Chhath Puja 2020 Date and Time: जानिये क्यों मनाया जाता है छठ पर्व, क्या है इसकी मान्यता और पूजा व पारण का मुहूर्त

  • छठ पूजा इस बार 20 नवंबर यानि शुक्रवार को है
  • दो दिन पहले नहाय खाय से होता है छठ का आगाज

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

वाराणसी. रोशनी के त्योहार दिवाली के बाद अब सूर्योपासना के सबसे बड़े पर्व डाला छठ की तैयारी है। डाला छठ दीपावली के छठवें दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। हालांकि इस महा पर्व की शुरूआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय-खाय से ही हो जाती है। षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाता है जबकि अगले दिन यानी सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्यदान के साथ ही इस चार दिवसीय महा पर्व की पूर्णाहुति होती है।


सूर्योपासना का यह महापर्व समूचे उत्तर भारत, मुख्य रूप से बिहार, यूपी और झारखंड में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। वाराणसी और बिहार से सटे जिलों और वाराणसी समेत पूर्वांचल के जिलों में भी छठ पर्व को लेकर काफी उत्साह देखने को मिलता है। पिछले करीब दो-तीन दशक के बीच इस महा पर्व की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी है कि दिल्ली जैसे मुंबई बड़े शहरों में भी में भी यह पर्व पूरे जोश ओ खरोश के साथ बड़े पैमाने मनाया जाने लगा है।

कोरोना ने लगाया ग्रहण
हालांकि कोरोना संक्रमण के चलते इस महापर्व पर इस बार ग्रहण लगता दिख रहा है। दिल्ली सहित कई राज्यों में श्रद्धालुओं को सामूहिक स्थल पर पूजन-अर्चन की इजाजत नहीं दी गई है। वाराणसी में भी सूर्य सरोवर में बिना कोरोना जांच के इजाजत नहीं है। व्रती जनों और व्रती के परिजनों को सलाह दी जा रही है कि वो घर पर ही जल स्रोत बनाकर पूजा अचर्ना करें।


क्या होता है छठ पर

बता दें कि छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होती है। इसके अगले दिन यानी पंचमी को खरना होता है। इसी दिन पूजन सामग्री की खरीदारी से लेकर घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। उस दिन भी व्रती सूर्योदय से सूर्यास्त तक निराजल व्रत रखते हैं। चंद्रमा को अर्घ्यदान के बाद घर रोटी और गुड़ से बनी खीर जिसे 'बखीर' कहा जाता है का भोग लगा कर उसे ही ग्रहण करते हैँ। तीसरे दिन यानी षष्ठी तिथि को पूरे दिन निराजल (पानी तक वर्जित है।) व्रत रखते हैं और शाम को डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाता है। इस मौके पर व्रती नदी या सरोवर आदि में कमर तक खड़े हो कर भींगे बदन ही अदिति नारायण को अर्घ देते हैं। अर्घ्य दान से पूर्व दीपक प्रज्ज्वलित किया जाता है। यह अखंड दीप होता है जो पर्व की पूर्णाहुती तक जलता रहता है। दीप प्रज्ज्वलन के बाद अर्घ्य दान के लिए सूप में घर में पके पकवान जिसमें 'ठेकुआ' खास होता है के अलावा सभी मौसमी फल रख कर कच्चा दूध व गंगाजल से अर्घ्य देने का प्रावधान है। अर्घ्य सूर्य के 12 नामों से बारी-बारी से दिया जाता है। अर्घ्य दान के बाद व्रती और उनके परिजन दौरा में सारी पूजन सामग्री को रख कर नदी तट या सरोवर तट से घर की ओर लौटते हैं। इस दौरान व्रती आगे-आगे दीपक ले कर चलते हैं। पूरी रात सूर्य भगवान और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं। फिर अगली सुबह यानी सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्यदान के साथ ही इस महा पर्व की पूर्णाहुति होती है।


छठ पर्व पर सूर्य व छठी माता की पूजा

छठ पूर्व में सूर्य की आराधना का महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता हैं। कहा जाता है कि छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती हैं और घर परिवार में सुख शांति तथा संपन्नता प्रदान करती हैं। छठ पर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है।


छठ पूजा 2020 पूजा के शुभ मुहूर्त

20 नवंबर को छठ पर्व के तहत भगवान भास्कर को पहला अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय – 06:48 पर तथा सूर्यास्त – शाम 5:26 बजे होगा। वैसे षष्ठी तिथि एक दिन पहले यानी 19 नवंबर की रात 9:58 से शुरू हो जाएगी और 20 नवंबर को रात 9:29 बजे तक रहेगी। इसके अगले दिन सप्तमी तिथि (21 नवंबर) को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 21 नवंबर को सूर्योदय 6.48 बजे होगा।

रफतउद्दीन फरीद
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