मवेशियों को शहर से बाहर ले जाने का कड़ा विरोध, कहा, पालतू पशुओँ के लिए नहीं है कोर्ट का आदेश, नगर निगम का नोटिस ही गलत

अपर नगर आयुक्त का घेराव कर सौंपा ज्ञापन

-काशी की परंपरा की याद दिलाई
-कान्हा उपवन में पशुओं की मौत पर जताई नाराजगी
-उच्च स्तरीय जांच की मांग
-दी कोर्ट जाने की चेतावनी

By: Ajay Chaturvedi

Published: 01 Jul 2019, 04:05 PM IST

वाराणसी. स्मार्ट सिटी बनारस से मवेशियों को बाहर करने की सरकारी योजना का विरोध बढता ही जा रहा है। इसी क्रम में गौ पालक और कुछ समाजसेवी सोमवार को नगर निगम पहुंचे नगर आयुक्त से मिलने पर उनकी गैरमौजूदगी में अपर नगर आयुक्त का घेराव किया और उन्हें सरकार की इस नई योजना की खामियां गिनाने के साथ ही भरतीय परंपरा का पाठ भी पढाया। साथ ही पांच पन्ने का ज्ञापन सौंपा। उन्होंने अपर नगर आयुक्त को गौपालन के मार्फत होने वाले कारोबार से नवयुवको को जोड़ कर बेरोजगारी की समस्या से निजात दिलाने सहित कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। साथ ही चेताया कि कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन नहीं होता तो वो खुद कोर्ट जाने को बाध्य होंगे।

उन्होंने कहा कि जहां तक न्यायालय का हवाला दे कर छुट्टा पशुओं को शहर से बाहर कान्हां उपवन में रखने की सच्चाई का सवाल है तो वहां आए दिन गायें मर रही हैं और उन्हें वहीं दफनाया जा रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए। अन्यथा राष्ट्रीय हरित अभिकरण द्वारा निर्गत आदेश व ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व स्वच्छता विधि 2017 तथा पशुक्रूरता अधिनियम 1960 के तहत कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

 

अपर  नगर आयुक्त को अपनी बात समझाते पशुपालक

ज्ञापन के माध्यम से पशुपालकों ने उठाया सवाल, प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन गौ पालकों, गौ सेवकों को लेकर इतना अव्यवहारिक क्यों? उनका कहना था कि नगर निगम की ओर से हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हए जो नोटिस जारी किया गया है उसमें समस्त पशुपालकों जिसके अंतर्गत पालतू पशुओं, दुधारु पशुओं का उल्लेख किया गया है जबकि हाईकोर्ट के आदेश में सड़क पर घूमने वाले जानवरों मसलन, सांढ, घुमंतू कुत्तों आदि पर कार्रवाई करनी है। इन्हें ही शहर से बाहर किया जाना है। ऐसे में निगम प्रशासन की वह नोटिस ही गलत प्रतीत होती है। यह कानून अवैध और अमान्य है।

उन्होंने यह भी कहा कि वाराणसी नगर निगम को उच्च न्यायलय के आदेशों एवं विभिन्न अधिनियमों की सही जानकारी हासिल कर नए सिरे से संशोधित नोटिस जारी करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर नगर निगम विधिक कार्रवाई नहीं करता तो उन्हें (पशुपालकों) को मजबूरन हाईकोर्ट की शरण लेना पड़ेगा। साथ ही इसकी शिकायत उत्तर प्रदेश सरकार से भी की जाएगी। पशुपालकों ने मांग की कि नगर निगम प्रशासन कानून की सही रूप में जानकारी कर नोटिस पुनः प्रकाशित करा कर नगरीय सीमा के अंदर हाईकोर्ट के आदेश का पालन सुनिश्चित कराए।

 

अपर नगर आयुक्त का  घेराव करते पशुपालक

पशुपालकों के प्रस्ताव

-यदि गौपालकों के मवेशियों के गोबर से दिक्कत है तो पूरे शहर में गीला और सूखा कूड़ा का जो कंटेनर रखा जा रहा है उसी तरह से जिन क्षेत्रों में गौ पालक हैं वहां निगम कंटेनर रखे ताकि सभी पशुपालक अपने जानवरों का गोबर कंटेनर में निर्धारित समय से डाल सकें। इसके बाद नगर निगम इसे एकत्र कर शहर के बाहर ले जाए।

