अवसाद से करना है सामना, तो उसे छिपाएं नहीं करें शेयर  

    अवसाद से करना है सामना, तो उसे छिपाएं नहीं करें शेयर  
sona chaudhary

भारतीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कैप्टन ने कहा-खुद के पैरों पर खड़े होने से मिलेगी निजात...

Jyoti Gupta.
वाराणसी.अवसाद/डिप्रेशन की समस्या से आज हर उम्र के लोग ग्रसित हैं, चाहें वो बूढ़ें हों या बच्चे। आजकल की हमारी लाइफ स्टाइल ही ऐसी है। बस समस्या यह है कि हम इस सच्चाई को अपना नहीं पा रहे हैं कि हम अवसाद से ग्रसित हैं। इस मुद्दे पर भारतीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कप्तान सोना चौधरी ने पत्रिका से खास बातचीत की।

पेश है साक्षात्कार के प्रमुख अंश 
प्रश्न- क्यों हो रहा है अवसाद।
उत्तर- आजकल हम इतना भाग रहे हैं, हमारी दिनचर्या इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। इसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते। जब तक हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे, शेयर नहीं करेंगे, छोटी-छोटी चीजों को दबाते रहेंगे, छोटी-छोटी इच्छाओं के मारते रहेंगे, नकारते रहेंगे, इन चीजों पर ध्यान नहीं देंगे। फिर एक टाइम ऐसा आता है कि ये चीजे ज्यादा होकर हम पर हावी हो जाती हैं और यह समस्या हमारे अंदर घर कर जाती है। 
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खिलाड़ियों के संदर्भ में कहें तो सबका एक ऐसा समय आता है, जब आप अपने जीवन की उचाइयों पर होते हैं, दुनियां की नजरें आप पर टीकी होती हैं। फिर जीवन में कई समस्याएं आती हैं, जैसे किसी प्लेयर का सेलेक्शन नहीं हुआ, या फिर कोई एक्सीडेंट हो गया। तब अवसाद हम पर हावी हो जाता है। अपना एक्सपीरियंस शेयर करते हुए सोना बताती हैं कि, एक बार मैं बिहार टूर्नामेंट में गईं थी, सबको लगा था हमारी टीम जीतने वाली है पर खेलने से पहले मुझे चोट लग गई और मैं खेल नहीं पाई। इन वजहों से भी डिप्रेशन होता है। 

प्रश्न- अवसाद के कारण क्या हैं।
उत्तर- खिलाड़ियों में अवसाद कई कारणों से हो जाता है, जरूरी नहीं कि वजह बहुत बड़ी हो। कभी कीसी कोच से झगड़ा हो जाता है, कभी टीम में सेलेक्शन होते-होते रह गया या कोई पारिवरिक समस्या हो सकती है।

(बतौर सोना- जब भी मुझे बाहर खेलने जाना होता था, उसी समय मां की तबीयत खराब हो जाता थी, फिर यह समझना मुश्किल हो जाता था कि, मैं बाहर खेलने जाउं या मां के पास रहूं।) इन वजहों से भी अवसाद हो जाता है।

उचांइयों को हांसिल करने वाला व्यक्ति अवसाद से जल्दी ग्रसित हो जाता है, प्लेयर के संदर्भ में ही ले लो। क्योंकि एक समय आता है जब आपकी जगह कोई और लेता है। आपको जॉब नहीं मिली होती, फाइनेंसियल प्रॉबल्म होती है, एक समय में दुनिया में आपकी जयकार होती है और लाइमलाइट में आने के बाद, जब आप किसी और पर निर्भर होते हैं तो अवसाद की समस्या बढ़ जाती है। 

