निकाय चुनावः काशी में दो बड़े राजनीतिक घरानों में करारी जंग

निकाय चुनावः काशी में दो बड़े राजनीतिक घरानों में करारी जंग
श्यामलाल यादव व शंकर प्रसाद जायसवाल

Ajay Chaturvedi | Updated: 06 Nov 2017, 05:18:17 PM (IST) Varanasi, Uttar Pradesh, India

दोनों ही राजनीतिक घरानों का रहा है काशी की राजनीति पर वर्चस्व।

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. यूं तो मेयर पद किसी भी शहर के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। वह शहर का प्रथम नागरिक होता है। शहर के विकास से लेकर तमाम अन्य औपचारिकताएं मेयर ही पूरी करता है शहर के बाबत। ऐसे में इस बार ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक नगरी काशी जिसका विश्व पर्यटन के मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान है वहां का मेयर कैसा हो इसे लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक गलियारों में ही नहीं चाय-पान की दुकानों तक में मेयर प्रत्याशियों को लेकर बहसों का दौर चल रहा है। चर्चा का मुख्य मुद्दा अब तक घोषित मेयर प्रत्याशियों को लेकर है जो शहर के दो बड़े राजनीतिक घरानों से ताल्लुक रखती हैं। दो बहुओं के बीच यह मुकाबला होने जा रहा है जो काफी रोचक होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसमें एक हैं राज्यसभा के पूर्व उपसभापति, पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री स्व श्याम लाल यादव की पुत्रवधु जिन्हें कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है। दूसरी ओर बेजेपी ने वाराणसी के पूर्व सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल की पुत्रवधु को मुकाबले में उतारा है। यानी इस बार दो पार्टी, दो प्रत्याशी के साथ दो बड़े राजनीतिक घरानों के बीच यह निर्णायक संघर्ष होने जा रहा है। ये ऐसे परिवार हैं जिनकी इस शहर में अच्छी साख रही है। दोनों ही परिवार बेदाग परिवार हैं। दोनों का राजनीतिक करियर लाजवाब रहा है। हालांकि दोनों को दोनों ही पार्टियों की ओर से अंतिम समय में दुर्दिन देखना पडा। लेकिन अब संकट की घड़ी में दोनों पार्टियों के लिए यही परिवार संकट मोचन साबित हुए। इसमें कौन बाजी मारेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है पर संघर्ष का रोमांच अभी से चरम पर पहुंचने लगा है।

