जानिए किस मुहुर्त में शुभ है जनमाष्टमी की पूजा

 जानिए किस मुहुर्त में शुभ है जनमाष्टमी की पूजा
Krishna Janmashtami

 भगवान श्रीकृष्ण का 5243वां जन्मोत्सव

वाराणसी. भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जो यूपी से लगायत लगभग सभी देश में धूम धाम से मनाया जाता है।  श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने को हुआ। भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। आज के दिन कृष्ण की नगरी भक्ति के रंगों में सराबोर हो उठती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक झांकियां लगाते हैं। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। कई जगह रासलीला का आयोजन भी किया जाता है। 



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जन्माष्टमी पूजन का शुभ मुहुर्त
ज्योतिष के अनुसार 24 अगस्त को रात 10:17 मिनट से ही अष्टमी लग जायेगी। लेकिन व्रत रखने का अच्छा मुहुर्त गुरूवार को ही है। यह भगवान श्रीकृष्ण का 5243वां जन्मोत्सव है। जन्माष्टमी पूजन का शुभ मुहुर्त 12 बजे से 12:45 तक का है। वहीं वत्र रखने वालों के लिए पारण का समय 26 अगस्त को 10:52 के बाद है। 





व्रत रखने वाले भक्तों के लिए कुछ खास बातें
जो भक्त जन्माष्टमी का व्रत करते हैं उन्हें जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करना चाहिए। व्रत वाले दिन स्नान आदि से निवृत होने के पश्चात भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं। 


जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (16) चरण सम्मिलित होते हैं। जन्माष्टमी की विस्तृत पूजा विधि, वैदिक मन्त्रों के साथ जन्माष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर उपलब्ध है।


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कृष्ण जन्माष्टमी पर व्रत के नियम

एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अतः जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।




जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये।

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अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है। हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से भी जाना जाता है।

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