पूर्वांचल की राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिये अब क्या करेंगे ओम प्रकाश राजभर

  • 2017 में चार विधानसभा सीटें जीतने वाली सुभासपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ लड़कर सिर्फ खोया।
  • मौका देखते ही बीजेपी ने ओम प्रकाश राजभर का मंत्री पद और सुभासपा नेताओं के मलाईदार पद भी छीन लिये।

वाराणसी. सियासत से जुड़े जानकार कहते हैं कि जाति की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों में पूर्वांचल बेस्ड सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का नाम बेहद अहम है, भले ही यह सपा-बसपा जितनी बड़ी न हो, लेकिन छोटे दलों में यह जातिगत राजनीति करने वाली मजबूत पार्टी है। 2017 के पहले भले ही इस पार्टी ने केाई चुनाव न जीता हो, लेकिन कई चुनाव लड़कर खेल बिगाड़ने का काम बखूबी अंजाम दिया और यूपी की राजनीति में प्रासंगिक बने रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर ने बीजेपी का साथ पकड़कर जीत का स्वाद चखा और मंत्री भी बन गए। चार विधायक विधानसभा पहुंच गए, लेकिन दो साल बाद रातनीति ने एक बार फिर करवट ली है और 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा चल रही है कि क्या सुभासपा और ओम प्रकाश राजभर अब यूपी खासतौर से पूर्वांचल की रातनीति में उतने ही प्रासंगिक हैं।

 

मायावती से बिगाड़ के बाद छोड़ी बसपा, बनायी सुभासपा

1981 में कांशीराम के समय से राजनीति की शुरुआत करने वाले ओम प्रकाश राजभर का 2001 में मायावती से विवाद हो गया। मायावती ने जब भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर रखा तो राजभर को इस पर भी ऐतराज था। आखिरकार उनकी राहें अलग हुईं और उन्होंने 2004 में राजभर समाज के लोगों की एक नई पार्टी बना ली। पार्टी का नाम भी राजभर समाज के ईष्टदेव महाराजा सुहेलदेव के नाम पर ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी’ रखा गया। 2004 में सुभासपा ने चुनावों में हाथ आजमाया, यूपी के साथ बिहार में भी प्रत्याशी खड़े किये। बेहद नई पार्टी होने के बावजूद वह कई सीटों पर खेल बिगाड़ने में कामयाब रहे। यहीं से उनकी प्रासंगिकता बढ़ती गयी और सुभासपा छोटी पार्टियों में सबसे सशक्त पार्टी के रूप में उभरी। 2007 और 2012 का विधानसभा चुनाव भी लड़ी, लेकिन सुभासपा को कोई सीट नहीं मिली। 2012 में तो सुभासपा ने कौमी एकता दल जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन किया। कई विधानसभा सीटों पर चुनाव भी लड़े पर इसमें भी सुभासपा एक भी सीट तक नहीं जीत सकी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी सुभासपा मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के साथ रही, लेकिन दोनों पार्टियां कोई कमाल नहीं दिखा सकीं।

 

बीजेपी से गठबंधन कर पहली बार चखा जीत का स्वाद

ऐसा कहा जाता है कि ओम प्रकाश राजभर 2014 में भी बीजेपी से गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन यह मौका उन्हें मिला 2017 में। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपनी सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही थी। गैर यादव ओबीसी दलों को एकजुट करने के लिये भाजपा ने जो फ्रेम बनाया था उसमें सुभासपा फिट आ गयी। अब तक कास्ट फैक्टर के आधार पर 5 से 50 हजार तक वोट पा जाने वाली सुभासपा को बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में 7 सीटें दीं। न सिर्फ राजभर बल्कि बीजेपी के लिये भी यह फायदे का सौदा था। 122 सीटों पर राजभर वोट बैंक का फायदा मिलाता दिख रहा था। अनुमान लगाया जाता है कि 66 सीटों पर 80,000 से 40,000 तक और करीब 56 सीटों पर 45,000 से 25,000 तक राजभर वोटर हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में राजभर की पार्टी सुभासपा ने चार सीटों पर चुनाव जीता और ओम प्रकाश राजभर को योगी सरकार के कैबिनेट में जगह मिल गयी।

 

