पूर्वांचल के बाहुबलियों की सियासी नौका पार कराने को तैयार छोटे दल

पूर्वांचल के बाहुबलियों की सियासी नौका पार कराने को तैयार छोटे दल
bahubali of purvanchal

बृजेश, मोख्तार, मुन्ना बजरंगी, धनंजय, अतीक समेत अन्य दंबगों ने बदली रणनीति

वाराणसी. पूर्वांचल के बाहुबलियों के लिए संकट खड़ा हो गया है। प्रमुख राजनीतिक दल उन्हें अपनी पार्टी के झंडे के नीचे शरण देने को तैयार नहीं है। माफिया और बाहुबलियों का उपयोग यूं तो लंबे समय से प्रमुख दलों के नेता करते रहे हैं लेकिन बदलते वक्त में बाहुबलियों का साथ अब समाज के बीच मुश्किलें खड़ा कर दे रहा है। अपराधी, माफिया और बाहुबली के साथ गलती से भी किसी प्रमुख राजनेता की सेल्फी या तस्वीर सोशल मीडिया पर आ रही है तो मीडिया बखिया उधेडऩे में देरी नहीं लगा रही है। ऐसे में विधानसभा चुनाव 2017 में बाहुबलियों के लिए संकट खड़ा हो गया है। 

पूर्वांचल के बाहुबलियों, दबंग सफेदपोश व माफिया के लिए प्रदेश में अपना अस्तित्व खोज रहे छोटे दल सहारा बने हैं। छोटे दलों की नौका के सहारे चुनावी बैतरणी को पार करने की जुगत में हैं पूर्वांचल के बाहुबली। यूं तो राजा भैया जैसे बाहुबलियों को किसी पार्टी का झंडा ढोने की जरूरत नहीं है लेकिन कई ऐसे माफिया व बाहुबली हैं जिनकी जीत छोटे दलों की जातीय राजनीति व खुद के प्रभाव पर निर्भर करती है। 

बात पूर्वांचल के सबसे बड़े माफिया डॉन व दबंग विधायक मोख्तार अंसारी की हो तो सपा के सियासी ड्रामे के बीच यह स्पष्ट हो चुका है कि सपा प्रदेश अध्यक्ष ने मोख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का पार्टी में विलय करा भी दिया तो अखिलेश के पास टिकट वितरण का अधिकार होगा। अखिलेश जिन्होंने एक दिन पूर्व दिए इंटरव्यू में कौएद के विलय के सवाल पर माफिया मोख्तार अंसारी का नाम तक नहीं लिया वह उन्हें टिकट देने से रहे। यह बात बखूबी मोख्तार और उनके भाइयों के दिमाग में आ गई है। सूत्रों के अनुसार अब मोख्तार अंसारी भी नहीं चाहते कि पार्टी का विलय सपा में हो। ऐसे में मोख्तार और उनके भाइयों के पास खुद की खड़ी कई गई पार्टी के झंडे के नीचे ही चुनाव लडऩा पड़े। 

झांसी जेल में बंद माफिया मुन्ना बजरंगी को भी उत्तर प्रदेश में एक जाति विशेष पर खासा प्रभाव डालने वाले अपना दल कृष्णा पटेल गुट का साथ मिला है। मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह अपना दल के टिकट पर जौनपुर के मडियाहूं विधानसभा सीट से चुनाव लडऩे की तैयारी में हैं। इस विस क्षेत्र में पटेल वोट बैंक का खासा प्रभाव है। गौरतलब है कि मुन्ना बजरंगी के समर्थकों की बातचीत बसपा से चल रही थी लेकिन बीते राजनीतिक घटनाक्रम ने ऐसा खेल रचाया कि बजरंगी के लिए बसपा के दरवाजे बंद हो गए। 

माफिया से बाहुबली माननीय का सफर करने वाले एमएलसी बृजेश सिंह भी अपनी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह को विधानसभा में पहुंचाने के लिए क्षेत्रीय दल के सहारे बैठे हैं। बीजेपी से बृजेश सिंह के भले ही अच्छे रिश्ते हों, भतीजा पार्टी में हो लेकिन बृजेश की एंट्री से बीजेपी पर सवाल उछल सकते हैं। यह बात बृजेश सिंह और बीजेपी अच्छे से समझती है इसलिए पर्दे के पीछे से पार्टी और कार्यकर्ता बृजेश के लिए खड़े हैं। बृजेश सिंह ने इसीलिए पत्नी अन्नपूर्णा सिंह को प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ाने का मन बनाया है। बीजेपी का साथ मिले इसलिए इस बिंद समाज में खासा प्रभाव रखने वाले इस दल का भाजपा के साथ गठबंधन की तैयारी चल रही है। 

पूर्वांचल के एक और बाहुबली नेताओं में शामिल हैं जौनपुर के धनंजय सिंह। धनंजय सिंह को यकीन था कि बसपा से टिकट उन्हें मिलेगा लेकिन समय चक्र ने ऐसा खेल खेला कि धनंजय को लेने के लिए कोई प्रमुख दल तैयार नहीं। भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ साठगांठ कर अपनी रोटी सेंक रहे धनंजय की करतूत मायावती के कानों में जा पड़ी। दयाशंकर सिंह प्रकरण के बाद से बसपा में क्षत्रिय नेताओं को लेकर पहले से ही रोष था, धनंजय की दगाबाजी ने आग में घी डालने का काम किया। अब धनंजय के पास भी क्षेत्रीय दल का ही सहारा है। 

दबंग विधायक मोख्तार अंसारी जैसा ही हाल कुछ-कुछ उनके मित्र रहे इलाहाबाद के बाहुबली अतीक अहमद का है। अतीक सपा के टिकट पर विधानसभा पहुंच चुके हैं लेकिन इस बार सपा से टिकट मिल पाएगा या नहीं, अभी संशय है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास यदि टिकट बांटने का अधिकार रहा और उनकी चली तो तय है कि अतीक को भी साइकिल का साथ मिलने से रहा। हालात को देखते हुए अतीक भी अपना दल  समेत अन्य छोटे दलों की तरफ आस लगाकर बैठे हैं। गौरतलब है कि कुछ माह पूर्व कौशांबी में एक सार्वजनिक सभा के दौरान मंच पर मौजूद अतीक ने अखिलेश के साथ गले लगने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने धक्का देकर अपने से दूर कर दिया था। 

उत्तर प्रदेश में सक्रिय छोटे दलों के मुखिया बाहुबलियों की मुश्किलों से काफी प्रसन्न हैं। वजह भी खास है। बाहुबलियों के पार्टी से जुडऩे से इन्हें फंड की कमी नहीं होगी। दूसरा यह कि बाहुबलियों के गुर्गे कार्यकर्ता के रूप में प्रचार-प्रसार करने के लिए मिल जाएंगे। बाहुबलियों के उनके झंडे के नीचे लडऩे से पार्टी का भी प्रचार-प्रसार हो जाएगा। इतना ही नहीं बाहुबली, माफिया उनके पार्टी सिंबल पर चुनाव जीतकर सदन में पहुंचते हैं तो पार्टी के मुखिया को भी इसका फायदा अन्य तरीकों से मिलना तय है।  
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