scriptInternational Labor Day should be celebrated as Lok Vidya Pratishtha Diwas | 'अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस लोक विद्या प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाए', काशी की ज्ञान पंचायत में उठा मुद्दा | Patrika News

'अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस लोक विद्या प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाए', काशी की ज्ञान पंचायत में उठा मुद्दा

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 2022 और विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह की जयंती के अवसर पर अस्सी घाट पर वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन किया गया। इस पंचायत का विषय परंपरा की खोज रहा। इस मौके पर पहली मई यानी मजदूर दिवस को लोक विद्या प्रतिष्ठा दिवस के रुप में मनाने पर विचार विमर्श हुआ। तो जानते हैं कि इस प्रस्ताव के समर्थन में वक्ताओं ने क्या तर्क दिया...

वाराणसी

Published: May 01, 2022 05:37:36 pm

वाराणसी. पहली मई (एक मई) को लोकविद्या प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाए। अभी यह दिवस मजदूर दिवस के नाम से मनाया जाता है। लोकविद्या प्रतिष्ठा का मतलब है भारत भूमि की बुनियादी ज्ञान परंपरा की प्रतिष्ठा। हिंदी साहित्य के दार्शनिक लेखक हजारी प्रसाद ने लोक परंपराओं को सभ्यता और संस्कृति की बुनियादी परंपरा माना है। इन्हीं के शिष्य नामवरसिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ नाम से एक पुस्तक लिख कर अपने गुरू को श्रद्धांजलि अर्पित की है। वाराणसी से इन दोनों ही विद्वानों का गहरा संबंध रहा है। लोकविद्या की प्रतिष्ठा के रास्तों की खोज व निर्माण के संकल्प के लिए यह दिवस उचित है। ये प्रस्ताव है चित्रा सहस्त्रबुद्धे का जिन्होने रविवार एक मई (अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस) को विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह की जयंती के अवसर पर अस्सी घाट पर आयोजित ज्ञान पंचायत को संबोधित कर रही थीं। पंचायत की शुरुआत लोक विद्या सत्संग के पद से हुई।
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 2022 और विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह की जयंती के अवसर पर अस्सी घाट पर आयोजित वाराणसी ज्ञान पंचायत
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 2022 और विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह की जयंती के अवसर पर अस्सी घाट पर आयोजित वाराणसी ज्ञान पंचायत
मज़दूरों के काम के घंटे घटाकर 8 घंटे किए जाने के संघर्ष की याद में मनाया जाता है मई दिवस

इस मौके पर सुनील सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि आज दुनिया के सभी देश बहुत बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहे हैं। एक मई का दिवस 1880 में अमेरिका के कारखानों में मज़दूरों के काम के घंटे घटाकर 8 घंटे किए जाने की मांग के संघर्ष की याद में मनाया जाता है। यह औद्योगिक युग के ज़माने की बात है। आज सूचना क्रांति के युग में उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में नहीं होता। पूंजी का प्रकार, उत्पादन के तरीके और शोषण का रूप सभी कुछ बदल गया है। मनुष्य के श्रम, ज्ञान, विरासत और संसाधन, सभी के मूल्य को हड़पने की व्यवस्थाएं आकार ले चुकी हैं। मुनाफा उठाने के स्थान कारखानों की जगह बाज़ार बनाए गए हैं। अब औद्योगिक युग में किसानी और कारीगरी को तबाह कर कारखानों में काम करने के लिए जो सस्ते मज़दूर पैदा किए गए थे उन्हें वापस समाज में फेंक दिया गया और उन्हें वित्तीय पूंजी के जाल में फांस कर घर पर ही परिवार के साथ या छोटी-छोटी इकाइयों में काम के लिए मजबूर किया गया। इस प्रक्रिया में औद्योगिक युग का मज़दूर आज कारीगर में बदल गया। लेकिन यह कारीगर आज की दुनिया का कारीगर है न कि औद्योगिक युग के पहले का।
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अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 2022 और विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह की जयंती के अवसर पर अस्सी घाट पर आयोजित वाराणसी ज्ञान पंचायतआज का कारीगर छोटी पूंजी के प्रबंधन का ज्ञानी

आज का यह कारीगर छोटी पूंजी के प्रबंधन का ज्ञानी है। यह छोटा किसान है, बुनकर, लोहार, प्लंबर है, ट्रक-मोटर का ड्राइवर है या इनके मरम्मत और रखरखाव के कार्य करता है। यह ठेले-पटरी-गुमटी या छोटी दूकान करने वाला है। कंप्यूटर पर टाइप करता है या मरम्मत और रखरखाव करता है। यह मल्लाह, धोबी, या सफाई कर्मी हैं, कुम्हार, वनवासी और बढई है, ऑटो-रिक्शा चालक है। ये सब मिलकर इस देश की आबादी का लगभग 80 फीसदी है। यह विशाल कारीगर-समाज सर्वहारा नहीं है, इन्हें मज़दूर नहीं कहा जा सकता। इन्हें असंगठित क्षेत्र का कर्मी या अकुशल कर्मी कहना भी गलत होगा।
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मई दिवस ज्ञान की प्रतिष्ठा का दिवस होना चाहिए
हम कहते हैं कि ये विविध समाजों के 80 फीसदी लोग ही आज लोकविद्या परम्परा के वाहक हैं। हजारी प्रसाद जी ने इन्हें ही बुनियादी परंपरा के वाहक कहा है। ये ही नामवर जी की ‘दूसरी परंपरा’ के नाम से चिन्हित किए गए हैं। मई दिवस इन्हीं के ज्ञान की प्रतिष्ठा का दिवस होना चाहिए। इनके ज्ञान की प्रतिष्ठा इन्हें ही नहीं बल्कि पूरे समाज को खुशहाली, भाईचारा और न्याय के पथ पर ला सकेगी। इन सभी समाजों के ज्ञान में इस न्याय-पथ के निर्माण के भ्रूण भी हैं. दुनिया के एक्वाडोर, बोलीविया जैसे देशों में इन्हीं समाजों के ज्ञान-भ्रूणों को अब कोंपलें फूट पड़ी हैं. आज का दिवस हम इसी दिशा में चिंतन की शुरुआत करने के लिए इकट्ठा हुए थे।
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ये रहे मौजूद

इस मौके पर संजय श्रीवास्तव, रामाज्ञा शशिधर, प्रेमलता, रामजन्म यादव, हरिश्चंद्र बिंद, लक्ष्मण मौर्य, युद्धेश,आलिम बेमिसाल, फजर्रूल रहमान, क्रांति कुमार, सुरेश जिंगालाल, पूजा जिंगलाल, श्रुति पटेल आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आयोजक विद्या आश्रम सारनाथ, मां गंगा निषादराज सेवा समिति वाराणसी, स्वराज अभियान, भारतीय किसान यूनियन, बुनकर सांझा मंच रहे।

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