जून की वह काली रात जब नजरबन्द हुआ था "लोकतंत्र"

जून की वह काली रात जब नजरबन्द हुआ था
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आपातकाल की बरसी पर जुटे लोकतंत्र सेनानी, छलके आंसूलोकतंत्र सेनानियों ने मनाई आपातकाल की बरसी

वाराणसी. देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए काम किया इसमें शक नहीं, लेकिन सत्ता की लालच में देश पर ऐसा कानून थोपा जो एक ऐसा कलंक उनके माथे पर लगा जिसे कभी देश भूल नहीं सकता। अपनी सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा की। 25-26 जून 1975 की वह काली रात जब लोकतंत्र नजरबंद हुआ था, सरकार के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले लाखों देशवासी गिरफ्तार हुए थे।
रविवार को आपातकाल की बरसी पर लोकतंत्र सेनानियों का शिवपुर स्थित राघव राम वर्मा बालिका इंटर कालेज में जुटान हुआ। इस मौके पर लोकतंत्र सेनानियों ने आपातकाल के दौरान सरकार की प्रताड़ना को याद किया और बताया कि कैसे देशवाशियों को दूसरी आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इंदिरा गांधी की निरंकुश सरकार ने किस तरह लोकतंत्र का गला घोंट दिया था। काले पानी से भी खौफनाक था आपातकाल।
आपातकाल की बरसी पर हुई संगोष्ठी में मुख्य अतिथि समाजवादी चिंतक व सुधारक विजयनारायन जी ने कहा की जब राजनीती का उदय तो इंग्लैंड से हुआ है। संविधान की नकल तो इंग्लॅण्ड से कर लिया। संविधान में हमारा पहला अधिकार है अभिवयक्ति का अधिकार। 26 जून 75 को ऐसी घटना हुई की लोकतंत्र का दमन कर दिया गया। इंग्लैंड में अपराध करने से पहले गिरफ़्तारी की परम्परा भारत में ही है जब सरकार ने संविधान लागू होने के दो वर्ष बाद ही संशोधन कर दिया था।

बनारस के लाल से मिली हार से तिलमिलाई इंदिरा ने थोपा था आपातकाल

आपातकाल को याद करते हुए बताया कि जब बनारस के राजनारायण जी ने रायबरेली में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। उस दौरान इंदिरा सरकार ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया। सुबूत के आधार पर इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया। संकट आया इंदिरा गांधी की राजनीती पर लेकिन इंदिरा ने पूरे देश को संकट में डाल दिया था। उस समय कांग्रेस में भी इंदिरा गांधी के खौफ था। कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत न थी। आपातकाल ने सबक दिया की राजनीतिक दलों में लोकतन्त्र नही रह गया है। आज तमाम राजनीतिक दल एक व्यक्ति, एक परिवार चला रहा है। मायावती, सोनिया, जयललिता, मुलायम समेत तमाम राजनेताओं ने अपनी ही पार्टी में लोकतंत्र का गला दबा रहे हैं। 
विशिष्ठ अतिथि शिक्षक विधायक चेतनारायन सिंह ने कहा कि आपातकाल की पटकथा तभी लिख गयी थी जब उन्हें राजनारायण जी से हार का सामना करना पड़ा था। आज हमे बदलने की जरूरत है क्योंकि अब प्रजातन्त्र है। पहले राजतन्त्र था तब जैसा राजा वैसी प्रजा, आज प्रजातंत्र है तो यथा प्रजा वथा तंत्र। आज बच्चों को देश के इतिहास से रूबरू कराने के साथ ही उन्हें इस तरह से तैयार करना होगा कि देश उनके हाथों सुरक्षित रहे और तरक्की की राह पर बढ़े। अध्यक्षता कर रहे लोकतंत्र सेनानी सतनाम सिंह ने आपातकाल को याद करते हुए बताया कि उस समय मेरी उम्र लगभग 18 साल रही होगी, पुलिस ने इस बेरहमी से पीटते हुए ले गयी थी पूरा बनारस दहल गया था। आज भी हम जब लोकतंत्र खतरे में पड़ेगा तब लोकतंत्र सेनानी आगे खड़ा होगा। संचालन कर रहे लोकतंत्र सेनानी विनोद बागी अंत में सभी को धन्यवाद दिया और कहा की भले ही अब हमपर उम्र का दबाव है लेकिन हमारे जोश में कोई कमी नहीं है।

लोकतंत्र सेनानियों की चिंता और संकल्प

- आज फिर लोक का तंत्र खतरे में है।
- भरष्टाचार का तंत्र अब भी बदस्तूर चल रहा है।
- सत्ता का चरित्र है खुद को बचाना, हमे किसी दल से नहीं मतलब लेकिन कोई लोकतंत्र से खिलवाड़ करेगा तो हम फिर आवाज उठाने को तैयार हैं।
- अभिवयक्ति की आजादी कोई सरकार छीनने की कोशिश करेगी तो लोकतंत्र सेनानी फिर ललकारेंगे
- लोक की सत्ता से हम दूर हो रहे हैं।
- हमारे आपके बच्चे भी फंस रहे इस भ्रस्टाचारी तंत्र में
- भावी पीढ़ी की ऐसी पौध तैयार करना है जो लोकतंत्र की रक्षा को हमारी लड़ाई को आगे बढ़ाये
आपातकाल की बरसी पर हुई संगोष्ठी में लोकतंत्र सेनानी योगेन्द्र शर्मा, मिथलेश बाजपेयी, राधेश्याम सिंह, प्रीतपाल सिंह पाली, ओमप्रकाश जी, हीरालाल यादव, पन्नालाल जायसवाल, परशुराम मिश्र, कमलेश जायसवाल समेत अन्य लोकतंत्र सेनानियों ने अपने संस्मरण सुनाये

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