मांद में मिल रही चुनौती से बेचैन बाहुबली मुख्तार अंसारी

मांद में मिल रही चुनौती से बेचैन बाहुबली मुख्तार अंसारी
mokhtar ansari and anand rai

अंसारी बंधुओं की सपा में विलय की छटपटाहट के पीछे यह है कहानी

वाराणसी. सफेदपोश का चोला पहने माफिया मुख्तार अंसारी को डर है कि अगला विधानसभा चुनाव कहीं उसके कुनबे के राजनीतिक करियर की आखिरी कील न ठोंक दे। हालात बदल गए हैं और बदली फिजां में घर में घुसे शेर खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। चाचा की हत्या का बदला बुलेट के बजाय बैलेट से लेने के लिए चुनाव संग्राम में कूदे  इस शख्स की चुनौती से अंसारी बंधु व उनके समर्थकों में खासी बेचैनी है। उधर अंसारी बंधुओं की सारी कोशिशें बेकार साबित हो चुकी है, चाचा-भतीजा फिर गले मिल गए और अंसारी बंधुओं को अंगूठा थमा दिया है। 

दरअसल, सपा से कहीं अधिक छटपटाहट अंसारी बंधुओं की राजनीतिक पार्टी कौमी एकता दल को थी। वजह इस बार चुनावी जंग में हार का भय सता रहा है क्योंकि भाजपा के संभावित उम्मीदवार आनंद राय को लगातार मिल रहे समर्थन ने अंसारी बंधुओं की बेचैनी और बढ़ा दी है। 

गाजीपुर के विधायक रहे जिस कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप में बाहुबली मुख्तार अंसारी फिलवक्त जेल की सलाखों के पीछे है, उसी दिवंगत विधायक के भतीजे आनंद राय मोहम्मदाबाद से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। परिवार के राजनीतिक मुखिया और दिवंगत विधायक कृष्णानंद राय के अभिन्न मित्र रहे रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद आनंद राय पूरे बाहुबल के साथ गाजीपुर में चुनावी कदमताल कर रहे हैं। आनंद की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता ने ही अंसारी बंधुओं को सपा की शरण में जाने को इस कदर मजबूर कर दिया कि वे अपनी पार्टी कौएद का अस्तित्व तक मिटाने को तैयार हो गए। 

सूबे के हैवीवेट मिनिस्टर शिवपाल यादव के जरिए सपा में एंट्री की कोशिश हुई लेकिन   अपनी स्वच्छ छवि को बचाने के लिए अखिलेश ने ऐसी टांग अड़ाई की अंसारी बंधुओं का सपना टूट गया। आवेश में आकर मुलायम परिवार पर गुस्सा फूट पड़ा अंसारी बंधुओं का जो उनके लिए और घातक सिद्ध हुआ। 

दरअसल अंसारी बंधु अब तक मऊ और गाजीपुर में मुस्लिम और यादव के साथ ही वोट बैंक के सहारे अपनी जीत दर्ज कराते आए हैं। कृष्णानंद राय की हत्या के बाद कुछ हद तक भूमिहार वोट कटे लेकिन अंसारी बंधु किसी तरह अपनी जीत सुनिश्चित कराते आए। इस बार हालात बदल गए हैं। कृष्णानंद राय के भतीजे आनंद राय के लिए गाजीपुर, मऊ से लेकर बनारस की धरती पर रहने वाले भूमिहार समाज के दिग्गज एक हो गए हैं। उधर अखिलेश और मुलायम पर टिप्पणी करने व सपा में एंट्री न मिलने के बाद यादव समाज भी अंसारी बंधुओं से दूर हो गया है। 

अंसारी बंधुओं को फिलहाल मुस्लिम वोटबैंक का ही सहारा है लेकिन इस बार मुस्लिम वोट बैंक भी खिसकने का भय सता रहा है। मुस्लिम समाज फिलहाल कांग्रेस और बसपा की ओर अभी देख रहा है। यदि चुनाव आते-आते मायावती का हाथी चल पड़ा तो मुस्लिम बंधु बसपा को वोट देंगे। विकल्प के तौर पर कांग्रेस और सपा भी है।

कौएद का सपा में विलय न होने से सबसे अधिक नुकसान माफिया मुख्तार अंसारी को ही है। सपा में एंट्री न मिलने से भाजपा के संभावित उम्मीदवार आनंद राय का कद तेजी से बढ़ा है। रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने रेल के जरिए गाजीपुर में विकास के दरवाजे खोल रखे हैं जिसका सीधा लाभ आनंद राय को ही मिलना है। आंनद राय ने भी अपने विस क्षेत्र के साथ ही मऊ, बलिया और गाजीपुर के उन सभी क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान छेड़ रखा है जहां पर अंसारी बंधुओं का प्रभाव है। 

उधर माफिया से माननीय बने एमएलसी बृजेश सिंह और उनकेे समर्थक भी आनंद राय के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दिए हैं। दरअसल बृजेश सिंह भी कृष्णानंद राय को बड़ा भाई मानते थे, कृष्णानंद राय से ताकत मिलने के बाद ही बृजेश सिंह ने अपने बाहुबल में इजाफा किया था। लंबे समय से जेल में रहने के कारण मुख्तार अंसारी का आर्थिक साम्राज्य कमजोर हुआ है जबकि विरोधी बृजेश की ताकत लगातार बढ़ रही है।  

विरोधियों की तरफ से हो रहे चौतरफे हमले से बचने के लिए ही अंसारी बंधु सपा की शरण में जाना चाहते थे लेकिन माफिया का धब्बा लगा होने व सपा में नई सोच के आगे आने से मुख्तार का ख्वाब तो टूटा ही अब डर है कि कहीं चुनाव में सफलता नहीं मिली तो पूर्वांचल के सबसे दबंग माफिया का किला ढहने में देर नहीं लगेगी। 
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