घर में रहने वाली महिलाओं पर भी वायु प्रदूषण का कहर, नई रिपोर्ट में हुआ खुलासा, घातक बीमारियां बना रहीं शिकार

जानकारों की सलाह
-शहरों में हरित क्रांति की जरूरत
-सड़कों के किनारे मकान बनाने से बचें
-अस्पतालों और स्कूलों को घनी बस्तियों से दूर किया जाए
-ट्रैफिक सिस्टम हो दुरुस्ता

By: Ajay Chaturvedi

Published: 01 Jul 2019, 01:13 PM IST

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. वायु प्रदूषण को लेकर हालिया सर्वे रिपोर्ट काफी गंभीर है। वातावरण में घुलता जहर अब ज्यादा घातक होता जा रहा है। न केवल सड़कों पर चलने वाले ही इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं बल्कि घरों में रहने वाली महिलाएं, बच्चियां, छोटे बच्चे, वृद्धजन भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। वायु प्रदूषण की जद में ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी आने लगे हैं। इससे कई तरह की घातक बीमारियां हो रही हैं। खास तौर पर महिलाओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उनके लिए सांस लेना भी दूभर हो रहा है।

हालिया रिपोर्ट बताती है कि घर के अंदर प्रदूषकों की ज्यादा मात्रा के कारण भारत में महिलाओं में उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) का खतरा बढ़ रहा है। स्पेन के बार्सिलोना इंस्टीट्यट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के शोधकर्ताओं ने भारत के परिपेक्ष्य में इसका अध्ययन किया है जहां प्रदूषण और उच्च रक्तचाप दोनों में ही बढ़ोतरी हो रही है। शोध के परिणामों के अनुसार घर के अंदर वायु प्रदूषण का शिकार होने वाली महिलाओं में उच्च रक्तचाप होने की संभावना अधिक रहती है। .

पत्रिका इपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि 5,531 वयस्कों पर एक शोध किया गया। यह सभी लोग हैदराबाद शहर के पास बसे 28 गांवों के थे। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप की जांच की और साथ ही सालाना उनके द्वारा सांस के जरिए खींचे जा रहे पार्टिकुलेट मैटर (पीएम2.5) और कॉर्बन के स्तर के बारे में भी जानकारी ली। प्रतिभागियों से उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जीवनशैली और घर के स्तर के बारे में जानकारी हासिल की गई। यहां तक कि घर में खाना बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले ईंधन के बारे में भी पूछा गया।

इन स सभी जानकारियों की समीक्षा के बाद पता चला कि प्रतिभागी 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा पीएम मैटर वाले वातावरण में रह रहे थे। बता दें कि 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानक स्तर है। शोध में पाया गया कि महिलाएं औसतन 33 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर वाले वातावरण में रह रहीं थीं। रक्तचाप के डाटा के अनुसार लगभग आधे प्रतिभागी (46 फीसदी) उच्च रक्तचाप से जूझ रहे थे। शोध में पाया गया कि पीएम स्तर में 1 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की बढ़ोतरी के कारण महिलाओं के उच्च रक्तचाप में चार फीसदी तक वृद्धि हुई। शोधकर्ताओं के अनुसार पुरुषों में दोनों के बीच का संबंध कमजोर पाया गया।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के कार्डियोलॉजिस्ट प्रो ओमशंकर ने पत्रिका से खास बातचीत में बताया कि वायु प्रदूषण इंसान को बुरी तरह से प्रभावित करने लगा है। इस शोध में बताया गया है कि वायु प्रदूषण के बढते प्रभाव के कारण न केवल लोग उच्च रक्तचाप से पीड़ित हो रहे हैं बल्कि उनमें सांस फूलने की बीमारी के साथ-साथ मेटाबॉलिक सिंड्रोम के प्रभावित होने से तमाम ऐसी घातक बीमारियां हो रही हैं जिनका इलाज भी आसान नहीं। लोग हाइपरटेंशन की गिरफ्त में आ रहे हैं। डायबिटीज, स्ट्रोक के भी शिकार होने का खतरा पैदा हो रहा है। कहा कि जहां तक बनारस की बात है तो यह तो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की टॉप लिस्ट में शामिल है। ऐसे में यहां तो वायु प्रदूषण से होने वाली खतरनाक बीमारियों का कहीं ज्यादा ही खतरा है।

