देश के ऐसे नेता, जिसने कहा था मैं सिर्फ प्रधानमंत्री बनूंगा... और सच कर दिया था सपना

देश के ऐसे नेता, जिसने कहा था मैं सिर्फ प्रधानमंत्री बनूंगा... और सच कर दिया था सपना

Sarweshwari Mishra | Publish: Apr, 17 2018 01:17:36 PM (IST) Varanasi, Uttar Pradesh, India

चंद्रशेखर की जयंती आज, 80 वर्ष में छोड़ चले थे दुनिया

वाराणसी. प्रखर वक्ता, लोकप्रिय राजनेता, विचारक और बेबाक समीक्षक जो कभी न राज्य में मंत्री रहे और न ही केंद्र में। बने तो सीधे प्रधानमंत्री। वे अपने प्रशंसकों से कहा करते थे कि मैं बनूंगा तो सिर्फ प्रधानमंत्री, मुझे औऱ कोई मंत्री पद नहीं चाहिए।वह कोई औऱ नहीं बल्कि यूपी के बलिया स्थित इब्राहिम पट्टी के लाल चंद्रशेखर थे। 17 जुलाई को पैदा हुए बलिया के बाबू साहब 10 नवम्बर 1990 से 20 जून 1991 तक प्रधानमंत्री के पद पर आसीन रहे। 1951 में ही किशोरावस्था में सोशलिस्ट पार्टी के फुल टाइम वर्कर बन गए युवा चंद्रशेखर अपने तीखे तेवर के लिए जाने जाते थे। बेबाक टिप्पणियों के चलते ही कभी उन्हें देश में युवा तुर्क की संज्ञा दी गई और यह संज्ञा और किसी ने नहीं लौह महिला पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दी थी। चंद्रशेखर में कहीं बापू की छाप दिखती रही तो कहीं डॉ राम मनोहर लोहिया की तो कहीं लोकनायक जय प्रकाश नारायण की। उनकी स्पष्टवादिता और विचारों के चलते ही वह आज भी देश के लाखों लोगों के दिलों में बसे हैं।

 

 

7 महीने तक ही रहे प्रधानमंत्री
चंद्रशेखर सिंह 10 नवंबर, 1990 से 20 जून, 1991 तक पीएम के पद पर रहे। इतने दिनों में ही उन्होंने नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता की ऐसी छाप छोड़ी जिसे आज भी याद किया जाता है। इन्होंने राष्ट्रीय मसलों और जनता के सवालों पर सरकार का विरोध और जरूरत पड़ने पर सहयोग भी किया था। आज भी उनके बेबाकी बोल और खुले विचारों को लोग याद करते हैं। आज चंद्रशेखर सिंह की जयंती है। चंद्रशेखर सिंह 17 अप्रैल 1927 को पैदा हुए और 8 जुलाई 2007 में इस दुनिया से अल्विदा कर लिए थे।


चरण सिंह के बाद वे दूसरे सबसे कम समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने डिफेन्स और होम अफेयर्स के कार्यों को भी संभाला था। उनकी सरकार में 1990-91 का खाड़ी युद्ध भी शामिल है। इतना ही नहीं बल्कि उनकी सरकार पूरा बजट भी पेश नहीं कर पायी थी क्योंकि कांग्रेस ने उनका साथ देने से मना कर दिया था। 1991 की बसंत ऋतू में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दूसरे चुनाव में हिस्सा लेने की ठानी थी। और इसके चलते 6 मार्च 1991 में ही चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

 

 

80 वर्ष में छोड़ चले थे दुनिया
उनके 80 वे जन्मदिन के एक हफ्ते बाद ही 8 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर की मृत्यु हो गयी थी। बहुत समय पहले से ही वे बहुत सी बीमारियों से जूझ रहे थे और मई महीने से ही वे नयी दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनके कुल दो बेटे थे।

 


ऐसा था चंद्रशेखर सिंह का राजनीतिक जीवन
स्नातकोत्तर करने के बाद चंद्रशेखर समाजवादी आन्दोलन से जुड़ गए। वह पहले बलिया के जिला प्रजा समाजवादी दल के सचिव बने और एक वर्ष के बाद राज्य स्तर पर इसके संयुक्त सचिव बन गए। वह 1962 में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर तब आए जब उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चयनित हुए। इस समय तक चंद्रशेखर ने वंचितों और दलितों के कल्याण की पैरवी करते हुए उत्तर प्रदेश सहित कई प्रान्तों में अपनी प्रभावी पहचान बना ली थी। इस समय उनकी उम्र मात्र 35 वर्ष थी। चंद्रशेखर की एक विशेषता यह थी कि वह गम्भीर मुद्दों पर सिंह के समान गर्जना करते हुए बोलते थे। उनकी वाणी में इतनी शक्ति थी कि जब संसद मछली बाजार बन रहा होता था तो वहां पर सन्नाटा पसर जाता था। चंद्रशेखर को मुद्दों की राजनीति के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि विपक्षी नेताओं के साथ उनके मधुर सम्बन्ध रहे। विपक्ष के नेता गतिरोध की स्थिति में उनसे परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।

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