शालिनी यादव

बता दें कि कांग्रेस ने स्व. श्यामलाल यादव की पुत्रवधु शालिनी यादव को मैदान में उतारा है। श्यामलाल यादव का नाम बनारस की राजनीति में एक साफ सुथरी राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में लिया जाता है। स्व. श्यामलाल यादव ने लखनऊ से एमए-एलएलबी की शिक्षा ग्रहण कर वाराणसी में वकालत शुरू की। उनका राजनीतिक सफर 1952 से शुरू हुआ। पहली बार 1957 में वाराणसी के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए। लेकिन 1967 में भारतीय क्रांति दल का गठन हुआ तो कांग्रेस छोड़ कर इस नई पार्टी से जुड़ गए और बीकेडी के टिकट पर चुनाव जीता। इतना ही नहीं वह प्रदेश के विधि व कानून मंत्री बने। लेकिन ज्यादा समय तक वह कांग्रेस से अलग नहीं रह सके और 1971 में उन्होंने फिर कांग्रेस ज्वाइन कर लिया। वह 1970 से 1988 तक लगातार तीन बार राज्यसभा सदस्य रहे, 1982 में राज्यसभा के उपसभापति बने। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में वाराणसी संसदीय सीट से चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसके बाद 1986 में केंद्र में कृषि मंत्री बने। इस तरह कहा जा सकता है कि स्व. यादव का राजनीतिक कद बहुत ऊंचा था। काशी की जनता उन्हें अत्यंत शालीन नेता के रूप में पहचानती रही है। कभी जोड़-तोड़ की राजनीति नहीं की। कांग्रेस में रहते हुए भी श्यामलाल खेमे का नाम नहीं सुना गया जैसे पंडित कमलापति त्रिपाठ, सुधाकर पांडेय के बीच रस्साकसी चलती रहती थी। ये दो घराने काफी चर्चित रहे बनारस कांग्रेस घराने के रूप में। इसके बाद देवेंद्र द्विवेदी खेमे का भी नाम लिया जाना लगा था। लेकिन श्याम लाल यादव खेमा कभी वजूद में नहीं आया। लोगों ने दबी जुबान से खेमेबंदी की बात की भी तो उसे सामाजिक स्वीकारोक्ति नही मिली। अलबत्ता बनारस की जनता उन्हें 'बाबू जी' के नाम से जानती रही जैसे कमलापति जी को 'बाबू' के नाम से। ऐसे में साफ सुथरी राजनीति का उन्हें पुरस्कार भी मिली। उनके जीते जी उनके बेटे भी राजनीति में सक्रिय हुए। लेकिन कोई बड़ा ओहदा नहीं मिला। वह तो 2005 में श्यामलाल के निधन के बाद बनारस आए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके पुत्र अरुण यादव को कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से जोड़ा। अरुण यादव कांग्रेस के प्रदेश कमेटी में उच्च पदों पर रहे। वर्तमान में वे पिछड़ा विभाग के प्रदेश अध्यक्ष हैं। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि बाबू जी की साफ सुथरी राजनीति का लाभ उनकी पुत्रवधु शालिनी को उठाने का एक मौका मिला है, लेकिन यह उनके अपने व्यक्तित्व व राजनीतिक सोच पर निर्भर करता है कि वह उसे कितना भुना पाती हैं। लेकिन पार्टी ने अपनी ओर से बड़ा दांव खेला है। इससे एक संदेश यह भी देने का प्रयास किया गया है कि पार्टी इस बार एकजुट हो कर चुनाव मैदान में उतर रही है। पार्टी प्रत्याशी का कहीं से विरोध नहीं होगा। इसके लिए मेन पार्टी के अलावा फ्रंटल संगठन भी अपना सब कुछ लगा देंगे।

