संदीप का निष्कासन विचारधारा का अतिक्रमण

एक बहसः डॉ. संदीप का निष्कासन कितना उचित, जानिये पत्रिका बहस तलब में क्या कहा काशी के बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों ने...

वाराणसी. मैगसेसे से सम्मानित बीएचयू आईआईटी के अतिथि प्रोफेसर डॉ. संदीप का निष्कासन कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह शिक्षा स्वराज के खात्मे का प्रयास है। स्कूल ऑफ थाट में परिवर्तन की कोशिश है। बड़े ही करीने से देश भर की शिक्षण संस्थाओं में एक खास विचारधारा को इंजेक्ट करने की कोशिश है। यह संपूर्ण भारतीय वैचारिकी को ही बदलने की योजना का परिणाम है। ऐसा मानना है काशी के बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक विचारकों के जो उन्होंने रविवार को पत्रिका के साथ साझा किया। पत्रिका की ओर से आयोजित डॉ. संदीप पांडेय का निष्कासन कितना उचित विषयक परिचर्चा में शिरकत करने आए बुद्धिजीवियों ने बड़ी बेबाकी से कहा कि डॉ. संदीप तो महज एक मोहरा हैं। बीएचयू प्रशासन द्वारा उनका निष्कास एक बड़ी लोकतांत्रिक विचारधारा को समूल नष्ट करने का प्रयास है। दरअसल वर्तमान में पूरे देश में एक खास विचारधारा को  शिक्षण संस्थाओं में इंजेक्ट करने का प्रयास बड़े ही करीने से हो रहा है। इसके तहत ही बीएचयू,जेएनयू, डीयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय को आधार (बेस) बनाया गया है। अपने प्रयास के तहत इन विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था तय की गई है।
debate on dr. sandeep pandey termination
स्कूल ऑफ थाट को बदलने का है प्रयासः प्रो. सिन्हा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आईआईटी के अतिथि प्रोफेसर डॉ. राकेश सिन्हा का मानना है कि नई वैचारिकी के तहत कोशिश है कि स्कूल ऑफ थाट को ही बदल दिया जाए। इसी के तहत बीएचयू में डॉ. संदीप जैसे का निष्कासन होता है, डीयू में राम मंदिर निर्माण पर बहस छेड़ी जाती है। दरअसल यह हिटलर और मुसोलिनी की तर्ज पर भय और आतंक का माहौल तैयार कर लोगों को अपनी बात मनवाने का तरीका है। हालांकि यह कोशिश  बीएचयू में नई नहीं। इसकी शुरूआत  1979 से ही देखने में आ रही है। लेकिन तब इस खास विचारधारा को मुक्त हो कर पांव पसारने का मौका नहीं मिलता था, लेकिन अब तो पूरा अंकुश है ऐसे लोगों का जो इस खास विचारधारा के संरक्षक हैं। प्रो. सिन्हा इसके पीछे सीधे तौर पर केंद्र सरकार पर इल्जाम लगाने से नहीं चूकते। कहते हैं कि हिंदू राष्ट्रवाद और इस्लामिक राष्ट्रवाद की बात करने वालों में कोई भेद नहीं। दोनों की विचारधारा एक है। इसके ऐतिहािसिक प्रमाण भी हैं। दोनों की कार्यशैली एक है। ये सबसे पहले बौद्धिक संसार पर कब्जा जमाना चाहते हैं जिसके लिए ब्रेनवाश जरूरी है और वह शिक्षण संस्थाओं से ज्यादा सुगमकता से हो सकता है। कारण यहां किशोर मन मिलता है तो जल्द प्रभावित होता है। बताते हैं कि संदीप पांडेय हों या दीनानाथ बत्रा ये दो ऐसे नाम थे जिनकी वैचारिकी आमआदमी को प्रभावित करती है। बत्रा रहे नहीं सो संदीप बचे थे और वह