सिर्फ रैम्प पर नहीं चलतीं, बनारसी साड़ी बुनाई में भी हैं दक्ष ये बनारस की बेटियां

Ajay Chaturvedi

Updated: 24 Apr 2018, 06:34:40 PM (IST)

Varanasi, Uttar Pradesh, India

वाराणसी. सदियों पुरानी विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी के क्षेत्र में लड़कियों व महिलाओं ने हथकरघा बुनाई के क्षेत्र में अपना कशल दिखाया और अब वो स्वालंबन के पथ पर अग्रसर हैं। आने वाला वक्त उनका है। वह अपने हुनर से बनारसी साड़ी को बुलंदियों तक पहुंचाने में तल्लीन हैं। इन हथकरघा बुनकरों को मंगलवार को ह्यूमेन वेलफेयर की ओर से प्रमाण पत्र दिया गया।

बता दें कि परंपरागत रूप से बनारसी साड़ी के कारोबार में पुरुषों का वर्चस्व रहा है। सैकड़ों वर्षों से वही इस ताने-बाने की विरासत को आगे बढ़ाते रहे हैं। लेकिन इस बीच जब वक्त बुरा आया तो लगा कि यह परंपरा भी टूट सी जाएगी। लेकिन तभी इसे अपने हाथ में संभाला काशी की बेटियों ने। आराजीलाइन विकास खंड के सजोई गांव की लड़कियों ने ह्यूमेन वेल्फेयर के साथ मिल कर वह मुकाम हासिल किया जो कभी इनके लिए सपना था। ऐसे में ये सम्मान की हकदार तो थी हीं। लिहाजा मंगलवार को होटल गेटवे के आर्थिक सहयोग से उन्हें सम्मानित किया गया। बता दें कि ह्यूमेन वेल्फेयर के सहयोग से एक साल के भीतर 32 लड़कियों ने बनारस की परंपरागत साड़ी बनाने का प्रशिक्षण हासिल किया। अब तो कुछ लड़कियों ने होटल गेटवे में पहनी जाने वाली साड़ियां भी बनानी शुरू कर दी है।

बुनकर लड़कियों को सम्मानित करने के लिए होटल गेटवे पहुंचे थे विख्यात समाज शास्त्री डॉ अशोक कौल। उन्होंने न केवल इन बेटियों को सम्मानित किया बल्कि उन्हें प्रेरित भी किया स्वावलंबन के लिए और कड़ी मेहनत करने और आगे बढ़ने के लिए। कहा कि समाज की सारी वर्जनाओं को तोड़ते हुए ये बहादुर व हुनरमंद लड़कियां आने वाले समय में पूरे बुनकर एवं शिल्पी समाज के साथ साथ बनारस का नाम रौशन करेंगी।
इस मौके पर होटल गेटवे के महाप्रबंधक अश्विन आनंद ने कहा कि हमलोगों के लिए यह गर्व की बात है कि इस कारपोरेट सोशल रिसपांसिबिलिटी के अंतर्गत परियोजना की रूपरेखा बन रही थी तो हमें यह विश्वास नहीं था कि इतने कम समय में ये लड़कियां बनारस की कढ़ुआ और फेकुआ बुनाई की तकनीक को सीख करक अच्छी साड़ियां बनाने लगेंगी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में होटल गेटवे और भी व्यापक स्तर पर सहयोग प्रदान करेगा।

जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनीकांत ने कहा कि ऐसा वक्त जब बाजार में असली बनारसी साड़ी की मांग बढ़ रही है और पुरुष हथकरघा बुनकरों की कमी हो रही हो तब इन लड़कियों ने वह काम ? अपने हाथों में लिया और अब भविष्य में इस परंपरागत उद्योग को आगे बढ़ाने में वो अपना योगदान देंगी। उत्कृष्ठ उत्पाद तैयार कर दुनिया में नाम रोशन करेंगी। सिर्फ फैशन के रैम्प पर ही नहीं बल्कि उत्पादन में भी पूरा दखल महिलाओं का होगा।

इस मौके पर लड़कियों द्वार तैयार हैंडलूम, बनारसी कढुआ, बूटीदार, आड़ा, जंगला,पाटियी, मीनादार साड़ियों और दुपट्टों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसमें रुबीना, फरहीन, लैलुननिशा, फिजाबानों, साबिनाबानों, महजबीन, नाजरीन, सादिया बानों, आतिफा, सोनी बेगम, इशरत, फरी, फिरदौस, रिजवाना, शिबा बानों, जोया, नसीबुन, रेशमा, बिलकिश, सिजबुन, परवीन बानों सहित 32 लड़कियों व महिलाओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

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