया है जिसके अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।

एेसे बनती है कीटनाशक घरेलू दवा

इस घरेलू कीटनाशक दवा को बनाने का तरीका बेहद आसान है। कृषक कैलाश २०० लीटर के ड्रम जमीन में गड्ढा कर रख देते हैं। इसके बाद इसे पूरा छाछ से भर लिया जाता है। छाछ में तांबे और लोहे के टुकड़े डाले जाते हैं जो क्रिया करते हैं। इसके साथ ही नीम की पत्ती भी छाछ में मिलाई जाती है जो कीटनाशक क्षमता को और बढ़ा देती है। इस मिश्रण को कुछ दिन जमीन में गढ़े ड्रम में रखकर उपर से ढाक दिया जाता है। कुछ दिनों में दवा तैयार हो जाती है जिसे पानी के साथ मिलाकर खेतों में छिड़काव किया जा सकता है या ड्रीप के माध्यम से जड़ों में डाला जा सकता है।

कीड़े नहीं लगे, स्वाद भी बढ़ा

कृषक कैलाश ने बताया कि उन्होंने बड़े आकार के जामफल, एप्पल बेर, मटर, प्याज आदि की फसल की थी। उक्त फसल पर उन्होंने किसी रासायनिक कीटनाशक दवा का उपयोग न करते हुए घरेलू दवा ही डाली। इस घरेलू दवा के छिड़काव का मुख्य उद्देश्य फसलों का कीट से बचाना था। प्रयोग सफल रहा है और फसल में किसी प्रकार के कीट या अन्यय जीव-जंतु नहीं लगे। इसके साथ ही ही प्रोडक्शन की क्वालिटी भी तुलनात्मक और बेहतर देखने को मिली है वहीं फल-सब्जी का स्वाद भी बढ़ा है।

10 बीघा में दो बार हुआ छिड़काव, बड़ी बचत हुई

एक बार में करीब २०० लीटर दवा तैयार हुई। कैलाश बताते हैं, एक लीटर दवा को पांच लीटर पानी में मिलाया जाता है। इस तरह २०० लीटर दवा से करीब एक हजार लीटर मिश्रण तैयार हो जाता है। वे इसे फील्टर पंप के जरिए ड्रीप से जड़ों में भी डालते हैं व छिड़काव भी करते हैं। करीब १० बीघा के खेते में एक हजार लीटर के मिश्रण का दो बार उपयोग किया जा सका है जिससे फसल कीट मुक्त रही। ड्रम में दवा थोड़ी कम होने पर वे फिर उसमें छाछ और नीम के पत्ते डाल देते हैं जिससे उनके पास हमेशा दवा की उपलब्धता बनी रहती है। बीते वर्षों में इतनी खेती पर उन्हें कीटनाशक दवा के लिए औसत प्रतिवर्ष ६० हजार रुपए तक खर्च करना पड़ते थे जिसकी इस बार सीधे-सीधे बचत हुई है। घर पर ही छाछ, धातु आदि उपलब्ध होने से उन्हें इस दवा को बनाने में कोई उल्लेखनीय खर्च नहीं आया। यदि उक्त सामग्री वे बाजार से भी खरीदते तो करीब तीन हजार रुपए में २०० लीटर दवा तैया हो सकती थी। कैलाश के अनुसार, उन्होंने घिनौदा स्थित माधवसेवा कृषि केंद्र और नर्सरी संचालक उनके भांजे से इस पद्धति के बारे में उन्हें जानकारी मिली थी। रासायनीक दवाओं की तरह इस घरेलू दवा का उपभोक्ताओं की सेहत पर खराब असर नहीं होने की विशेषता ने उन्हें इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

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