मृदुला जायसवाल

उधर शंकर प्रसाद जायसवाल की बात करें तो नगर पालिका परिषद में सभासद से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले शंकर प्रसाद विधायक भी रहे और लगातार तीन बार सांसद भी रहे। वह 1996, 1998 और 1999 में वाराणसी से सांसद चुने गए। वाराणसी से दिल्ली तक के आराम दायक सफर के लिए शिव-गंगा ट्रेन का तोहफा शंकर प्रसाद जायसवाल ने ही काशीवासियों ने दिया। उनके नेतृत्व में ही 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ट्रेन की मांग की गई थी। शंकर प्रसाद ने ही शिव-गंगा ट्रेन का नाम बताया, जो रेल बजट में पास हुआ। इसके अलावा भी उन्होंने वाराणसी के विकास के लिए तमाम सारी योजनाएं अपने ससदीय कार्यकाल में लागू कराईं। वह भी वाराणसी के ध्वस्त ट्रैफिक व्यवस्था से परेशान थे इसके समाधान के लिए ओवर ब्रिज व फ्लाईओवर का जाल बिछाने का सपना देखा था। लोगों को शुद्ध पेयजल मिले इसके लिए भी उन्होंने पहल की थी। सबसे बड़ी बात यह कि केंद्र में सरकार भले कांग्रेस की रही हो फिर भी उन्होंने अपनी तरफ से जोरदार वकालत कर बनारस के लिए कई योजनाएं स्वीकृत कराईं। वह काशी की जनता में काफी लोकप्रिय सांसद रहे। उनका दरवाजा हर काशीवासी के लिए हमेशा खुला रहता था। सबके सुख-दुःख में वह बराबर के सहभागी रहे। बेहद शालीन और हमेशा मुस्कुराते रहने वाले शंकर प्रसाद जायसवाल से जो भी एक बार मिला वह उनका मुरीद हो गया। सबसे बड़ी बात यह कि वह एक जमीनी नेता रहे। उन्होंने लंबे अरसे तक बनवासियों, आदिवासियों के उत्थान के लिए काम किया। पेट्रोलियम पदार्थों का व्यवसाय रहा उनका। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में उन्होने कभी कोई दाग नहीं लगने दिया। बावजूद इसके पुराने राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि वह लगातार चौथी बार भी सासंद बनते लेकिन पार्टी में ही उनकी दावेदारी को लेकर सवाल खड़े हुए। बावजूद इसके शीर्ष नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया पर पार्टी की अंदरूनी राजनीतिक जोड़ तोड़ की लड़ाई में वह मात खा गए जिसका नतीजा रहा कि कांग्रेस के युवा प्रत्याशी डॉ राजेश मिश्र ने उन्हे शिकस्त दी। उसके बाद से ही वह सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होते चले गए। 83 वर्ष की में तीन जनवरी 2016 को उनका निधन हुआ। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात कि अंतिम दिनों में पार्टी ने उन्हें एक तरह से बिसरा ही दिया था। लंबे अरसे से वह बीमार रहे। यहीं सिगरा क्षेत्र के अबालिकापुरी कालोनी में रहते थे। वह ठीक से चल भी नही पाते थे। देर तक किसी से बात भी नहीं कर पाते थे। लेकिन इस बीमारी की हालत में उन्हें कोई देखने व पूछने भी नहीं जाता था इसका मलाल भी रहा उन्हें लेकिन उसे कभी सार्वजनिक नहीं किया। सबसे अहम यह कि शंकर प्रसाद जायसवाल ने वाराणसी संसदीय सीट से कांग्रेस के दबदबे को चुनौती दी और उसमें वह सफल हुए। ऐसे में उनके इकलौते पुत्र की पत्नी मृदुला पर भरोसा कर बीजेपी ने एक बार फिर से पार्टी के समर्पित राजनीतिक परिवार को तवज्जो दी है। इसका लाभ उन्हें मिल सकता है। इसका एक कारण यह भी है कि शंकर प्रसाद जायसवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने स्वयंसेवक रहे। संघ में उनकी अच्छी पैठ रही। ऐसे में इस मेयर के चुनाव में बीजेपी के साथ संघ के स्वयंसेवक भी उनकी पुत्रवधु के समर्थन में अपना सर्वस्व लगाने में कोई कोर कसर नही रख छोड़ेगी।

साधना गु्प्ता

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बनारस में बीजेपी को स्थापित करने वालों में दो ही नाम थे हरिश्चंद्र श्रीवास्तव उर्फ हरीश जी और दूसरे शंकर प्रसाद जायसवाल। इन दोनों ही परिवारों को लगातार महत्व मिला है। पार्टी ने पहले हरीश जी के पुत्र सौरव को न केवल विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाय बल्कि उन्हें भारी मतों से जिताने का भी काम किया। अब लगभग वैसी ही स्थित मृतुला जायसवाल के साथ है। और इसमे संघ व बीजेपी कुछ भी नहीं रख छोड़ेगी। ऐसे में इस बार मेयर पद का संघर्ष रोचक होगा जहां बीजेपी और संघ पूरी जोर लगाएगा तो कांग्रेस के सभी फ्रंटल संगठनों के सात कोई कोर कसर नहीं रख छोड़ेगी। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि श्यामलाल यादव और शंकर प्रसाद जायसवाल की पुत्रवधुओं के बीच समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव संजय गुप्ता की पत्नी का आना लड़ाई को त्रिकोणात्मक बना रहा है। लेकिन अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी कि ऊंट किस करवट बैठेगा।

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