2017 में भाजपा को जिताया, 2019 में हराने के लिये लड़े

सरकार में आने के बाद से ही उन्होंने बीजेपी को आंखें दिखानी शुरू कर दीं, सियासी पंडितों के मुताबिक ऐसा वह बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी की छाया में अपनी पार्टी का वजूद बचाए रखने के लिये कर रहे थे। पर इससे उनके और बीजेपी के बीच रिश्ते में दरार बढ़ती चली गयी। कई बार उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ने तक की धमकी भी दी। 2014 के लोकसभा चुनाव में अंतिम समय पर भी बीजेपी ने राजभर की पार्टी को पार्टी कार्यालय के लिये बड़ा बंगला एलार्ट करने के साथ-साथ बेटे समेत सात नेताओं को आयोग और परिषदों में सदस्य व अध्यक्ष जैसे मलाईदार पद भी दे दिये। बावजूद इसके लोकसभा चुनाव में दोनों की राह अलग हो गयी और राजभर की पार्टी बीजेपी को हराने के लिये चुनाव लड़ी।

 

वोटिंग खत्म होते ही बीजेपी ने मंत्री पद और बंगला छीना

लोकसभा चुनाव में अपने खिलाफ होते हुए भी बीजेपी न तो ओम प्रकाश राजभर और न ही उनकी पार्टी पर कोई हमला कर रही थी। सुभासपा ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ भी अपना प्रत्याशी (सुरेन्द्र राजभर) खड़ा किया था। इसके अलावा वह लगातार पार्टी पर हमला कर रहे थे। मऊ में तो एक सभा में उन्होंने बीजेपी के लिये आपत्तिजनक शब्द तक कहे, जिसपर बवाल मचा। बीजेपी नहीं चाहती थी कि 2017 में उसे मिले राजभर वोट छोटी सी गलती के चलते छिटक जाएं। आखिरी (सातवें) चरण की वोटिंग खत्म होने के ठीक दूसरे दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ओम प्रकाश राजभर को कैबिनेट से हटा दिया। उनका मंत्री पद और बंगला भी छीन लिया गया।

 

खेल बिगाड़ने लायक भी नहीं रहे इस बार

राजभर की पार्टी सुभासपा 2019 लोकसभा चुनाव में यूपी की 39 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिनमें से अधिकतर सीटों पर उसका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। वह खेल बिगाड़ने की स्थिति भी बना पाने में कामयाब नहीं रही। 39 में से 9 सीटों पर ही उसका प्रदर्शन कुछ ठीक रहा। इनमें से 7 सीटों पर सुभासपा तीसरे नंबर पर रही। घोसी में सबसे अधिक 39,842, जबकि बलिया 35,874, गाजीपुर 33868 और सलेमपुर में 33504 वोट पाए। लालगंज में 17927, मछलीशहर 11212, आजमगढ़ में 10077 वोट पाकर भी पार्टी तीसरे स्थान पर रही। जिन सीटों पर चौथे स्थान पर रही उनमें चंदौली में 18971 और बनारस में 8890 वोट मिले। कुल मिलाकर इस लोकसभा चुनाव में वह खेल बिगाड़ने वाले भी साबित नहीं हो सके।

 

बीजेपी ने खड़ी की नई राजभर लीडरशिप

बीजेपी ने 2014 में ही घोसी से हरिनारायण राजभर को टिकट देकर राजभर वोटरों को साधना शुरू कर दिया था। 2017 में सुभासपा से गठबंधन होने के बाद भी उसने अपने विधायक अनिल राजभर को मंत्री बनाया और उन्हें उनकी बिरादरी में स्थापित करने की कवायद चलती रही। राजभर को यही खटकता था। इसके बाद पूर्वांचल से सकलदेव राजभर को राज्यसभा भेज दिया। ओम प्रकाश राजभर की नाराजगी को देखते हुए बीजेपी उन्हें निपटाने के लिये मौका ढूंढ रही थी। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद उन पर कार्रवाई कर दी गयी। इतना ही नहीं उनका मंत्रालय अनिल राजभर को देकर उनका कद बढ़ा दिया गया। इसके बाद ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर अपनी पुरानी स्थिति पर आ गए हैं। फिलहाल उनके लिये एनडीए के दरवाजे बंद और सपा-बसपा का विकल्प खुला दिख रहा है।

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रफतउद्दीन फरीद
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