Congress की जिला व महानगर कमेटियों की घोषणा जल्द, मठाधीशों में हड़कंप

Congress की जिला व महानगर कमेटियों की घोषणा जल्द, मठाधीशों में हड़कंप
कांग्रेस फ्लैग

Ajay Chaturvedi | Publish: Oct, 11 2019 01:29:39 PM (IST) | Updated: Oct, 11 2019 01:29:40 PM (IST) Varanasi, Varanasi, Uttar Pradesh, India

- प्रदेश Congress कमेटी का हाल देखने के बाद वर्षों से पाकेट की राजनीति करने वाले परेशान
-कइयों को सता रहा भय अब जिला व शहर से भी न हो जाएं खारिज

वाराणसी. यूपी Congress के गठन के बाद अब जिला व महानगर कमेटियों की घोषणा जल्द होने जा रही है। माना जा रहा है कि सब कुछ ठीक रहा तो सोमवार तक इन कमेटियों की घोषणा हो जाएगी। माना यह भी जा रहा है कि प्रियंका गांधी ने जिस तरह से प्रदेश कांग्रेस कमेटी में नए चेहरों को ज्यादा जगह दी है ठीक उसी तरह से जिला और महानगर कमेटियों में भी होगा। इसे लेकर पूर्वांचल के मठाधीशों में खलबली मच गई है। उन्हें ये भय सताने लगा है कि जिस तरह से प्रदेश की कमेटी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। वैसे ही जिला व शहर कमेटियों से भी उऩ्हें खारिज न कर दिया जाए। कहीं ऐसा न हो कि उनकी राजनीति ही खत्म हो जाए।

बता दें कि वर्षों से नेहरू-गांधी परिवार पर आश्रित या यूं कहें कि उन्हें बरगला कर अपनी राजनीति सीधी करने वाले इन मठाधीशों की अब शामत आ गई है। टीम प्रियंका गांधी ने जो फीडबैक हासिल किया है और उसे आधार बना कर जिस तरह से संगठन से मठाधीशों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है, ठीक वही प्रक्रिया अब जिला व महानगर कमेटियों में भी दिख सकती है। ऐसे में खेमों में बंट कर जिला और महानगर कमेटियों पर कब्जा करने वालों के दिन अब लदने वाले हैं।

अगर बनारस की ही बात की जाए तो यहां की कांग्रेस पर वर्षों से गुटों का ही आधिपत्य रहा है। पहले बनारस कांग्रेस कमलापति त्रिपाठी, सुधाकर पांडेय, देवेंद्र द्विवेदी, श्यामलाल यादव आदि खेमों में बंटी थी। इनके बाद नाम हटे तो मोहल्लों के नाम पर खेमेबंदी शुरू हुई। इसके तहत दो बड़े घराने उभर कर सामने आए जिसमें एक औरंगाबाद हाउस (कमलापति त्रिपाठी का आवास) और दूसरा खजुरी हाउस (राजेश मिश्रा आवास)। तब जिला और महानगर कांग्रेस कमेटी का गठन इस आधार पर होता था कि एक कमेटी औरंगाबाद हाउस के नाम तो दूसरी कमेटी खजुरी हाउस के नाम। वर्तमान कमेटी तक यही हाल कायम रहा। यह दीगर है कि इन गुटों ने जिसे जिस कमेटी का अध्यक्ष अपना समझ कर बनाया, कालांतर में वह खुद ही बड़ा नेता हो गया।

इसी बीच विगत 10 वर्षों में एक और घराने ने जन्म लिया और वह हो गया चेतगंज घराना। इस घराने ने दोनों के साथ सामंजस्य स्थापित किया और धीरे-धीरे पूरी पार्टी पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। वर्तमान में चाहे जिला कांग्रेस हो या महानगर कांग्रेस अथवा यूथ कांग्रेस सभी चेतगंज हाउस के नजदीकी हैं। उधर औरंगाबाद हाउस ने अपना कार्यक्षेत्र ही बदल लिया और वो मिर्जापुर में काबिज हो गए। वैसे भी कमलापति त्रिपाठी बनारस का सांसद होने के पहले अविभाज्य बनारस से चंदौली के जनप्रतिनिधि रहे लिहाजा वह बनारस कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे। वैसे भी उनका कद इतना बड़ा था कि वह पूर्वाचंल क्या प्रदेश के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे। भले ही पूर्वांचल से हेमवती नंदन बहुगुणा, कल्पनाथ राय,वीर बहादुर सिंह जैसे दिग्गज रहे लेकिन पंडित कमलापति का अपना अलग ही स्थान था। बहुगुणा और कमलापति दोनों ही समकक्ष रहे। लेकिन बहुगुणा जी की निष्ठा बदली, ऐसे ही श्यामलाल यादव की निष्ठा भी डगमगाई पर कमलापति त्रिपाठी ही रहे जिन्होंने तमाम विरोध के अंतिम दम तक पार्टी से अलग नहीं हुए। ऐसे में इस परिवार का महत्व आज भी उसी तरह से कायम है।

कमलापति त्रिपाठी के जिंदा रहते ही उनके पुत्र लोकपति त्रिपाठी ने अपना कार्य क्षेत्र मिर्जापुर को चुना और वहां से वह विधायक भी रहे। उनके बाद उनके बेटे राजेशपति और पौत्र ललितेशपति ने भी मिर्जापुर को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाया। लिहाजा एक तरह से बनारस की सक्रिय राजनीति ये अलग हो गए। इस परिस्थिति में बनारस में सीधी टक्कर हो गई खजुरी और चेतगंज हाउस के बीच।

ये वही चेतगंज हाउस है जिनके नेता अजय राय को कांग्रेस में लाने का काम औरंगाबाद हाउस के राजेशपति त्रिपाठी ने किया जबकि तब खजुरी हाउस से राजेश मिश्रा ने अजय राय जम कर विरोध किया था, पर राजेशपति त्रिपाठी की कांग्रेस हाईकमान यानी सोनिया गांधी तक की निकटता ने अजय राय को कांग्रेस में जगह दिला दी।

अब ये दोनों भले ही ऊपर-ऊपर एक होने का दिखावा करें पर दोनों घरानों में कभी अंतरंगता नहीं हो पाई। न वैचारिक स्तर पर न राजनीतिक स्तर पर। इस बीच राजेश मिश्र जब 2009 में लोकसभा का चुनाव हारे तब से उनका कद घटने लगा और तब तक कांग्रेस में आ चुके अजय राय ने अपनी गहरी पैठ बना ली। नतीजा रहा कि पहले 2014 फिर 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर वह मैदान में उतरे। पहली बार की अपेक्षा दूसरी बार उन्होंने अपना मत प्रतिशत भी बढ़ाया जो अब उनके काम आ रहा है। हालांकि इससे पहले विधानसभा चुनाव में राजेश मिश्र ने शहर दक्षिणी विधासभा क्षेत्र से अच्छा चुनाव लड़ा जबकि अजय राय अपनी ही सीट नहीं बचा सके। और बुरी तरह से हार का सामना करना पढा। आरोप तो यह भी लगाया जा रहा है कि राजेश विरोधी खेमा इतना प्रभावी हो गया कि 2019 के चुनाव नें उन्हें सलेमपुर भेज दिया।

ऐसे में इस प्रभाव की राजनीति में अब बनारस के इन दोनों धड़ों में इस बात को लेकर बेचैनी है कि जिला व महानगर कमेटी में कौन कितना प्रभावशाली होगा। किसकी बादशाहत कायम रह पाएगी और कौन हाशिये पर चला जाएगा।

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