कैंसर रोगियों के लिए बड़ी खुशखबरी, BHU ने खोजी सटीक दवा!

कैंसर रोगियों के लिए बड़ी खुशखबरी, BHU ने खोजी सटीक दवा!
कैंसर

Ajay Chaturvedi | Publish: May, 04 2019 07:57:23 PM (IST) | Updated: May, 04 2019 07:57:24 PM (IST) Varanasi, Varanasi, Uttar Pradesh, India

-डायबिटीज में भी है कारगर
-वनस्पति विज्ञान विभाग में की प्रोफेसर ने किया है शोध

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. कैंसर जैसी घातक व जानलेवा बीमारी का नाम सुन कर ही आधा जीवन घट जाता है। मरीज ही नहीं बल्कि समूचा परिवार और नाते रिश्तेदारों के भी हलक सूख जाते है। उनकी हालत भी गंभीर हो जाती है। ये रोग ही ऐसा है। लाखों-करोड़ों खर्च करके भी जान बच पाएगी कि नहीं यह नहीं कहा जा सकता। ऐसा नहीं कि कैंसर जैसी जान लेवा बीमारी का इलाज नहीं या उसके लिए दवाएं नहीं है। लेकिन एक तो वो बहुत महंगी है और दूसरे उनका साइड इफेक्ट भी है। ऐसे में अब कैंसर रोगियों और उनके परिवार जनों के लिए अच्छी खबर है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वनस्पित विज्ञान विभाग की प्रोफेसर ने अपनी शोध छात्रा संग मिल कर एक ऐसी अचूक दवा का इजाद किया है जिससे न केवल कैंसर बल्कि डायबिटीज पर भी नियंत्रण किया जा सकता है। सबसे अच्छी बात यह कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह से हर्बल है।

बता दें कि आधुनिकीकरण के इस समय में जैवसंपदा एवं मानव स्वास्थय का क्षरण प्रमुख समस्याओं की तरह उभर कर सामने आ रहा हैं। प्रदूषित वातावरण एवं अव्यवस्थित मानव जीवनशैली के परिणाम स्वरुप मनुष्य आज विभिन्न प्रकार के रोगों जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर आदि से पीड़ित है। सामान्यरूप से बाजार में इन रोगों के लिए बहुत सी दवाएं उपलब्ध है, लेकिन इन दवाओं से उपचार के साथ ही साथ शरीर में बहुत से अन्य दुष्प्रभाव (साइड इफ़ेक्ट) भी हो जाते है।

 

ऐसे तैयार की जा रही कैंसर की दवा

ऋष्यगंधा के जैवसक्रिय यौगिकों एवं आधुनिक तकनीकियों के समागम से मानव रोगों का निदान हुआ संभव

प्राचीन समय में औषधिय पौधों का प्रयोग कर मानव शरीर की रोगों से रक्षा की जाती थी, जिनका शरीर पर कोई अन्य दुष्प्रभाव भी नहीं होता था। आयुर्वेदिक किताबो में उल्लेखित 'ऋष्यगंधा' एक औषधीय पौधा है, जिसे सामान्य भाषा में पनीर का फूल या पनीर बंध के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिक शब्दों में इसे 'विधानिया कोअगुलंस' के नाम से जानते है। यह पौधा प्राचीन काल से ही आयुर्वेद में मधुमेह, कैंसर, दांत दर्द, मोटापे में कमी के लिए प्रयोग किया जाता रहा है, लेकिन इसके अनुचित रख-रखाव एवं अंधाधुंध प्रयोग के कारण आज यह एक संकटाग्रस्त पौधे की तरह जाना जाता है। वास्तव में अब वैज्ञानिक तकनीकियों के साथ आयुर्वेदिक वनस्पतियों के प्रयोग से, एलिलोपैथीक दवाओ से ज्यादा कारगर दवाओ का इजाद संभव हो रहा है। वनस्पति विज्ञानं विभाग, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रो. शशि पांडेय ने इसे संभव कर दिखाया है।

 

कैंसर  की दवा पर शोध करने वाली टीम

पनीर के फूल (पनीरबंध) के जरिए बनाई दवा

पत्रिका संग खास बातचीत में प्रो. पांडेय ने बताया कि वह खुद और उनकी शोधार्थी (रिसर्च स्कॉलर) ने प्रयोगशाला में ही कृत्रिम ऊतक संवर्धन विधि से संकटाग्रस्त पौधे पनीर के फूल का उत्पादन संभव कर लिया है। साथ ही उन्होंने इन उतक संवर्धित पौधों में उपस्थित जैवसक्रिय यौगिक विथानोलॉयड्स के प्रतिशत को भी बढाया है। अपने इस शोध कार्य को आगे ले जाते हुए प्रो. पांडेय ने नैनो टेक्नॉलजी के साथ इन कृत्रिम उतक संवर्धित पौधों का प्रयोग कर सूक्ष्म नैनोकणों का निर्माण किया। प्रो. पांडेय ने बताया की उनकी प्रयोगशाला में बनाए गए ये नैनोंकण रोग प्रतिरोधी विथानोलॉयड्स से जुड़े रहते है, जो की कैंसर एवं मधुमेह के प्रति प्रभावी यौगिक के रूप में जाना जाता है।

 

 

पनीरबंद का पौधा जिससे तैयार हुई दवा

पनीर के फूल की पतियों से बने ये नैनोकण सर्वाईकल कैंसर के प्रति प्रभावी

उन्होंने बताया की ये नैनोकण न केवल कम मात्रा में प्रयोग होते है बल्कि रोग प्रतिरोधी विथानोलॉयड्स के प्रभाव को भी बढ़ा देते हैं। पनीर के फूल की पतियों से बने ये नैनोकण सर्वाईकल कैंसर के प्रति प्रभावी पाए गए है, जिनका प्रयोग भविष्य में बड़े स्तर पर किया जाना संभव हो सकता है। इन शोधकार्यों के फलस्वरूप इस संकटाग्रस्त पौधे का विस्तार रूप से उत्पादन संभव हुआ है। साथ ही साथ कैंसर के क्षेत्र में भी इसके प्रयोग की संभावनाएं दिखाई दे रही है, क्योकि ये नैनोकण कैंसर के प्रति प्रभावी विथानोलॉयड्स की क्षमता को 50 फीसद से अधिक बढ़ावा प्रदान करते है। प्रो. पांडेय ने बताया की इस विषय पर शोध कार्य अभी भी जारी है। साथ ही साथ इसके प्रभाव का अध्यन चूहों एवं पौधों दोनों पर भी देखा जा रहा है। अब तक से अध्यन के नतीजे प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओ इंडस्ट्रियल क्रॉप्स एंड प्रोडक्ट्स एवं मटेरियल साइंस एंड इंजिन्यरिंग सी में प्रकाशित हो चुके है।

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