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सहकारिता की धार कुंद....24 निरिक्षकों के भरोसे 172 सहकारी संस्थाओं का कामकाज

संचालक मंडल नहीं होने से किसानों की समस्या पर भी नहीं हो रही बात, समर्थन मूल्य पर गेहंू खरीदी के दौरान भी किसानों की बात सुनने वाले कोई नहीं

उज्जैन

Updated: April 01, 2022 08:02:47 pm

जितेंद्रसिंह चौहान. उज्जैन।
बिना सहकार नहीं उद्धार के नारे के साथ जिले में संचालित सहकारिता की धारा अब कुंद होने लगी हैं। किसानों की सुनने वाला कोई नहीं है तो जमीनी स्तर पर किसानों के मुद्दे नहीं उठ पा रहे हैं। यह स्थिति जिले में १७२ सहकारी संस्थाओं के पिछले चार साल से चुनाव नहीं होने से बनी हुई है। इन संस्थाओं से जिले के करीब २ लाख किसान जुड़े हुए हैं। संस्थाएं प्रशासकों के भरोसे चल रही है तो १०-१२ संस्थाओं पर एक प्रशासक नियुक्त है। लिहाजा संस्थाओं से जुड़ा किसान अफसरों के आगे चक्कर लगाने को मजबूर है।
जिले में किसानों के कृषि कार्य में आर्थिक मदद के लिए सहकारिता संस्थाएं एक बड़ा माध्यम है। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों के खाद, बीज, कृषि लोन, केसीसी सहित अन्य सुविधाएं मिलती है। इसमें सरकार द्वारा शुन्य प्रतिशत पर लोन भी शामिल है। यह संस्थाएं हर गांव से जुड़ी है और हर किसान इन संस्थाओं का सदस्य है। सहकारिता के माध्यम से संचालित इन संस्थाओं में बीते सालों में लोकतंत्र का आधार ही खत्म हो गया है। संस्थाओं में चुनाव नहीं होने ओर संचालक मंडल के गठन नहीं होने के कारण किसानों की नुमाइंदी एक तरह से खत्म हो गई। किसानों से जुड़े हर कार्य अब सीधे अफसरों के हाथ में आ गए हैं। ऐसे में किसानों को लोन लेना हो या खाद-बीज के लिए आवेदन स्वीकृत कराना है तो अफसरों के आगे-पीछे दौडऩा होता है। इसके पीछे वजह है कि अब संस्थाओं की जिम्मेदारी सहाकारिता निरिक्षकों के पास है। जिले में १७२ संस्थाओं का कामकाज २४ निरीक्षक संभाले हुए हैं। इनमें एक-एक निरीक्षक के पास १५ से १८ संस्थाएं हैं। लिहाजा संस्थाओं में प्रबंधकों ही अपने स्तर पर कामकाज देख रहे हैं। ऐसे में किसानों को सुविधाओं के लिए इनके आसरे रहने को विवश होना पड़ रहा है।
संस्थाओं की आर्थिक स्थिति खराब...घोटालेे पर जांच अधूरी
जिले में सहाकारी संस्थाओं की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं हुई है। कई संस्थाओं में करोड़ों रुपए के घोटाले सामने आ चुके हैं ।इन पर जांच भी बैठी है लेकिन कुछ मामलों में जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। जिले में करीब एक दर्जन से ज्यादा संस्थाओं में आर्थिक अनियमितता के मामले सामने आ चुके हैं। वहीं अधिकांश संस्थाओं की आर्थिक हालत भी ठीक नहीं है। इनके विकास और नए प्रोजेक्ट को लेकर कार्रवाई में तेजी नहीं आ रही है। दरअसल संचालक मंडल नहीं होने संस्थाओं के विकास को लेकर विशेष प्रयत्न नहीं हो पा रहे।
२०१८ से चुनाव नहीं, नहीं ले सकते नीतिगत निर्णय
जिले में १७२ सहकारी संस्थाओं में वर्ष २०१८ के बाद से चुनाव नहीं हुए है । सहाकारिता विभाग ने संस्थाओं में सहकारिता निरीक्षकों को बतौर प्रशासक नियुक्त किया है। निरीक्षक बता रहे हैं कि उनके जिम्मे १५ से १८ संस्थाएं हैं, इसके अलावा विभागीय काम भी है। ऐसे में हर संस्था का ध्यान रख पाना संभव नहीं है। संस्था प्रबंधक ही सारा काम देख रहे हैं। वहीं निरिक्षकों के पास संस्था में नई नियुक्ति, किसी को हटाने या नीति गत निर्णय लेने के अधिकार भी नहीं है। ऐसे में समय-समय पर संस्थाओं में बदलाव भी नहीं हो पा रहे हैं।

