बनारस की शान गिरिजा देवी को अब पद्म विभूषण

बनारस की शान गिरिजा देवी को अब पद्म विभूषण

देश की 118 हस्तियों के साथ होंगी सम्मानित

वाराणसी. भारत की प्रसिद्ध ठुमरी गायिका व बनारस की शान गिरिजा देवी को पद्म विभूषण से नवाजा जाएगा। गिरिजा देवी बनारस घराने से जुड़ी हैं और उनको शास्त्रीय संगीत में योगदान के लिए पद्मश्री और पद्मभूषण से पहले ही नवाजा जा चुका है। गिरिजा देवी को पद्म विभूषण मिलना काशी के लिए गर्व की बात है। 
दरअसल, पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। इस बार कुल 118 हस्तियों को पद्म सम्मान दिया जाएगा। पद्म विभूषण  यामिनी कृष्णमूर्ति, गिरिजा देवी, रामूजी राव और श्री श्री रविशंकर समेत आठ हस्तियों को दिया जा रहा है। 

ठुमरी की रानी हैं गिरिजा देवी
गिरिजा देवी को ठुमरी की रानी कहा जाता है। शास्त्रीय संगीत से उनका गहरा नाता है। उनकी गाई कई ठुमरी लोगों की जुबान पर रहती है। 

अब तक ये मिल चुके सम्मान
1. पद्मश्री - 1972
2. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार - 1977
3. पद्मभूषण - 1989
4. संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप - 2010
5. महा संगीत सम्मान अवार्ड - 2012

जमिंदार थे पिता
गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को  वाराणसी में हुआ । पिता रामदेव राय एक ज़मींदार थे, जो संगीत प्रेमी थे। पांच वर्ष की उम्र में गिरिजा देवी के लिए संगीत की शिक्षा की व्यवस्था कर दी गई थी। गिरिजा देवी के पहले संगीत गुरु पंडित सरजू महाराज थे। नौ साल की उम्र में पंडित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। 

फिल्म में भी किया काम
गिरिजा देवी ने कम उम्र में ही हिंदी मूवी याद रहे में काम किया था। 

इनमें है महारत
ठुमरी, कजरी और चैती में बनारस का खास लहजा और विशुद्धता का पुट।

पहली बार आकाशवाणी के लिए गाया
1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र में किया। 

इतनी कठिनाइयों का भी किया सामना
गिरिजा देवी को कठिन संघर्ष करना पड़ा। 1949 में आकाशवाणी से अपने गायन की शुरूआत करने वाली गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में संगीत सम्मेलन में गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत यात्रा शुरू हुई, जो आज तक जारी है। 

गायन शैली
शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में निष्णात गिरिजा देवी की गायकी में सेनिया और बनारस घराने की अदायगी का विशिष्ट माधुर्य, अपनी पाम्परिक विशेषताओं के साथ विद्यमान है। ध्रुपद, ख़्याल, टप्पा, तराना, सदरा, ठुमरी और पारम्परिक लोक संगीत में होरी, चैती,कजरी, झूला, दादरा और भजन के अनूठे प्रदर्शनों के साथ ही उन्होंने ठुमरी के साहित्य का गहन अध्ययन और अनुसंधान भी किया है।

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