अपने तरीके से आम आदमी से जुड़ कर उनकी समस्याओं पर फोकस करते हुए उन्हें सामाजिक राजनीतिक धारा में लाने में जुटे थे जो इस खास विचारधारा वालों को रास नहीं आ रहा था। लिहाजा उनका निष्कासन लाजमी हो गया। उन्होंने कहा कि चिंता कारण संदीप का निष्कासन नहीं वैचारिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की हत्या की कोशिश को कामयाब होने से रोकना है। पिछले दो दशक से जो सांप्रदायिक शक्तियों के प्रसार की प्रक्रिया शुरू हुई इसे रोकना बड़ी जिम्मेदारी है।
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काशी की बौद्धिक संपदा पर हो रहा प्रहारः आनंद प्रकाश
सामाजिक विचारक आनंद प्रकाश तिवारी कहते हैं कि देश में एक खास किस्म की वैचारिकी को जबरन थोपने की रणनीति पर काम हो रहा है। इसी के तहत गुजरात से एक व्यक्ति को काशी लाया जाता है सांसद बनाने के लिए। बीएचयू पर काबिज होने के लिए महामना के परिवार से जुड़ाव होता है, उसे सांसद प्रत्याशी का प्रस्तावक बनाया जाता है। ये सब यूं ही नहीं था। इसके परिणाम अब दिखने लगे हैं। दरअसल विश्वविद्यालय में जो भी होता दिख रहा है उसके लिए वो जिम्मेदार नहीं जो इसे करते दिख रहे हैं। वो तो महज कठपुतलियां हैं जिनकी डोर कोई और संभाले है जिसकी सोच वैचारिक धरातल पर अपनी सत्ता काबिज करना है। यह सोची समझी नियोजित प्लानिंग का हिस्सा है। लेकिन यह देशहित में नहीं। यह भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है। वैचारिकी पर हमला है। सोच काशी की बौद्धिक संपदा पर चोट करना है। उस पर कब्जा करना है, क्योंकि वे जानते हैं कि काशी से जो बौद्धिक संदेश देश को जाएगा वह काफी माय़ने रखेगा। बताया कि बीएचयू परिसर में जबरदस्त आतंक का माहौल है। लोग बोलने से कतरा रहे हैं, नौकरी का खतरा मंडरा रहा है। ये आतंक नहीं तो और क्या है।
भारतीय बौद्धिक वैचारिक को ध्वस्त करने का है प्रयासः प्रो. सोमनाथ
समाजवादी विचारक प्रो. सोमनाथ त्रिपाठी का कहना है कि देश में इस वक्त भारतीय बौद्धिक वैचारिक को ध्वस्त करने की साजिश चल रही है। हलांकि इसकी शुरूआत 1991 में वैश्वीकरण के साथ ही शुरू हो गई है। लेकिन इसे खुल कर पांव फैलाने का मौका अब मिला है। गुलबर्गी की हत्या यूं ही नहीं होती है। दरअसल देशज शैक्षिक संस्थाओं को नकार कर वैश्विक शैक्षिक व्यवस्था को लागू करना है। ये एकेडमिक बॉडी पर हमला है। चूंकि बनवारी लाल शर्मा के बाद संदीप ही बचे थे विदेशी कंपनियों के राह में। सो उन्हें उसका खामियाजा भुगतना पड़ा। प्रो. त्रिपाठी कहते हैं कि 1992 के बाद सांप्रदायिक सद्भाव के लिए आंदोलन करने वाले संदीप ही थे लिहाजा उन्हें तो रास्ते से हटाना ही था। खास सोच के लोग अपनी राह के उन सभी कांटों को एक-एक इसी तरह निकाल फेकेंगे अगर हम नहीं चेते तो। उन्होंने कहा कि जिस तरह से देवब्रत मजुमादार ने एक हाकर बनाम सिनेमा हाल मैनेजर के मामले को जेपी आंदोलन में कनवर्ट कर दिया उसी तर्ज पर आज जरूरत है संदीप प्रकरण को राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में परिवर्तित करने की। काशी से ही यह हो यह इसलिए भी जरूरी है कि विपक्षी को असल जवाब यही होगा कि जहां से वह नए बीच का सूत्रपात करना चाहते थे वहीं उनकी जड़ में मट्ठा डाला जाए।
