भाजपा का मैनेजमेंट रहेगा कांग्रेस के लिए चुनौती

भाजपा का मैनेजमेंट रहेगा कांग्रेस के लिए चुनौती

Shiv Mangal Singh | Publish: Sep, 06 2018 05:07:45 PM (IST) Umaria, Madhya Pradesh, India

कांग्रेस प्रत्याशियों ने ठोका दम : भाजपा में अभी भी अंदरखाने बिछ रही बिसात

उमरिया. विधानसभा चुनाव को लेकर आदिवासी बाहुल्य उमरिया में राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। हर बार की भांति इस बार भी दोनों ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में प्रतिद्वंदिता रहेगी। सत्ताधारी पार्टी के लिए जहां वर्तमान प्रत्याशियों को लेकर रिपीट न करने का दबाव बन रहा है। वहीं कांग्रेस के दिग्गज एक साथ सामने आकर इस बार भूल न करने की तस्वीर दिखा रहे हैं। तीसरी पार्टी के रूप में पाली से लगे गोंड बाहुल्य क्षेत्र में गोंगपा अपनी मजबूती में जुटी है। प्राथमिक चरण की रायशुमारी के बाद पार्टियां अपने पत्ते खोलने में जल्दबाजी नहीं दिखा रहीं।
चरम पर राजनीति
जिले की सर्वाधिक वोटरों वाली मानपुर विधानसभा सीट पर प्रत्याशी चाहे जो हो यहां का चुनाव कांटे का टक्कर वाला होगा। पार्टी सूत्रों की मानें तो वर्तमान विधायक का पाली क्षेत्र में मुखर होता विरोध उनके लिए सिरदर्द बना हुआ है। दूसरी ओर कांग्रेस में बागी रहे एक दमदार प्रत्याशी के रूप पुराना चेहरा ताल ठोंक रहा है। चुनावी आंकड़ों की मानें तो बागी पर ही कांग्रेस दांव लगा सकती है। इसका कारण उसकी दमदारी और जबदस्त आदिवासी क्षेत्रों में पकड़ है।
क्या है जनता का मूड
बांधवगढ़ विधानसभा में ज्यादातर शहरी क्षेत्र आता है। उमरिया समेत चंदिया, नौरोजाबाद में पढ़ी लिखी आबादी है। ग्रामीण क्षेत्रों में दाऊ का चमत्कार पहले चुनाव जिताता रहा है। इस बार आरक्षण व स्थानीय क्षेत्र में रोजगार के मुद्दे पर लोग पुराने चेहरे बिल्कुल पसंद नहीं कर रहे हैं। मतदाताओं का मानना है नए व योग्य चेहरा हो जो भोपाल से दिल्ली तक उनकी बात पहुंचाए। कांग्रेस के लिए बांधवगढ़ साफ सुथरा प्रत्याशी देना पहली प्राथमिकता रहेगा। अंदरूनी तौर पर चल रहे सर्वे के बाद ही प्रत्याशियों की सीट कन्फर्म हो पाएगी।
बांधवगढ़ में नया चेहरा संभावित
शहडोल सांसद ज्ञान सिंह के संसदीय चुनाव के बाद रिक्त सीट से उनके पुत्र शिवनारायण लल्लू वर्तमान में विधायक हैं। राजनीतिक सरगर्मी पर गौर करें तो भाजपा यहां से प्रत्याशी का चेहरा बदलने के मूड में है। हालांकि दाऊ का पुत्र प्रेम उपचुनाव के दौरान ही पार्टी के गले की फांस बन चुका है। इस बार भी अन्य दावेदारों के लिए यही बड़ा सिरदर्द रहने वाला है। दूसरी ओर 15 साल सत्ता से दूर कांग्रेस जिताऊ व योग्य चेहरे की तलाश में हैं। दिग्विजय सिंह व सिंधिया के दौरे में एक दर्जन नए चेहरों ने अपनी दावेदारी दी लेकिन पार्टी जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रही।
दोनों पार्टियों में गुटबाजी
अभी तक के चुनाव में गुटबाजी के आरोप कांग्रेस पर ही लग रहे हैं लेकिन इस बार के चुनाव में भाजपा भी इस दाग से अछूती नहीं है। खासकर बार-बार वही चेहरे रिपीट होने से अन्य लोगों में खीझ दिख रही है। अभी हाल ही में नपा के एक कार्यक्रम में बड़े पदाधिकारी ने विधायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसके अलावा नौरोजाबाद के पूर्व अध्यक्ष भी अपना जनसमर्थन देकर दावेदारी ठोक रहे हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक पण्डित बताते हैं जो पार्टी गुटबाजी पर लगाम कसने में सफल रहेगी, आधा चुनाव तो वह खुद ही जीत जाएगी।

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