-नगर निगम प्रशासन भी गौपालकों से गोबर उठाने के लिए प्रति महीने या छमाही अथवा वार्षिक तौर पर प्रति जानवर या जैसा उचित समझे एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत न्यूनतम सेवा शुल्क वसूले।

- शहर में जहां चारों तरफ गौपालक अपने आवासों या बाड़ों में जानवर रखे हैं लेकिन चारों विभिन्न क्षेत्रों में जानवरों के लिए मोहल्ला क्लीनिक बनाकर गौपालकों के जानवरों की देखभाल करते हैं तो इन्हें भी अतिरिक्त पारिश्रमिक मिलेगा।

-गोबर को शासन-प्रशासन शहर के बाहर सरकार जिस तरह एसटीपी से दूषित जल को फिल्टर कर स्वच्छ जल देने का वादा किया है वैसे ही गोबर से किसानों को खाद, कम्पोस्ट उपलब्ध कराए। साथ ही गांवों में गोबर गैस योजना लागू करे। इससे वैकल्पिक ऊर्जा के साधन उपलब्ध होंगे।

-जिस तरह मध्य प्रदेश की पिछली सरकार ने श्मशान घाटों पर लकड़ियों की जगह गोबर को लकड़ी का स्वरूप दे कर शवदाह करा रही थी उसी तरह यहां भी हो सकता है। यह धार्मिक भी होगा और पर्यावरण की सुरक्षा भी होगी।

-बाहरी क्षेत्र में गोबर इकट्ठा कर वहां के कम योग्य महिला-पुरुष के माध्यम से गोबर की लकड़ी बनवाई जा सकती है। इस गोबर की लकड़ी की बिक्री भी हो सकती है। इससे एक फायदा यह भी होगा कि जिस तरह से उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन बांटे गए थे मगर बाद में महंगा सिलेंडर वो नहीं ले पा रहे हैं और लकड़ी पर ही भोजन बना रहे हैं, ऐसे लोगों को मुफ्त में ये लकड़ियां दी जा सकती हैं।

-पशुओं के लिए निश्चित समय निर्धारित किया जाए ताकि दूध दूहने के बाद उन्हें खुले स्थान पर समय से छोड़ा जाय। यदि असमय खुली सड़कों पर जानवर मिलें तो पशुपालकों पर जुर्माना लगाया जाए। बड़े वाहनों के लिए जिस तरह से नो एंट्री का नियम है उसी तरह इन जानवरों के लिए निर्धारित हो।

- बड़े कारोबारियों, कारपोरेट घरानों को कारोबार की इजाजत देने के साथ ही इन पशुपालकों को भी अपने धंधे की छूट दी जाए ताकि उनकी रोजी-रोटी भी चलती रहे। वो भी अपनी जीविका चला सकें।

-प्राचीन नगरी काशी, बनारस दूध के व्यापार से जुड़ा है जहां आस-पास के जिले भी इससे लाभान्वित हो रहे हैं। वही धार्मिक, सांस्कृतिक दृष्टि से शिव मंदिरों सित अनेक शुभ मौकों प पर दुग्द्धाभिषेक, रुद्राभिषेक से लेकर तमाम पूजा-पाठ में गाय के कच्चे दूध और इससे निर्मित वस्तुओं का इस्तेमाल होता है। सनातनी परंपरा के घरों में आज भी गोबर से जमीन लेपन होता है। ऐसे में एगर गौसेवकों को दुधारु पालतू पशुओं को रखने पर रोक लगेगी तो काशी में धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति के विनिष्ट होने का खतरा पैदा हो जाएगा।

ये रहे शामिल

ज्ञापन सौंपने वाले प्रतिनिधिमंडल में प्रमुख रूप से संजीव सिंह, अमरनाथ पटेल, मनोहर यादव, रमेश यादव, राजेंद्र यादव, नीरज यादव, पवन यादव, धनंजय त्रिपाठी, अखिलेश यादव, रवि शंकर सिंह, संतलाल यादव, रामबाबू यादव, अजय यादव, राजकुमार गुप्ता, महेश उदित, प्रेम, नीरज, रामजी यादव, जय प्रकाश यादव, गुड्डू पटेल, संतोष यादव, राजकुमार यादव, सोनू, अजय मौर्य समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल रहे।

 

Ajay Chaturvedi
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