प्रो शंकर ने कहा कि अंधाधुंध पेड़ों की कटाई, शहरों का अनियोजित विकास, घनी आबादी, ध्वस्त ट्रैफिक सिस्टम, पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स का बेइंतिहां इस्तेमाल, आज भी लकड़ी और कोयला से खाना बनाना, आतिशबाजी, कूड़े के ढेर में आग लगाना जैसे कई कारक हैं जो वातावरण को दूषित कर रहे हैं। बताया कि ताजा शोध में भी दो क्षेत्रों को चुना गया है, एक सड़कों से दूर बसी बस्तियां और दूसरी सड़क किनारे बसी बस्तियां। रिपोर्ट बताती है कि मुख्य मार्गों से दूर बसी बस्तियों में रहने वालों पर वायु प्रदूषण का उतना असर नहीं है जितना सड़क किनारे रहने वालों पर।

उन्होंने बताया कि शोध में हाल के दिनों में तेजी से विकसित हो रहे एपार्टमेंट्स में रहने वालों को भी शामिल किया गया है। यह पाय गया है कि एपार्टमेंट्स में रहने वाले भी वायु प्रदूषण से कहीं ज्यादा ही प्रभावित हो रहे हैं। कुल मिला कर यह रिपोर्ट बताती है कि घनी आबादी चाहे वह मोहल्ले के रूप में हो या छोटे फ्लैट व एक कमरे में ही ज्यादा लोगों के रहने वाले हों वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर ऐसे लोगों पर पड़ रहा है।

 air quality index

उन्होंने कहा कि मौजूदा हाल में निम्नलिखित कारकों पर खास ध्यान देना होगा..

- बेहतर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट
-कूड़ों को न जलाने पर हो सख्ती
-पेड़ों की कटाई पर लगे रोग
-ज्यादा से ज्यादा हरित क्षेत्र हों विकसित
-सड़कों के किनारे आवासीय कॉलोनियों का विकास प्रतिबंधित हो
-स्कूल और अस्पताल मुख्य मार्गों से हट कर हों
-ट्रैफिक सिस्टम दुरुस्त हो
-अस्पताल परिसर में ज्यादा से ज्यादा हरितिमा हो
-आतिशबाजी पर रोक लगे

कोट
आमजन की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए वातावर को स्वस्थ रखना ही होगा। खास तौर पर बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों की सेहत को लेकर सरकार से लेकर व्यक्तिगत और सांगठनिक स्तर तक संवेदनशीलता बढानी होगी। इन्हीं सब कारणों से बनारस में पृथक एम्स की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है क्योंकि वर्तमाम में जो अस्पताल हैं वो ओवर क्राउडेड हैं और ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि ओवर क्राउड भी वायु प्रदूषण का अच्छा संवाहक है इससे वायु में घुल ज्वलनशील तत्व आसानी से लोगों के शरीर के अंदर पहुंचते हैं। ऐसे में जब अस्पताल में ओवर क्राउड होगा तो मरीज जो पहले से ही किसी न किसी रूप में संक्रमित है उस पर इस विषाक्त वातावरण का और भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।- प्रो ओमशंकर, कार्डियोलॉजिस्ट, आईएमएस, बीएचयू

अगर सोमवार 01 जुलाई की बात करें तो क्लाइमेट एजेंडा की कार्यकर्ता शानिया अनवर के मुताबिक मानक से डेढ गुना ज्यादा है एयर क्वालिटी इंडेक्स।

 

 

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