मास्टर साहब हो तो अब्दुल रहीम जैसा

मास्टर साहब हो तो अब्दुल रहीम जैसा
Abdul rahim Ansari

अब्दुल रहीम का शिक्षा और शिक्षक के पेशे के प्रति समर्पण लोगों के लिए बना प्रेरणास्त्रोत

भदोही. शिक्षा के बाजारीकरण के दौर में शिक्षक के पेशे ने लोगों की विश्वसनीयता को डिगा दिया है।  शिक्षकों का छात्रों के प्रति व्यवहार और अपने पेशे में ईमानदारी को लेकर हमेशा सवाल भी उठते हैं । ऐसे में भदोही जिले के शिक्षक हाजी अब्दुल रहीम अंसारी की कहानी लोगों के लिए एक मिसाल है। अब्दुल रहीम का शिक्षा और शिक्षक के पेशे के प्रति समर्पण लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुका है।

2007 में हुए थे रिटायर

भदोही जनपद के काजीपुर मुहल्ले के रहने वाले अब्दुल रहीम अंसारी नगर के अयोध्यापुरी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कई वर्षो तक कार्यरत रहे। 2007 में अब्दुल रहीम अंसारी जब रिटायर हो गये, तो उसके बाद भी शिक्षण कार्य के प्रति प्रेम नहीं गया। रिटायरमेंट के दो दिन बाद ही घर बैठे उन्हें बोरियत होने लगी, जिसके बाद उन्होंने फिर से उसी स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रधानाचार्य से इच्छा जाहिर की और प्रधानाचार्य की सहमति के बाद एक बार फिर बच्चों को पढ़ाने लगे।  

10 सालों से नियमित रूप से दे रहे बच्चों को शिक्षा
पांच वक़्त के नमाज़ी अब्दुल रहीम लगातार 10 सालों से नियमित रूप से विद्यालय आकर बच्चों को शिक्षा देते रहते हैं। उन्हीं के दिशा निर्देश पर पूरा विद्यालय परिवार चलता है और इसके बदले में वह एक भी पैसा नहीं लेते। अब्दुल रहीम अंसारी के अनुसार उनके इस कार्य का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि आने वाले पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो । एक बार विद्यालय के प्रधानाचार्य ने पैसे देने की कोशिश भी की तो उन्होंने पैसा लेने से इनकार कर दिया और कहा कि आज भी सरकार उन्हें आधी तनख्वाह देती है और जब तक शरीर साथ देगा वे बच्चों को निशुल्क नियमित शिक्षा देंगे।


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होमियोपैथिक के अच्छे जानकार हैं अब्दुल रहीम, मुफ्त में देते हैं दवा

अब्दुल रहीम शिक्षक के साथ- साथ होमियोपैथिक के अच्छे जानकर भी है. विद्यालय के बच्चे जब बीमार होते हैं तो वह उनको दवा भी देते हैं और  इस दवा का वे कभी एक पैसा तक नहीं लेते।  आज जहां लोग पैसे के लालच के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते है. ऐसे में अब्दुल रहीम की कहानी एक सुखद अहसास देती है।
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