भाजपा के पहले सीएम कल्याण सिंह को यूपी क्यों याद करता है 

 भाजपा के पहले सीएम कल्याण सिंह को यूपी क्यों याद करता है 
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यूपी भाजपा के पहले सीएम कल्याण सिंह को क्यों याद करता है 

-आवेश तिवारी 
वाराणसी। यह जून 1991 का वक्त था।  केंद्र से वीपी सिंह की सरकार जा चुकी थी उधर उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 425 में से 221 सीट जीती थी। वातावरण में 'राम लला हम आयेंगे मंदिर वही बनायेंगे' के नारों के साथ अटल आडवानी जोशी की तिकड़ी की धूम चारों ओर थी, इसी माहौल में कल्याण सिंह ने 24 जून 1991 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 

यूपी के बीमार उद्योगों में फिर से फूंकी जान 
जिस वक्त कल्याण सिंह शपथ ले रहे थे, ठीक उसी वक्त घाटे की वजह से बंद कर दिए गए उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट निगम के हजारों मजदूर लखनऊ के जीपीओ में धरने पर बैठे हुए थे यह सारे मजदूर पिछले  कई दिनों से भूखे प्यासे थे और शहर भर में घूम घूमकर भिक्षाटन करते हुए अपना पेट भर रहे थे। कल्याण सिंह ने शपथ लेने के बाद मजदूर नेताओं को बुलाया और एक झटके में पूर्ववर्ती मुलायम सिंह सरकार के फैसले को पलटते हुए कारखानों से उत्पादन पुनः शुरू करने के आदेश दे दिए।

 गौरतलब है कि देश में निजीकरण के विरोध में पहला जनांदोलन इन्ही राज्य सरकार के सीमेंट  कारखानों से शुरू हुआ था। कल्याण सिंह के पूर्व मुलायम सरकार में विरोध कर रहे मजदूरों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थी जिसमे 9 मजदूर मारे गए थे ,लेकिन कल्याण सिंह के एक साहसिक कदम से फिर से श्रमिकों के घर में फिर से चूल्हे जल पड़े। इसके अलावा कल्याण सिंह ने राज्य सरकार केअपट्रान और स्कूटर इंडिया लिमिटेड जैसे बीमार प्रतिष्ठानों को भी फिर से पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू कर दी।

सड़क से शिक्षा तक माफियाओं का सफाया 
जिस वक्त कल्याण सिंह की सरकार बनी, उत्तर प्रदेश में सड़क से लेकर  शिक्षा व्यवस्था तक में माफियाओं का बोलबाला था। कल्याण सिंह ने सत्ता में आते ही पहले माफियाओं पर शिकंजा कसा दूसरा समूची परीक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने की घोषणा करी। वो कल्याण सिंह थे जिन्होंने प्रतापगढ़ ज़िले के कुंडा क़स्बे में माफिया डान राजा भैया के खिलाफ हुंकार भरते हुए कहा था कि गुंडा विहीन कुंडा करौं, ध्वज उठाय दोउ " ।

मऊ के मुख़्तार अंसारी का आपराधिक नेटवर्क खत्म करने में भी कल्याण सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई  यह उनकी सरकार का ही असर था कि  प्रदेश के कई शातिर माफिया, डाकू, चोर, गिरहकटयूपी छोड़ कर चले गए। गुंडों को सर मुंडवा के, मुह काला कर के, गधे पर  बैठा के जुलूस निकालना और फिर उसी चौराहे पर जिसपे वो गुंडा गर्दी करता था,वहीं बैठा के उसी के द्वारा जूतों से पिटवाना जैसे नज़ारे आम थे। हांलाकि उनकी सरकार में मानवाधिकारों की स्थिति और  भारी संख्या में हुए इनकाउंटर को लेकर आज भी सवाल खड़ा किया जाता है। 

नक़ल अध्यादेश का दम 
प्रदेश में नक़ल अध्यादेशलागू करना कल्याण सिंह सरकार की बड़ी उपलब्धियों में से एक था। उनकी सरकार ने सत्ता मे आने के बाद प्रदेश में नक़ल अध्यादेश लागू किया जो आज भी कायम है, इस अध्यादेश के तहत यूपी में शिक्षा में नक़ल मारना संज्ञेय अपराध हो गया।इस अध्यादेश का असर यह हुआ कि यूपी बोर्ड का परिणाम जो पहले 85 फीसद  आया करता था वो 25 फीसदी आने लगा। 
प्रदेश भर के विद्यालयों में पठन पाठन में आमूल चूल परिवर्तन नजर आने लगा ,छात्रों को भी पता लग गया कि पढ़ना पडेगा वरना फेल हो जाएंगे। आज भी यूपी के  वो छात्र  जो कल्याण सिंह के ज़माने के हाई स्कूल इंटर पास हैं,गर्व से बताते हैं कि कल्याण सिंह के जमाने के हैं।

एक साल 165 दिन का सीएम 
कल्याण सिंह का पहला कार्यकाल महज एक वर्ष और 165 दिनों का ही रहा। अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देर शाम कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया कल्याण सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री न्यायालय को वचन दिया था कि ढाँचे की रक्षा की जायेगी लेकिन वो उसकी रक्षा नहीं कर पाए और ढांचा गिर गया। ढांचे की रक्षा न कर पाने के लिए न्यायालय ने उन्हें बाद में एक दिन की सजा भी सुनाई|कल्याण सिंह बाद में भी मुख्यमंत्री बने लेकिन उनका वो जलवा और वो हनक नजर नहीं आई जो उनके इस छोटे से कार्यकाल में दिखी थी।
 

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