महंगाई की एक और मार झेलने को हो जाएं तैयार, बिजली भी होगी महंगी, निजीकरण की तैयारी

महंगाई की एक और मार झेलने को हो जाएं तैयार, बिजली भी होगी महंगी, निजीकरण की तैयारी

Ajay Chaturvedi | Publish: Sep, 09 2018 03:45:06 PM (IST) Varanasi, Uttar Pradesh, India

इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2014 का संशोधित ड्राफ्ट जारी, बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरियों ने जताया विरोध, आंदोलन की बनने लगी रणनीति>

वाराणसी. पेट्रोल, डीजल सहित तमाम सामानों के दाम में बढ़ोत्तरी, निजीकरण के बाद अब केंद्र सरकार ने पॉवर सेक्टर का भी निजीकरण करने की तैयारी कर ली है। इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2014 का संशोधित ड्राफ्ट जारी कर दिया गया है। केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में इस बिल को पारित कराने पर आमादा है ताकि लोकसभा चुनाव के पहले देश में विद्युत वितरण के निजीकरण का रास्ता साफ़ हो सके। निजीकरण का मतलब साफ है महंगी बिजली। यानी पहले से ही महंगाई की मार से बेहल जनता की कमर को पूरी तरह से ध्वस्त किया जा सके। ऐसे में देश भर के बिजली कर्मचारी और इंजीनियरों ने इस प्रस्तावित बिल के विरोध का ऐलान कर दिया है। देशव्यापी आंदोलन की रणनीति पर काम शुरू हो चुका है। आंदोलन के प्रारूप की घोषणा चालू माह के अंत तक होने की उम्मीद है।

केंद्र सरकार ने सात सितम्बर को इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2014 का संशोधित ड्राफ्ट जारी करते हुए इस पर राज्य सरकारों और केवल निजी घरानों से 45 दिन में प्रतिक्रिया मांगी है। इसका पता चलते ही ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ने संशोधित ड्राफ्ट को बिजली वितरण के निजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति से लागू करने का दस्तावेज बताते हुए अपनी लिखित आपत्ति शीघ्र ही दर्ज कराने का फैसला किया है। फेडरेशन ने यह भी तय किया है कि बिजली के क्षेत्र में सबसे बड़े स्टेक होल्डर बिजली कर्मचारी और बिजली उपभोक्ता हैं लेकिन केंद्र सरकार के विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी पत्र में इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2014 के संशोधित ड्राफ्ट पर बिजली कर्मचारियों, अभियंताओं और उपभोक्ताओं से कोई कमेंट नही मांगा गया है बल्कि उल्टे बिजली के क्षेत्र में कार्य कर रहे निजी घरानों की प्रतिक्रिया आमंत्रित की गई है जिससे केंद्र सरकार की निजीकरण की नीति और नीयत साफ परिलक्षित हो रही है।

सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2014 को पारित करना चाहती है जिससे लोकसभा चुनाव के पहले देश में विद्युत् वितरण के निजीकरण का रास्ता साफ़ हो सके। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने पत्रिका को भेजे मेल संदेश में बताया कि केंद्र सरकार द्वारा सर्कुलर जारी होते ही यह निर्णय लिया गया कि निर्धारित समय में देश के सभी बिजली कर्मचारी व इंजीनियर संगठनों द्वारा इस प्रस्ताव का लिखित विरोध किया जाएगा और 29 सितंबर को दिल्ली में नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज एंड इंजीनियर्स की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में केंद्र सरकार की निजीकरण की नीति के विरोध में राष्ट्रव्यापी आंदोलन का एलान किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2014 पर पूर्व विद्युत मंत्री पीयूष गोयल के साथ कई बार हुई वार्ता में उन्होंने बिल में पांच मुख्य संशोधन करने का आश्वासन दिया था। जो निम्नवत हैं...


फेडरेन का संशोधन जो नकारा गया
1- बिल राज्यों के लिए बाध्यकारी नही होगा अर्थात राज्य चाहें तो लागू करे या न करें
2-विद्युत् आपूर्ति के लाइसेंस देने में निजीकरण की कोई बाध्यता नहीं होगी
3- सभी विद्युत् आपूर्ति कंपनियों को सभी श्रेणी के ( घाटा उठाकर बिजली देने वाले उपभोक्ता ) उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करना अनिवार्य होगा
4-एक्ट के अनुसार राज्यों को पांच साल में रोड मैप देने का समय होगा
5-रोड मैप के अनुसार एक क्षेत्र में कई बिजली आपूर्ति कम्पनियां बनाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होगी अर्थात राज्य जितने वर्ष में करना चाहे करे या न करे।
उन्होंने कहा कि विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी संशोधित ड्राफ्ट में इनमे से किसी बिंदु को शामिल नहीं किया गया है जिससे बिजली कर्मियों में भारी रोष है। बताया कि इस बिल को 19 दिसंबर 2014 को लोकसभा में रखा गया था, तब इसे बिजली के मामलों की संसद की स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया था। स्टैंडिंग कमेटी ने सात मई 2015 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को दे दी थी। इस बिल का सबसे प्रमुख प्रावधान बिजली वितरण और आपूर्ति को अलग-अलग कर बिजली आपूर्ति का निजीकरण करना है जिसका बिजली कर्मी और इंजीनियर प्रारम्भ से ही विरोध कर रहे हैं।

दुबे ने बताया कि बिल के अनुसार बिजली वितरण और विद्युत आपूर्ति के लाइसेंस अलग-अलग करने तथा एक ही क्षेत्र में कई विद्युत आपूर्ति कंपनियां बनाने का प्रावधान है। बिल के अनुसार सरकारी कंपनी को सबको बिजली देने (यूनिवर्सल पावर सप्लाई ऑब्लिगेशन ) की अनिवार्यता होगी जबकि निजी कंपनियों पर ऐसा कोई बंधन नहीं होगा। ऐसे में स्वाभाविक है कि निजी आपूर्ति कम्पनियां मुनाफे वाले बड़े वाणिज्यिक और औद्योगिक घरानों को बिजली आपूर्ति करेंगी जबकि सरकारी क्षेत्र की बिजली आपूर्ति कंपनी निजी नलकूप, गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं और लागत से कम मूल्य पर बिजली टैरिफ के घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने को विवश होगी और घाटा उठाएंगी।

उन्होंने बताया कि संशोधित बिल के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों व गरीबी रेखा के नीचे के उपभोक्ताओं को बिजली की पूरी कीमत अदा करनी होगी और यदि केंद्र या राज्य सरकार उन्हें कोई सब्सिडी देना चाहती है तो यह सब्सिडी सीधे उपभोक्ता के खाते में भेजी जाएगी। बता दें कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 की धारा 62 डी के मौजूदा प्रावधान के अनुसार उपभोक्ता से बिजली की लागत उसकी भुगतान की क्षमता को देखते हुए तर्कसंगत ढंग से वसूल किया जाना है जबकि संशोधित ड्राफ्ट में लिखा गया है कि नई बनने वाली आपूर्ति कम्पनियां बिना किसी नुकसान के उपभोक्ता से बिजली की पूरी लागत वसूल करेंगी। ऐसे में यह स्पष्ट है कि यह प्रावधान निजी घरानों को मुनाफ़ा देने और आम उपभोक्ताओं के हितों के विपरीत है। फेडरेशन के चेयरमैन ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा जारी किये गए संशोधित ड्राफ्ट पर फेडरेशन शीघ्र ही प्रपत्र जारी कर आम लोगों को जनविरोधी प्रावधानों से अवगत कराया जाएगा।

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