काशी की विभूतियों की एक और कड़ी टूटी, भारतेंदु के प्रपौत्र का निधन

काशी की विभूतियों की एक और कड़ी टूटी, भारतेंदु के प्रपौत्र का निधन
bhartendu great grand son

लंबे समय से चल रहे थे बीमार 

वाराणसी. काशी के नगीनों में शुमार एक और नगीना आज टूट गया। साहित्य को अपनी रचनाओं से उचाईयों पर पहुँचाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के प्रपौत्र प्रो. गिरीश चन्द्र चौधरी जी की आत्मा परमात्मा में विलीन हो गयी। शनिवार रात उनकी साँसों की कड़ी टूट गयी।

प्रो. चौधरी लंबे समय से बीमार चल रहे थे और बीएचयू में भतीज़् थे। उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्य जगत से लेकर बीएचयू में शोक की लहर दौड़ गई।  रविवार को उनका अंतिम संस्कार हरिश्चंद्र घाट पर हुआ। मुखाग्नि उनके पुत्र श्री दीपेश चन्द्र चौधरी ने दी। घाट पर काशी की तमाम हस्तियां उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंची थी।

12 जून 1942 को जन्मे प्रो चौधरी मूल रूप से जाने माने वैज्ञानिक थे। लगभग चार दशक तक उन्होंने अपनी सेवा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के तौर पर दी। उन्होंने अपना सम्पूणज़् जीवन बनारस को ही समपिज़्त कर दिया था। काशी की अनेक प्राचीन संस्थाओं से जुड़े थे। इनमे हरिश्चंद्र कालेज, नागरी प्रचारिणी सभा, नागरी नाटक मण्डली, गोपी राधा बालिका इंटर कालेज, काशी तीथज़् सुधार ट्रस्ट, प्राचीन गोपाल मंदिर आदि संस्थाएं प्रमुख हैं।

प्रो चौधरी का काशी के कूपों एवं तालाबों पर गम्भीर चिंतन था। उन्होंने काशी की भूजल स्थिति और गंगा की अविरलता को बरकरार रखने के लिए कालजयी शोध किया था। उनका पंचांगों पर भी विशेष अध्ययन था। हाल ही में उनकी बनारस की मस्जिदों पर केंद्रित अद्भुत पुस्तक प्रकाशित हुई थी।
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