इस अद्भुत महोत्सव का साक्षी बनेगी वाराणसी, वर्षों पुरानी है परंपरा

इस तीन दिवसीय महोत्सव में पद्मश्री शोमा घोष के गायन पर नृत्य प्रस्तुति करेंगी नगर बालाएं

By: Ajay Chaturvedi

Published: 10 Apr 2019, 03:41 PM IST

वाराणसी. काशी पुराधिपति की नगरी में महाश्मशान घाट पर विराग के गीत इस बार फिर होंगे। चैत्र मास की पंचमी से सप्तमी तिथि तक गुलजार रहने वाले बाबा महाश्मशान के दरबार में इस वर्ष भी नगर वधुएं अपनी हाजिरी लगाएंगी। माना जाता है कि समूची दुनिया में ऐसा प्रोग्राम केवल और केवल शिव की नगरी काशी में ही होता है। अन्य किसी देश या संस्किृति में किसी धार्मिंक स्थल या श्मशान में नगर वधुओं का नृत्य होता हो ऐसा इतिहास में नहीं मिलता।

ये काशी ही है जहां होली से एक दिन पूर्व महाश्मशान में चिता की राख से होली खेली जाती है और चैत्र नवरात्र में नगर वधुओं का नृत्य होता है। एक तरफ चिताएं जलती रहती हैं तो दूसरी तरफ रंगारंग कार्यक्रम चलता है। यह होता है बाबा श्मशान नाथ के तीन दिवसीय वार्षिक श्रृंगार महोत्सव के तहत जो 10 अप्रैल से शुरू हो रहा है।

इस बाबत श्री श्री 1008 महाश्मशान नाथ सेवा समिति के अध्यक्ष चेनु प्रसाद गुप्ता, व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने संयुक्त रुप से बातचीत में बताया कि महोत्सव के पहले दिन 10 अप्रैल को बाबा का वैदिक रीति से रुद्राभिषेक होगा। महामृत्युंजय मंदिर से भव्य शोभायात्रा निकलेगी, इसके साथ रात्रि में भव्य जागरण होगा। दूसरे दिन 11 अप्रैल को भोग आरती के बाद भव्य भंडारा और संध्या में तांत्रिक विधि से तंत्र पूजन और भक्ति भजन संध्या होगा। कार्यक्रम के अंतिम दिन 12 अप्रैल को तांत्रिक विधि से पूजन और उसके बाद नगर वधुएं नृत्य करेंगी।

कार्यक्रम के अंतिम दिन काशी कोकिला पद्मश्री शोमा घोष अपनी प्रस्तुति देंगी। जिनकी गायकी पर एक बार फिर नगर वधुएं नृत्य करेंगी। अब तक के इतिहास में यह दूसरी बार होगा जब कोई बड़ा कलाकार महाश्मशान नाथ के दरबार पर अपनी हाजरी लगाएगा। इससे पूर्व 2017 में शोमा घोष ने अपनी प्रस्तुति दी थी। पद्मश्री घोष कार्यक्रम की शुरुआत मां काली स्त्रोत, दुर्गा स्त्रोत और शिव तांडव से करेंगी और उसके बाद ठुमरी, दादरा, ककहरवा, सूफियाना सहित तमाम गीतों से समा बांधेंगी। शोमा घोष के साथ प्रख्यात तबला वादक अशोक पांडेय के पुत्र जय पांडेय भी अपनी हाजिरी लगाएंगे।

काशी के महाश्मशान घाट पर यह अनूठा कार्यक्रम अचानक यूं ही नहीं शुरू हो गया। बल्कि इसके पीछे एक बेहद पुरानी परंपरा है। श्मशान के सन्नाटे के बीच नगरवधुओं के डांस की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। मान्यताओं के मुताबिक आज से सैकड़ों साल पहले राजा मान सिंह द्वारा बनाए गए बाबा मशान नाथ के दरबार में कार्यकम पेश करने के लिए उस समय के जाने-माने नर्तकियों और कलाकारों को बुलाया गया था। चूंकि ये मंदिर श्मशानघाट के बीचों बीच मौजूद था, लिहाजा तब के चोटी के तमाम कलाकारों ने यहां आकर अपने कला का जौहर दिखाने से इनकार कर दिया था।

लेकिन राजा ने इस कार्यक्रम का ऐलान पूरे शहर में करवा दिया था, लिहाजा वो अपनी बात से पीछे नहीं हट सकते थे। बात यहीं रुकी पड़ी थी कि श्मशान के बीच डांस करने आखिर आए तो आए कौन ? इसी उधेड़बुन में वक्त तेजी से गुजर रहा था। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जब किसी को कोई उपाय नहीं सूझा तो फैसला ये लिया गया कि शहर की बदनाम गलियों में रहने वाली नगरवधुओं को इस मंदिर में डांस करने के लिए बुलाया जाए। उपाय काम कर गया और नगरवधुओं ने यहां आकर इस महाश्मशान के बीच डांस करने का न्योता स्वीकार कर लिया। ये परंपरा बस तभी से चली आ रही है। धधकती चिताओं के बीच नृत्य करने के पीछे नगरवधुओं का तर्क होता है कि उन्हें अगले जन्म में इस दुर्गति से मुक्ति मिलेगी इसी विश्वास से वह प्रत्येक वर्ष यहां आती है और अपना नृत्य पेश करती है।

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