scriptUjjain is not a green city and not avair politician and administration | छ साल में 3.83 लाख पौधे रोपे लेकिन पोस्टर से निकलकर जमीन पर नहीं आ सकी ग्रीन सिटी उज्जैन | Patrika News

छ साल में 3.83 लाख पौधे रोपे लेकिन पोस्टर से निकलकर जमीन पर नहीं आ सकी ग्रीन सिटी उज्जैन

- पेड़ों , हरियाली और पर्यावरण प्रदूषण पर किसी का ध्यान नहीं
- बड़ा मुद्दा: प्रदूषण के आंकड़े चिंता में डाल रहे, लेकिन किसी भी पाटर्री के संकल्प में नहीं मिली जगह
- बड़ा सवाल: बिना हरियाली कैसे सुधरेगी आबोहवा, सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर करना होगा काम

उज्जैन

Updated: July 05, 2022 01:15:26 pm


पत्रिका स्पॉटलाइट

अतुल पोरवाल

उज्जैन.
किसी भी शहर की सेहत का अंदाजा वहां की हरियाली और ध्सवच्छ पर्यावरण से होता है। नगर निगम का पिछला चुनाव 2015 में हुआ था। अब सात साल फिर लोकतंत्र का पर्व चल रहा है, जिसमें शहर को तकनिकी संपन्न, कांक्रीट का जंगल, सिंहस्थ, क्षिप्रा और युवाओं पर जरूर दर्शाया गया है। लेकिन शहरी पर्यावरण के फेफड़े कहे जाने वाले पेड़ों, हरियाली और पर्यावरण प्रदूषण पर किसी का ध्यान नहीं है। यही कारण रहा कि ७ वर्षों के दौरान 3.83 लाख रोपने के बावजूद ग्रीन सिटी पोस्टर से बाहर निकल कर जमीन पर नहीं आ सकी।शहर में सिटी फारेस्ट का कॉन्सेप्ट आज तक कॉन्सेप्ट भर ही है। राजनेता मानते हैं, यह प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए, लेकिन इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।चुनाव के मौके पर आखिर हरियाली की बात क्यों, बात इसलिए कि वन मंत्री ने 2021 में घोषित वन निती में हमारा उज्जैन जिला महज 0.5 फीसदी हरियाली के साथ फिसड्डी रहा। शहर की स्थिति करीब 10 से 12 प्रतिशत के साथ थोड़ी ठीक है। जबकि मानक दृष्टि से देखें तो 33.3 प्रतिशत भू-भाग पर हरियाली होना चाहिए। कम से कम 20 प्रतिशत हरियाली होने पर हम आसानी से श्वास ले पाएंगे। इधर हरियाली कम है, उधर वाहन तेज गति से बढ़ रहे हैं। प्रदूषण का मानक पीएम(पर्टिकुलेट मैटर)2.5 में भी लगातार इजाफा हो रहा है। इतना ही नहीं भू-जल स्तर भी रसातल की ओर बढ़ता जा रहा है। इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है। नहीं तो पानी की तरह हमारे दरख्त भी सिर्फ कागजी योजनाओं में ही हरियाली फैलाएंगे।
Ujjain is not a green city and not avair politician and administration
Ujjain is not a green city and not avair politician and administration
चिंता अब जरूरी क्योंकि प्रदूषक बढ़ रहे हैं
पिछले चुनाव के बाद से देखें तो हर साल दो पहिया, चार पहिया वाहन लगातार बढ़ रहे हैं। इनसे निकलने वाला जहरीला धुंआ शहर की आबोहवा को नुकसान पहुंचा रहा है। वाहनों से निकलने वाले धुंए और निर्माण कार्यों से धूल-धुएं की मात्रा बढ़ती जा रहा है।
ऐसे समझें पर्यावरण प्रदूषण की स्थिति
वर्ष रजि. वाहनों की संख्या पीएम-2.5 रोपे गए पौधों की संख्या भूजल स्तर
2016 4353 उपलब्ध नहीं 71800 उपलब्ध नहीं
2017 3817 28.7 मा. 36956 उपलब्ध नहीं
2018 4865 31.5 मा. 25500 14.39 मी.
2019 6155 33.5 मा. 139200 13.95 मी.
2020 4964 32.5 मा. 50230 11.47 मी.
2021 6921 40.56 मा. 60000 10.37 मी.
(सभी आंकड़े विभागीय जानकारी के मुताबिक। परिवहन विभाग से प्रति वर्ष मार्च माह में पंजीकृत वाहनों की संख्या, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पीएम २.५ की जानकारी माइक्रोन में है। इसके साथ ही भूजल स्तर मीटर में है।)
एक्सपर्ट व्यू
जिले की हरियाली की बात करें तो 0.5 प्रतिशत के साथ स्थिति शर्मनाक है। शहरी मुख्यालय पर जरूर 10 से 15 प्रतिशत ग्रीनरी से स्थिति संभली हुई है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में हरियाली बढ़ाने के लिए लगातार जागरूतका कार्यक्रम चलाना होंगे। लोगों को समझना होगा कि बगैर हरियाली जीवन व्यर्थ है। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के 33.3 प्रतिशत भू-भाग पर वन होना चाहिए। लेकिन चिंता की बात है कि देश के केवल 19.5 प्रतिशत भग पर वन है। नए युग के अधुनिकीकरण के लालच ने सबकुछ उलट दिया है।
-राजीव पाहवा, पर्यावरणविद
करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए
पर्यावरण संरक्षण को लेकर हमने भी काम किया, लेकिन पर्याप्त नहीं है। वर्तमान सरकार ने वृक्षों के नाम पर करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए, लेकिन नतीजा जनता के सामने है। सरकार से कोई उम्मीद नहीं, लेकिन लोगों को जागरूक होना चाहिए। जनता की भगीदारी से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही स्थिति सुधरेगी। इस तरह का अभियान भी चलना चाहिए कि जिस घर में बेटी, उस घर में एक पौधा जरूरी। इससे बेटी के ब्याह के बाद भी घर में पेड़ के रूप में उसका अहसास बना रहेगा।
-नूरी खान, प्रदेश उपाध्यक्ष, महिला कांग्रेस
वोट का आधार हो हरियाली
ग्रीन सिटी का कॉन्सेप्ट विज्ञापन से उतार कर जमीन पर लाने की जरूरत है। सिटी फारेस्ट की जो कल्पना आई है, उसमें हमे खाली जगह को सघन वन के रूप में तब्दील करना चाहिए। इसके अलावा उज्जैन को डस्ट फ्री सिटी बनाने की आवश्यकता है। कच्चे स्थान को पक् का किया जाए या ग्रीनरी हो। हमारी जो जलसंरचना है,उसे भी सहेजने की जरूरत है। पर्यावरण का मुद्दा राजनीतिक दलों के एजेंडे में होना चाहिए था। जनता को भी इसी आधार पर वोट देना चाहिए।
- सोनू गेहलोत, पूर्व निगम सभापति

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