छात्रा से छेड़खानी माफ, जनता से रिश्ता बना राष्ट्रद्रोहः धनंजय
इस मौके पर एनएसयूआई से जुड़े बीएचयू के शोध छात्र धनंजय त्रिपाठी ने बीएचयू के इतिहास को सामने रखते हुए कहा कि यह कोई नया नहीं। गांधी, नरेंद्र देव से लगायत संदीप पांडेय तक हमेशा विचारधारा की लड़ाई के कोपभाजन बने। एक कुलपति जो परिसर से प्रतिबंधित आरएसएस के भवन को जमींदोज कराता है उसे जूते की माला पहनाई जाती है उसी विश्वविद्यालय में ये मरघट सा सन्नाटा अब खल रहा है। दरअसल यह खास विचारधारा के लोग खुली मानसिकता वालों को पचा ही नहीं पा रहा हैं। ऐसे में आतंक का सहारा लिया जा रहा है। यहां छात्राओं के साथ विभागों के केबिन में अश्लील हरकत होती है तो उसे दबा दिया जाता है। या यूं कहें कि किसी थाने के मुंशी से कहीं बदतर जिरह की जाती है। लेकिन एक बौद्धिक संपदा को यह कह कर निष्कासित किया जाता है कि वह दिल्ली कांड की पीड़ित का प्रतिबंधित डाक्यूमेंट्री दिखाने का प्रयास कर रहा था। यहां दशक- दो दशक पुराने ऐसे छात्रों की वापसी होती है जो किसी न किसी अपराध में वांछित हैं। पर डॉ. संदीप देशद्रोही हैं। प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियां सिर आंखों पर और डॉ. पांडेय नक्सली हैं।
अघोषित आपातकाल सा है माहौल
ये तो अघोषित अापातकाल सा माहौल है। ऐसा माहौल जो सीधे नहीं बल्कि परोक्ष रूप से थोपा गया है और वह भी जबरन। ऐसे तरीके से जो स्पष्टतः दिखाई नहीं देगा। सीधे तौर पर किसी को दोषी नहीं बनाया जाएगा बल्कि बहाने से उसे राष्ट्रद्रोही ठहरा दिया जाएगा।  हर सामाजिक व्यक्ति दहशत में है। हिंदू की परिभाषा ही बदली जा रही है। जरूरत दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर समग्र आंदोलन छेड़ने की है। यह कहना है आम आदमी पार्टी के जिला मीडिया प्रभारी मुकेश सिंह का।
कोई तो बताए देश द्रोह की परिभाषा क्या है
कांग्रेस के जिलाध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा ने बीएचयू प्रशासन के बहाने केंद्र सरकार से देश द्रोह की परिभाषा जानना चाहा है। कहा कि क्या आमजन की बात को उठाना। संकट में जूझ रहे लोगों की मदद करना देश द्रोह है। जनता की आवाज को बुलंद करना देश द्रोह है। एक खास विचारधारा का विरोध देशद्रोह है। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि बीएचय़ू को आरएसएस की कार्यशाला, शोध शाला बनाने का प्रयास चल रहा है। महामना का नाम लेकर उन्हीं की वैचारिकी को नष्ट किया जा रहा है। इसके खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ने की जरूरत है। इसमें सारे बौद्धिक लोगों को आगे आना होगा।
ये भी थे मौजूद
देवेंद्र सिंह, विनोद जायसवाल, डॉ. गौरव शाह, रजनीश राय, प्रमोद श्रीवास्तव, राकेश चंद्र, रविभान सिंह।
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Abhishek Srivastava
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