यूपी की युद्धभूमि में कांग्रेस का आत्मदाह

यूपी की युद्धभूमि में कांग्रेस का आत्मदाह
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Awesh Tiwary | Updated: 20 Jan 2017, 04:11:00 PM (IST) varanasi

यूपी की युद्धभूमि में कांग्रेस का आत्मदाह

-आवेश तिवारी 
वाराणसी -समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की कोशिशों के बावजूद यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन को शक्ल न दे पाना कांग्रेस पार्टी और उसके उम्मीदवारों के लिए बेहद आत्मघाती साबित हो सकता हैं। यह खबर लिखे जाने तक सपा महासचिव रामगोपाल यादव और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद के बीच लगातार हो रही बातचीत का सिलसिला टूट चूका था ,गठबंधन की उम्मीद कांग्रेस पार्टी के पूरी तरह से आत्मसमर्पण पर जा टिकी थी वही समाजवादी पार्टी युद्ध से पूर्व ही किसी विजयी साम्राज्य की तरह व्यवहार कर रही थी।  
कांग्रेस का यू टर्न
काबिलेगौर है कि कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर पिछले वर्ष नवम्बर माह की शुरुआत से दोनों ही दलों के विधानसभा चुनाव में साथ आने की कोशिश कर रहे थे नतीजा यह था कि 27 साल यूपी बेहाल के नारों के साथ यूपी चुनाव में उतरी कांग्रेस ने अपना पूरा विरोध प्रदेश की समाजवादी पार्टी से हटाकर भाजपा के इर्द गिर्द केन्द्रित कर दिया।  हालात यूँ हो गए कि सोशल मीडिया से सड़क तक कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं के खिलाफ किसी भी किस्म की टिप्पणी से परहेज करना शुरू कर दिया न तो राहुल की खाट सभाओं में न तो चुनावी रैलियों में समाजवादी पार्टी के खिलाफ विरोध के स्वर मंद हो गए यह स्थिति तब थी जब कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में बूथ कमेटियों तक का गठन कर लिया था । 
पहले बसपा के साथ हुई थी कोशिश 
यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी से पहले  कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को तलाशना शुरू किया था, दोनों ही पार्टियों के कुछ बड़े नेताओं के बीच इसको लेकर कई दौर की बातचीत भी चली थी । लेकिन मायावती ने अंतिम समय पर अपने हाथ खीच  लिए थे।गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव पूर्व ही इस बात का ऐलान किया था कि वो प्रदेश में अधिकतम 100 सीटें जीतने पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं ।हांलाकि प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों से संभावित उम्मीदवारों ने लम्बे समय से अपने टिकट के लिए लामबंदी शुरू कर दी थी निस्संदेह गठबंधन की खबर से उन उम्मीदवारों में निराशा का वातावरण भी पैदा हुआ ।बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा समेत अन्य दलों की सदस्यता भी ले ली।  
अपनों की असहमति के बीच गठबंधन की कोशिश 
सर्वाधिक आश्चर्यजनक यह था कि चुनावों की घोषणा से पहले तक कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेता किसी भी किस्म के गठबंधन की कवायद से इनकार करते रहे।  यहाँ तक कि प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की दिसंबर माह के मध्य में बुलाई गई बैठक में स्पष्ट तौर पर कह दिया था कि हम अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेंगे। प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने शुक्रवार को बयान दिया कि उन्हें गठबंधन को लेकर चल रही किसी भी कवायद की कोई जानकारी नहीं है उन्होंने यह भी कहा कि हम छोटे दलों से गठबंधन कर सकते हैं।  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भगवती चौधरी कहते हैं हम तो शुरू से कहा करते थे सपा के साथ किसी प्रकार का गठबंधन पार्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं के हित में नहीं होगा,हमने गठबंधन को लेकर कदम आगे बढ़ाकर अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारी है।  
अखिलेश छोड़ मोदी और माया के पीछे कांग्रेस के घोड़े 
यह बेहद दिलचस्प था कि नवम्बर तक अखिलेश एवं शिवपाल के बीच की भिडंत को लेकर आक्रामक नजर आ रही कांग्रेस नेअपने सारे दांव मोदी और माया के पीछे लगा दिए हैं।आलम यह है किसपा सरकार के गुंडाराज ,कुशासन और भ्रष्टाचार के अलावा परिवारवाद के खिलाफ नारा बुलंद करने वाली कांग्रेस भाजपा के दिल्ली में बैठे नेताओं पर निशाने लगा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और मायावती के खिलाफ सर्वाधिक ट्वीटऔर फेसबुक पोस्ट लिखे जा रहे हैं। महिलाओं पर अत्याचार की बात तो कांग्रेस कर रही है लेकिन प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति पर सवाल न खड़ा करके साक्षी महाराज की बयानों को इस्तेमाल कर बीजेपी पर हल्ला बोला जा रहा हैं। खाट सभाओं और किसान यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कवायद का सिला पार्टी को क्या मिलेगा इसका फैसला तो चुनाव परिणाम में दिखेगा,लेकिन जिस सरकार का विरोध करते हुए पार्टी ने चुनाव अभियान शुरू किया था,उस विरोध से पीछे हटना पार्टी के अस्तित्व के लिए बड़े खतरे का सबब बन सकता है । 

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