काश कि, 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम गरीबों के लिए सस्ते भोजन की कैंटीन का लोकार्पण होता'

-मीडिया से बोले पूर्व मंत्री अजय राय

By: Ajay Chaturvedi

Published: 15 Feb 2020, 01:24 PM IST

वाराणसी. काश कि, 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम सस्ते भोजन की कैंटीन या कोई अन्य लोककल्याणकारी संस्थान का लोकार्पण होता'। हजारों लोग लाभान्वित होते। लेकिन नहीं, यहां तो किसान हित के लिए बने गन्ना संस्थान की जमीन को मंहगे दीनदयाल उपाध्याय स्मारक का रूप दे दिया जा रहा है और उसका लोकार्पण करने आ रहे हैं बनारस के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। यह सब उस जिले में हो रहा है जहां एक दिन पहले ही बेरोजगारी और तंगहाली के चलते परिवार के साथ सामूहिक आत्महत्या की दर्दनाक व शर्मनाक घटना घट रही है। यह कहना है पूर्व मंत्री व कांग्रेस नेता अजय राय का। मीडिया से मुखातिब राय ने कहा कि इन सब घटनाओं से मुतमईन प्रधानमंत्री तो नौजवानों को रोजगार देने और व्यापारी एवं किसान को घाटे एवं कर्ज से उबारने की चिंता छोड़ स्मारकों और गलियारों की मंहगी सौगातें थमाने में लगे हैं।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16 फरवरी, रविवार को बनारस दौरे पर हैं और वह इस दौरान पड़ाव क्षेत्र में दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा और स्मारक का लोकार्पण करेंगे।

व्यवसायी चेतन तुलस्यान के सपरिवार आत्महत्या करने के मामले में अजय राय ने मोदी सरकार द्वारा थोपी गई मंदी, बेकारी को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही इसके लिए स्थानीय प्रशासन के रवैये पर भी सवाल उठाया। कहा कि अगर तुलस्यान की समस्या की जानकारी प्रशासन को थी तो उसने पहल क्यों न की।


उन्होंने लंका क्षेत्र में 38 दुकानों को गिराए जाने का भी विरोध किया। कहा कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन होना सही है, पर प्रशासन और सरकार को उन दुकानो को तोड़ने के पहले उनके पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए थी। इसी कड़ी में उन्होंने स्थानीय प्रशासन और यूपी सरकार तथा सीएम योगी आदित्यनाथ से सवाल किया कि जिस कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लंका में 38 दुकानें तोड़ी गईं क्या उसी कोर्ट के आदेश पर योगी मंत्रिमंडल के मंत्री के शापिंग कांप्लेक्स को दो फ्लोर गिराए जाएंगे। अगर नहीं तो ये कैसा शासन है, मुख्यमंत्री एक जगह अपने मंत्री को बचाएंगे और आम जनता मारी जाएगी। यह दोहरी नीति क्यो?

कहा कि प्रधानमंत्री वाराणसी के सांसद जरूर हैं, पर इतने दिनों में यहां की बुनियादी जरूरतों की समझ भी नहीं बना सके। फलत: ऐसी परियोजनाओं पर बड़े निवेश हुए, जिनका लाभ यहां के आम आदमी की जगह निर्माणकर्ता, खास कंपनियों को ही पहुंचा। सफेद हाथी की तरह 44 हजार करोड़ से अविरल प्रवाह रहित गंगा में बना बंदरगाह ज्वलंत उदाहरण है, जो बनारस की अर्थव्यवस्था के तकाजों से कोई वास्ता नहीं रखता। रोजगारपरक और व्यवसाय एवं कृषि को आगे बढ़ाने के कामों का सपना तो सपना रहा गया।

आज किसान सर्वाधिक पीड़ा के दौर में हैं। छ: साल में खेती की लागत दो से तीन गुना बढ़ी और मामूली वृद्धि वाला समर्थन मूल्य भी किसान को पूरा नहीं मिल रहा। धान क्रय केंद्र एक महीने पहले बंद हो गए। जो खरीद हुई भी, वह किसान से ज्यादा किसान के नाम पर व्यापारी से हुई। भारी वर्षा के कृषि क्षति का बीमा कंपनियों ने कोई भुगतान नहीं किया और अनिवार्य फसल बीमा के बाद अब केकेसी खाते खोलने की अनिवार्यता थोपने का बैंको को फरमान मिला है। सरकारी रीति नीति के चलते किसान छुट्टा पशुओं से संत्रस्त हैं। प्रधानमंत्री के आने से पहले उन्हें पकड़ने की सरकारी कवायद में एक कर्मचारी को फिर अपनी जान गंवानी पड़ी है।

मंहगाई ने भी सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। रसोई गैस के दाम भाजपा राज में दोगुने हुए 144 रुपये की ताजा वृद्धि वस्तुत: 244 रुपये की वृद्धि है, क्योंकि सब्सिडी भी 100 रुपये कम कर दी गई है। भाजपा सरकार बनने पर 300 रुपये की रसोई गैस और 30 रुपये का पेट्रोल दिलाने के सब्जबाग वालों का अब कहीं आता पता नहीं है।

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