CM योगी के सामने गोरखपुर व फूलपुर संसदीय सीट बचाने की बड़ी चुनौती

गोरखपुर संसदीय सीट पर नौ बार से है गोरखनाथ मंदिर के महंतों का कब्जा। फूलपुर में पंडित नेहरू की सीट पर पहली बार जीती थी भाजपा।

 

 

By: Ajay Chaturvedi

Published: 11 Sep 2017, 01:42 PM IST

वाराणसी. योगी आदित्यनाथ के बतौर मुख्यमंत्री यूपी की दो संसदीय सीटों पर बीजेपी का कब्जा बरकरार रखना बड़ी चुनौती है। एमएलसी बनने के बाद गोरखपुर और इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीटें रिक्त हो गई हैं। योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य दोनों ही निर्विरोध एमएलसी चुने जा चुके हैं। ऐसे में अब इन दोनों सीटों पर होने वाले उपचुनाव में बीजेपी की साख दांव पर होगी। साझा विपक्ष पूरी कोशिश में होगा कि किसी न किसी तरह से इन दोनों अथवा किसी एक सीट को बीजेपी से छीन ले। ऐसे में यह कहा जाए कि इन दोनों ही उपचुनाव में जीत हासिल करना 2019 के आम चुनाव से पहले सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए एक तरह से लिटमस टेस्ट होगा तो अतिशयोक्ति न होगी।

 

गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीटों पर गौर करें तो दोनों ही संसदीय क्षेत्रों में बड़ी दिलचस्प लड़ाई रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मोदी लहर में इन सीटों पर सभी विपक्षी दलों के प्रत्याशियों को करारी शिकस्त दी थी। आलम यह कि इन सीटों पर विपक्षियों को मिले कुल से कहीं ज्यादा वोट बीजेपी प्रत्याशियों को मिले थे। गोरखपुर संसदीय सीट बीजेपी की परंपरागत सीट मानी जाती है। सबसे पहले महंत अवैद्यनाथ ने 1989 में हिंदु महासभा के टिकट पर चुनाव जीता था। इसके बाद बीजेपी और हिंदूवादी संगठनों के जीत का सिलसिला बदस्तूर अब तक (2014 तक) कायम रहा है। वैसे महंत अवैद्यनाथ गोरखपुर से चार बार सांसद रहे। पहली बार 1970 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता। फिर 1989 में हिंदू महासभा, फिर 1991 व 1996 में बीजेपी के टिकट पर सांसद चुने गए।

 

महंत अवैद्यनाथ की राजनीतिक विरासत को योगी आदित्यनाथ ने 1998 में संभाला तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। पांच बार से लगातार बीजेपी के टिकट से योगी संसद पहुंच रहे हैंष। चाहे बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग रही हो अथवा अखिलेश का समाजवाद। उन्हें कभी कोई चुनौती नहीं दे सका। 2014 के लोकसभा चुनाव में तो योगी ने 5,39,127 मत हासिल किए जबकि दूसरे नंबर पर रही सपा उम्मीदवार को 2,26,344 वोट, बसपा को 1,76, 412 और कांग्रेस को 45,719 वोट मिले थे। आंकड़े बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ को इन तीनों पार्टी से ज्यादा वोट मिला था। लेकिन अब तस्वीर बदली है। योगी आदित्यनाथ खुद उम्मीदवार नहीं हैं। अब वह अपनी इस सीट पर किसे उतारते हैं यह बड़ी बात होगी। फिर उसे अपनी तरह फतह हासिल कराना उससे बड़ी चुनौती होगी।

 

अगर फूलपुर संसदीय सीट की बात करें तो यह यह कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू फूलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं और तीन बार इसी सीट से चुनकर लोकसभा पहुंचे। बीजेपी ने पहली बार 2014 में मोदी लहर में फूलपुर सीट पर कब्जा किया और केशव प्रसाद मौर्य इस सीट से सांसद बने। लेकिन फूलपुर सीट पर कांग्रेस के बाद जनता दल फिर एसपी के कब्जे में रही। सपा ने 1996 से लेकर 2004 तक लगातार जीत हासिल की। उससे पहले दो बार इस सीट पर जनता दल का प्रत्याशी विजयी रहा। एक बार 2009 में बीएसपी भी इस सीट पर जीत हासिल कर चुकी है। ऐसे में बीजेपी के लिए फूलपुर सीट को बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

 

 

 

2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो कुल 9,60,341 मतों में से बीजेपी के केशव मौर्य को 5,03,564 सपा को 1,95,256, बसपा को 1,63,710 तथा कांग्रेस उम्मीदवार को 58,127 मत मिले थे। इस तरह यहां भी तीन विपक्षी पार्टियों को मिले वोट से कहीं ज्यादा बीजेपी प्रत्याशी को मिले थे। लेकिन इस बार बीजेपी की प्रदेश में न 2014 की मोदी लहर है न विधानसभा 2017 के चुनाव की तरह के हालात हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी को घेरने के लिए सपा और बसपा एक हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकती है। चर्चा तो यह भी है कि खुद बसपा सुप्रीमों मायावती फूलपुर से मैदान में उतर सकती हैं। अगर ऐसा होता है तो सीएम योगी के लिए मुसीबत ही बढ़ेगी। कारण योगी सरकार के छङ महीने के कार्यकाल को देखा जाए तो उनके पास गिनाने को कुछ खास उपलब्धियां नहीं है। विधानसभा चुनाव में जिन मुद्दों को लेकर बीजेपी और पीएम मोदी अखिलेश सरकार पर हल्ला बोल रहे थे आज उन्हीं मुद्दों पर बीजीपी सरकार घिरी नजर आ रही है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि क्या मौजूदा माहौल को विपक्ष भुना पाएगा। वैसे चाहे जो हो पर गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट का उपचुनाव होगा रोचक।

 

 

 

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