प्रश्न- अगर कोई खिलाड़ी अवसाद से ग्रसित हो तो, इस समस्या से उबरने का उपाय क्या है।
उत्तर- इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है सेल्फडिपेंड होना, चाहे वह मेल हो या फिमेल। फाइनेंसियल फ्रीडम आपको 90% समस्याओं से बचाती है। यह मेरा खुद का अनुभव है। सब कुछ करन के बाद भी अगर आप पैसा नहीं अर्न कर रहे हो तो आपकी कोई गिनती नहीं होती। अगर आप अचानक घर में बैठ जाओगे, काम नहीं करोगे तो खालीपन आएगा और आप अवसाद से ग्रसित हो सकते हो। इसलिए मैं अब भी काम करती हूं, ट्रेनिंग देती हूं ताकि खुद को व्यस्त रख सकूं।(बारिश को नहीं रोक सकते वे नेचुरल है, लेकिन उस बारिश से कैसे बच सकते हैं) यह हमें सोचना है, जैसे छतरी का प्रयोग। 
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प्रश्न- क्या खेल का प्रकार भी अवसाद तय करता है।
उत्तर- हां होता है, खेल के प्रकार से भी अवसाद होता है। टीम गेम से अवसाद होता है, आपने अच्छा खेला फिर भी टीम हार गई तो अवसाद की समस्या हो सकती है। आपको आपके मेहनत का फल नहीं मिलता। जबकि सिंगल गेम में ऐसी टेंशन कम होती है। 
प्रश्न- क्या क्षेत्र का इफेक्ट रहता है।
उत्तर- छोटे कस्बों में टेनिस, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, नहीं पहुंच पाते। अगर आप ऐसी जगह पर हो तो अकेले प्रेक्टिस कैसे करोगे। सुविधाएं नहीं होती है। इसलिए खिलाड़ी अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं। क्योंकि खेल में रहकर भी आपका सेलेक्शन नहीं हो पाता है। 
प्रश्न- क्या परिवार की भूमिका रहती है।
उत्तर- अवसाद में परिवार की बड़ी भूमिका रहती है, आप किसी को समझ लो या किसी को सुन लो यह भी बड़ी बात होती है। इससे पीड़ित को अवसाद से उबरने में मदद मिलती है। कोई ऐसा जो आपसे बिना कुछ उम्मीद किए आपको अवसाद से बाहर निकाले। इसमें साथ रहने वाले को धैर्य रखने की जरूरत है। खासकर भावुक लोगों में यह समस्या ज्यादा होती है। लोग छिपकर अवसाद की दवाइयां खाते हैं पर किसी को बताने से कतराते हैं। ऐसे में फैमिली का सपोर्ट बहुत जरूरी होता है। क्योंकि यह भी डिपेंड करता है कि अवसाद से पीड़ित व्यक्ति अपनी बातें किससे शेयर करता है।

पीड़ित अकेले में रहना चाहता है, उसे कुछ करने का मन नहीं करता, भूख नहीं लगती और किसी से बात नहीं करता। साथ ही उसका किसी काम में मन नहीं लगता, वह एक्टिव नहीं रहता और निगेटिव मूड में रहता है। ऐसे में परिवार के लोगों को उसके साथ अच्छे से व्यवहार करना बहुत जरूरी है। आप उसे समझाएं कि वह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है। डॉक्टर के पास जाने से पहले उसे यह जरूर बताएं कि, वह आपके लिए कितना जरूरी है। उसकी बातों को दिल पर ना लें साथ ही उसे इमोशनली सपोर्ट करें। लोग समझते हैं कि पीड़ित को अच्छा खाना मिल रहा है, अच्छा पहनने को मिल रहा है तो उसे बिमारी क्या है। समस्या क्या है। आप सोचे कोई ऐसी चोट भी हो सकती है जिसके वजह से पीड़ित को तकलीफ है इसलिए उसे समझें, उसे ज्यादा से ज्यादा सुने।
(जरूरी नहीं कि दिवारों से बटवारें होते हैं, एक छत के नीचे रहकर भी लोगों के दिल बंटे होते हैं।)
 sona chaudhary प्रश्न- आपका क्या अनुभव रहा, अगर ऐसा है तो इस समस्या से कैसे निकलीं।
उत्तर- मैं अब भी अवसाद से गुजरती हूं। मेरी मां मेरी सबस अच्छी दोस्त हैं पर मुझे उन्हें सालों लग गए यह बताने में कि, मां मुझे तकलीफ है। जबतक इन चीजों के स्वीकार नहीं करते, तब तक इस समस्या से उबरना मुश्किल है। क्योंकि उपर से शारीरिक रूप से सब सही दिखता है। लोग यह मानने को तैयार नहीं कि वो अवसाद से पीड़ित हैं। खुद को पहचानना सबसे ज्यादा जरूरी है। 
   
 

 

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