गुलाम अली और ओवैसी का विरोध क्यों

गुलाम अली और ओवैसी का विरोध क्यों
Ghulam Ali-Owaisis

गंगा जमुनी तहजीब वाली काशी, जहां हर मंगल कार्य का आगाज होता रहा उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई से, वहां गुलाम अली का विरोध क्यों...

डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. लंबे समय से देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता पर सवाल उठ रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच जिस तरह से हाल के दिनों में एक खास संगठन ने वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल में हिंदू-मुस्लिम वैमनष्यता का माहौल पैदा किया जा रहा है उसने भारतीय संस्कृति पर सवाल खड़ा कर दिया है। वाराणसी जो गंगा-जमुनी तहजीब के दुनिया भर में मशहूर है वहां गजल गायकी के उस्ताद गुलाम अली और मुस्लिम नेता ओवैसी के विरोध का स्वर तेज होना आम जन के समझ से बाहर है। अब तो इस पर बुद्धिजीवी भी सवाल खड़ा करने लगे हैं।

क्या कहते हैं संकट मोचन मंदिर के महंत
संकट मोचन संगीत समारोह में गुलाम अली के शिरकत करने के सवाल पर मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं कि संगीत सरहदों और फिरकों में नहीं बांधा जा सकता। संगीत को जाननीति से सुनने की बजाय संगीत की तरह सुनना चाहिए तभी वैश्विक शांति होगी। इतना ही नहीं प्रो. मिश्र ज़ुमे रात को दरगाह-ए- फातमान में हजरत अली की शान में सजदा भी करने पहुंच जाते हैं। प्रो. मिश्र कहते हैं कि एक साथ अगर हनुमत दरबार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित, गजल गायकी के उस्ताद गुलाम अली आते हैं तो इसका संदेश दूर तलक जाएगा। भारत-पाक संबंधों में आई खटास बजरिए सुर-संगीत मिटती है तो क्या नुकसान।


क्या कहते हैं यूपी बार कौंसिल के सदस्य
यूपी बार कौंसिल के सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी अपने फेसबुक वाल पर कमेंट करते हैं कि संकट मोचन मंदिर में ऐसे लोगों को बुलाना जिन्हें मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं है, सबका अनादर है। पूजा-स्थल, श्रद्धा, विश्वास से भजन कीर्तन और ध्यान का स्थान होता है। गायन-वादन भी उसी श्रद्धा और विश्वास से जुड़े व्यक्तियों को पूजा-भाव में ही करना चाहे। असंबद्ध व्यक्तियों को भजन-भाव के अलावा गजल आदि सुनने, सुनाने का स्थान हनुमान जी का परिसर नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा है कि ऐसे ही दुष्कृत्यों से हमें केदारनाथ जी की त्रासदी और वदर्भ का अकाल झेलना पड़ रहा है। ऐसे नाटकीय धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े व्यक्ति किसी धर्म या पंथ का भला नहीं कर सकते। हनुमान जी के परिसर में थोड़ी सी जो पी ली है का क्या औचित्य।

उधर हिंदू वाहिनी है कि वह कभी गुलाम अली तो कभी ओवैसी पर हमला बोलती है
इन दो बुद्धिजीवियों से इतर हट कर देखें तो कट्टर हिंदू वादी संगठन हिंदू वाहिनी कभी ओवैसी पर हमला बोलती है तो कभी गजल गायक गुलाम अली पर। हिंदू वाहिनी के कार्यकर्ता कहते हैं कि हम दोनों को पूर्वांचल में घुसने नहीं देंगे। आखिर क्यों। इस पर ओवैसी का जवाब होता है कि हिंदुस्तान किसी की जागीर नहीं। तमाम विरोध के बावजूद ओवैसी ने शनिवार को आजमगढ़ में रोड शो करते हैं तो उसमें हजारों की भीड़ उमड़ती है। उधर संकट मोचन में पिछले साल जब पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली आते हैं तो उनके हंगामा क्यों है बरपा सुननाने से पहले तक शांति रहती है। 

ये है काशी जहां हर काम का बिस्मिल्लाह होता रहा है बिस्मिल्लाह खां की शहनाई से
खांटी काशीवासियों का तर्क है कि ये काशी जहां हर मंदिर-मस्ज़िद, हर बड़े कार्यक्रम का आगाज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई से हुआ करता था। चाहे श्री काशी विश्वनाथ मंदिर हो या संकट मोचन मंदिर बिस्मिल्ला खां की शहनाई की धुन हर जगह सुनाई देती रही। पर्यटन विभाग ने तो हर आंगतुक के स्वागत के लिए उस्ताद की शहनाई को ही प्राथमिकता दी। काशी का हर मंगल कार्य उस्ताद की शहनाई के बगैर अधूरा रहा, फिर गुलाम अली का विरोध क्यों।

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