संस्थाएं...ग्रामीण राजनीति का आधार
जिले की राजनीति का दारोमदार इन सहाकारी संस्थाओं के पास है। राजनीतिक दल इन संस्थाओं पर अपनी पकड़ को बड़ी जीत मानती है। संस्थाओं में चुने गए सदस्यों की गांवों में सीधी पहुंच होती है। यहां चुने गए सदस्य ही जिला सहकारी बैंक, अपेक्स बैंक तक में नियुक्त होते हैं। बीते सालों में चुनाव नहीं होने से किसान की ओर से राजनीतिक नेतृत्व भी सामने नहीं आ पा रहा है। हालांकि प्रदेश में नगरीय निकायों से पहले संस्थाओं के चुनाव की बात सामने आई लेकिन इस दिशा में कोई प्रगृति नहीं हुई। चुनाव कब होंगे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
संस्थाओं की यह है जिम्मेदारी
- गांवों में नए किसानों को सदस्यता देना।
- संस्था के माध्यम से खाद, बीज व कृषि के लिए ऋण उपलब्ध कराना।
- केसीसी सहित अन्य सरकारी योजना का फायदा दिलाना।
- शासन की विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन कर किसानों को लाभ पहुंचाना।
- सहकारिता के माध्यम से किसानों की खेती को बढ़ावा के साथ उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना।

The edge of co-operatives is blunt.
संचालक मंडल नहीं होने से किसानों की समस्या पर भी नहीं हो रही बात, समर्थन मूल्य पर गेहंू खरीदी के दौरान भी किसानों की बात सुनने वाले कोई नहीं

ऐसी समस्या आ रही किसानों के सामने
- किसानों को फसल बीमा की राशि नहीं मिल रही। बीमा की राशि मिली तो पूरी नहीं मिली।
- किसानों के फसल नुकसान की तुलना में नाममात्र बीमा मिला। किसानों को ५०० से १००० रुपए तक की राशि मिली।
- कांग्रेस सरकार की ऋण माफी योजना में कई किसानों संस्थाओं द्वारा योजना अवधि से बाहर कर दिया।
इनका कहना
किसानों को अनेक समस्याएं आ रही है। इससे समझिए कि गेहूं की खरीदी २८ मार्च से शुरू हुई और बैंक में लोन जमा करने की अंतिम तारिख भी मार्च थी। बगैर गेहूं बेचे किसान कैसे लोन जमा कर सकता। हमने अधिकारियों से कहा तो यह तारीख बढ़ाकर १५ अप्रैल कर दी। सहकारी संस्थाओं के चुनाव होने चाहिए। इससे किसान अपनी बात कह सकते हैं।
- दशरथ पंडया, जिलाध्यक्ष, भारतीय किसान संघ
जिले की १७२ सहकारी संस्थाओं में वर्ष २०१८ से चुनाव नहीं हुए है। संस्थाओं में २४ सहाकारी निरीक्षकों को प्रशासक बनाया गया है। शासन के नियमों के मुताबिक यह कार्य कर रहे हैं। अगर कहीं
किसानों से जुड़ी कोई समस्या है तो अवगत करा सकते हैं।
- ओपी गुप्ता, उपायुक्त, सहकारिता विभाग

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